नाम रखना : एक दूसरे का नाम बिगाड़ने वाले हुक़ूक़ुल्लाह के साथ साथ हुक़ूक़ुल इबाद में भी गिरफ़्तार होते हैं

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*कंज़ुल ईमान* – ऐ ईमान वालो ना मर्द मर्दों से हंसे अजब नहीं कि वो उन हंसने वालों से बेहतर हों और ना औरतें औरतों से दूर नहीं कि वो उन हंसने वालों से बेहतर हों, और आपस में तअना ना करो और एक दूसरे के बुरे नाम ना रखो,क्या ही बुरा नाम है मुसलमान होकर फासिक़ कहलाना, और जो तौबा ना करे तो वही ज़ालिम है 📕 पारा 26,सूरह हुजरात,आयत 11

*Ⓜ एक दूसरे का नाम बिगाड़ने वाले हुक़ूक़ुल्लाह के साथ साथ हुक़ूक़ुल इबाद में भी गिरफ्तार होते हैं हुक़ूक़ुल्लाह तो इस तरह कि मौला तआला के हुक्म की नाफरमानी की गई और हुक़ूक़ुल इबाद इस तरह कि किसी का नाम बिगाड़ कर बन्दों को तकलीफ पहुंचाई गई लिहाज़ा उस पर तौबा वाजिब है और साथ साथ उस बन्दे से माअफी मांगना भी ज़रूरी है*

*हदीस* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि क़यामत के दिन तुम अपने और अपने बाप के नाम से पुकारे जाओगे तो अपने नाम अच्छे रखो 📕 अबु दाऊद,जिल्द 3,सफह 551

*हदीस* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि बच्चे का 7वें दिन नाम रखें और अक़ीक़ा किया जाये 📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 298

*हदीस* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बुरे नामों को अच्छे नामों से बदल देते थे
📕 मुस्लिम,जिल्द 3,सफह 131

*फुक़्हा* – बअज़ लोगों का नाम मुहम्मद नबी-अहमद नबी-नबी अहमद-नबी अल्लाह-नबी रसूल होता है ऐसे नाम रखना हराम है अगर चे मुसल्लम यही है कि इसमें नुबूवत का दावा नहीं अगर होता तो खालिस कुफ़्र होता मगर दावा है ज़रूर लिहाज़ा हराम है हां ग़ुलाम नबी-अब्दुन नबी-गुलाम रसूल नाम रखना जायज़ है,युंही नबी जान रखना भी ना मुनासिब है और यासीन और ताहा नाम रखना भी मना है क्योंकि ये ऐसे नाम है जिसके मायने मालूम नहीं हां रखना ही हो तो गुलाम यासीन या अब्दुत ताहा रख सकते हैं,युंही बअज़ लोग गफ़ूर उद्दीन नाम रखते हैं ये भी सख्त बुरा है कि गफ़ूर का माना मिटाने वाला ( मौला बन्दों के गुनाह मिटने वाला है ) तो गफ़ूर उद्दीन का मायने हुआ दीन को मिटाने वाला मआज़ अल्लाह इससे तो बहुत ज़्यादा हल्का नाम आसिया यानि गुनहगार था जबकि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उसको बदल कर जमीला कर दिया था,युंही आलाहज़रत फरमाते हैं कि उल्माए किराम ने निज़ाम उद्दीन-मुहि उद्दीन-ताज उद्दीन-शमशुद्दीन- बदरुद्दीन-नूर उद्दीन-फखरुद दीन-शमशुल इस्लाम-बदरुल इस्लाम-ताजुश शरिया-सदरुश शरिया-वारिसुन नबी-सुल्तानुल हिन्द वगैरह नाम रखना सख्त ना पसन्द फरमाया है क्योंकि ये बुज़ुर्गो के अल्क़ाब हैं लिहाज़ा उनके नाम पर नाम रखें जायें अल्क़ाब या कुन्नियत पर नहीं,इसी तरह हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नाम पर यानि *मुहम्मद* या *अहमद* नाम रखना बिल्कुल जायज़ है और इसकी बड़ी फजीलत आई है चन्द ज़िक्र करता हूं

1. जिसने हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुहब्बत में अपने बच्चे का नाम मुहम्मद या अहमद रखा तो दोनों जन्नत में जायेंगे
2. क़यामत के दिन 2 शख्स इसलिए जन्नत में जायेंगे कि उनका नाम मुहम्मद या अहमद होगा वो अर्ज़ करेंगे मौला हमारे आमाल तो इस लायक़ नहीं तो मौला तआला फरमायेगा कि मैंने हलफ लिया है कि जिसका नाम मुहम्मद या अहमद होगा वो दोज़ख में नहीं जायेगा
3. जिस घर में मुहम्मद या अहमद नाम वाला कोई होगा तो उस घर में रोज़ाना 2 बार मौला तआला रहमते इलाही का नुज़ूल फरमायेगा और उसमे बरकत ज़्यादा होगी
4. जिस मशवरे में मुहम्मद या अहमद नाम वाला शामिल हो तो उसमें बरकत होगी
5. जिसके 3 बेटे हों और वो किसी का नाम मुहम्मद या अहमद ना रखे तो वो जाहिल है
6. जो चाहे कि उसके यहां लड़का हो तो हामिला औरत के पेट पर हाथ रखकर कहे कि अगर लड़का है तो मैंने इसका नाम मुहम्मद रखा तो इन शा अल्लाह लडक़ा ही होगा,फिर जब लड़का हो तो उसका नाम मुहम्मद रखें और उसे मारने से परहेज़ करें
📕 अहकामे शरीयत,हिस्सा 1,सफह 73-79