नशा : लाख़ों लोगों को मौत की नींद सुला देता है!

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नशा या एडिक्शन की विभिन्न परिभाषाएं की गई हैं।

नशा या एडिक्शन की विभिन्न परिभाषाएं की गई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक समग्र परिभाषा की है। मादक पदार्थों का नशा एक ऐसा ज़हर है जो व्यक्ति के स्वास्थ्य और समाज को नुक़सान पहुंचाता है। यह नशा प्राकृतिक एवं औद्योगिक पदार्थों के इस्तेमाल से होता है जिसका मन और शरीर पर प्रभाव पड़ता है।

यह समस्त इंसानों विशेष रूप से जवानों के लिए एक घातक है। निर्धनता, निरक्षरता और नशा ऐसा त्रिकोण है, जिसने युवाओं की रचनात्मकता और ख़ुशियों को छीन लिया है और उन्हें बीमार बना दिया है। इसके अलावा नशे की लत के अनेक मानसिक एवं शारीरिक प्रभाव हैं और यह लाख़ों लोगों को मौत की नींद सुला देता है। नशे से वैवाहिक जीवन बर्बाद होने के अलावा, आर्थिक एवं सांस्कृतिक नुक़सान भी बहुत होता है।

अध्ययनों के अनुसार, जिन लोगों के मादक पतार्थों के सेवन की लत लग जाती है, अक्सर वे उसका पहला अनुभव शौक़िया तौर से और जवानी में करते हैं। धीरे धीरे उनका यह शौक़ आदत में बदल जाता है। मादक पदार्थों के सेवन में हमेशा वृद्धि होती रहती है। युवा शुरू में बहुत ही थोड़ी मात्रा में उसका सेवन शुरू करता है, लेकिन समय के साथ साथ थोड़ी मात्रा फिर शरीर की ज़रूरत पूरी नहीं करती, इसलिए वह उसकी मात्रा में वृद्धि के लिए मजबूर होता है, या जल्दी जल्दी उसका सेवन शुरू कर देता है।

यह बात ध्यान योग्य है कि ग़लत आदतों से छुटकारा पाना बहुत कठिन होता है। कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो समस्याओं से भागने और शांति का एहसास करने के लिए मादक पदार्थों का सेवन शुरू करते हैं।

अधिकांश युवा जब बालिग़ होने के दौर से गुज़रते हैं तो शरीर में परिवर्तन और मन में काफ़ी हलचल का अनुभव करते हैं, जिसका आसपास के लोगों पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। ग़ुस्सा, चिड़चिड़ापन, विरोध, हठधर्मी, असहयोग, लापरवाही और कमियां खोजना ऐसी आदतें होती हैं कि जो युवाओं के जीवन को और कठिन बना देती हैं। यह आदतें कभी कभी युवाओं को सही रास्ते से भटकने और नशे का आदी होने की कगार पर ला खड़ा करती हैं। वे अपने मां-बाप के नैतिक मूल्यों को स्वीकार नहीं करते और स्वाधीनता पाने का प्रयास करते हैं।

एक अध्ययन के मुताबिक़, मां-बाप और बच्चों के बीच संबंधों और नशे के बीच एक विशेष संबंध है। परिवार की नशे का आदी बनाने और नशा छुड़ाने में काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए कि यह व्यक्तिगत एवं सामाजिक परिवर्तनों का कारण बनता है। परिवार का इंसान के जीवन में बहुत महत्व होता है।

अमरीकी मनोवैज्ञानिक डायना बॉमरिंड के मुताबिक़, बचपन में मां से कमज़ोर जुड़ाव और आशांत पिता एवं मादक पदार्थों के सेवन के प्रति परिजनों का सकारात्मक दृष्टिकोण युवा अवस्था में नशे का ख़तरा बढ़ा देते हैं। यही कारण है कि युवाओं के नशे का आदी होने और मां-बाप के साथ उनके रिश्तों में संबंध की समीक्षा ज़रूरी है।

विशेषज्ञों के मुताबिक़, युवाओं को बुरी आदतों से दूर रखने के लिए कभी भी यह प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए कि वे किसी बुरी आदत के आदी हो जाएं, तब जाकर उसका समाधान निकाला जाए। दूसरी ओर वास्तविकताओं को अनदेखा करने से न केवल किसी समस्या का हल नहीं निकल सकता, बल्कि समाधान निकालने का अवसर भी हाथ से जाता रहेगा। युवाओं को प्रभावी रूप से नशे से रोकने के लिए परिजनों की होशियारी बहुत महत्वपूर्ण है।

युवावस्था एक ऐसा दौर होता है जिसमें युवा जोश और मानसिक हलचल के साथ सामाजिक विकास की ओर बढ़ता है। इस बीच, जिन युवाओं का अपने परिवार से निकट संबंध होता है और वे परिजनों के बीच रहकर शांति और ख़ुशी का एहसास करते हैं, वे बुरी आदतों में कम ही पड़ते हैं।

मां-बाप उचित वातावरण उत्पन्न करके, अपने बच्चों को सफलता तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं। इसके विपरीत वे परिवार के माहोल को नरक बनाकर अपने बच्चों को भड़कते हुए शोलों के हवाले भी कर सकते हैं। हज़रत अली (अ) फ़रमाते हैं, युवा का दिल और मन किसी ख़ाली ज़मीन की भांति होते हैं, जो बीज उसमें बोया जाता है वह उसे स्वीकार कर लेती है और उसे उगाती है।

ज़रूरी यह है कि मां-बाप इस बहुमूल्य बात पर ध्यान दें और अपने बच्चों को सही अवसर पर सही प्रशिक्षण देकर भलाई का बीच उनमें बोयें और उसे पाले पोसें। इस स्थिति में उनके बच्चे सफल हो सकते हैं।

आज हम देखते हैं कि युवाओं के नशे की समस्या और उनके द्वारा परिवार और समाज के लिए उत्पन्न समस्याओं के बारे में विभिन्न समीक्षाएं पेश की जाती हैं। अध्ययनों के अनुसार, मादक पदार्थों का सेवन करने वाले अधिकांश युवा, 17 से 25 वर्ष की आयु में इसके आदी हो जाते हैं और एक बड़ी संख्या 25 वर्षी की आयु के बाद भी इसकी आदी होती जाती है।

मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में युवा अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद बहुत सी आशाएं लेकर समाज में जब क़दम रखता है और उसे बेरोज़गारी का सामना करना पड़ता है तो उसे निराशा होती है। इसलिए जवानी के जोश के साथ अधिकांश युवाओं में एक प्रकार की निराशा और बेचैनी देखने में आती है। इस आयु में जवानों में आज़ादी और परिवार की पाबंदियों से छुटकारे का विचार देखने में आता है। वे अपने सहपाठकों और नए दोस्तों के साथ उठने बैठने में अधिक रूची रखते हैं। परिणाम स्वरूप, उनकी रूची अज्ञात मामलों में अधिक होती है। युवाओं की बैठकों में बेरोज़गारी और जीवन में बेहतर सुविधाओं के अभाव के लिए अधिकारियों, समाज और मां-बाप को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है और वे अपना ग़म भुलाने के लिए धूम्रपान, शराब और मादक पदार्थों का सहारा लेने लगते हैं।

पहचान में परिवर्तन और ख़ुद को पहचानने में कठिनाई भी नशे की लत का कारण बन सकती है। युवा इस समस्या से फ़रार करने के लिए नशे का सहारा ले सकता है और असुरक्षा के एहसास को इस प्रकार साहस का दिखावा करके छुपा सकता है। मां बाप द्वारा मज़ाक़ बनाए जाने और ताने दिए जाने से युवाओं में निराशा पनपती है। युवा इस स्थिति से बाहर निकलने और अच्छा आभास करने के लिए भी नशे का सहारा ले सकता है।

इस बिंदु की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि दुश्मन समाज को घुटने टेकने पर मजबूर करने के लिए और काम की ऊर्जा को नष्ट करने के लिए युवाओं को निशाना बनाते हैं और समाज में नशा एवं भ्रष्टाचार फैलाने के लिए प्रचार प्रसार पर बड़ी राशि ख़र्च करते हैं। दुश्मन की चालों में से एक ख़तरनाक चाल मादक पदार्थों का वितरण और युवाओं को उसके सेवन के लिए प्रोत्साहित करना है। स्पष्ट है कि जो लोग इस समस्या से ग्रस्त हैं, अपनी शारीरिक ऊर्जा खो देने के कारण कोई काम करने योग्य नहीं रहते। परिणाम स्वरू, मादक पदार्थों के ख़रीदने के लिए कुछ भी करने लगते हैं, यहां तक कि अपना मान सम्मान सब कुछ दाव पर लगा देते हैं। इस स्थिति में युवा की सामाजिक हस्ती नष्ट होकर रह जाती है। उसके इस काम से समाज को केवल नुक़सान ही पहुंचता है।

नशा युवा के लिए अपमान का कारण बनता है। इस प्रकार युवा परिवार की मोहब्बत से वंचित रह जाता है। नशा करने वाला अपना सामाजिक सम्मान खो देता है और अपमानित हो जाता है। परिजन भी इस प्रकार का बाप या भाई होने के कारण शर्मिंदा होते हैं। इस ख़तरे से निपटने के लिए दूरदर्शिता के साथ साथ अधिकारियों और प्रशिक्षों के सहयोग भी बहुत ज़रूरी होता है।