*नौजवान और बुढिया*

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‎Tabassum Shaikh Kashid‎

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सड़क के किनारे एक औरत झुंझलाई सी खड़ी थी। और सामान की गठरी इस के सामने पड़ी थी। वो इस बात की मुन्तजिर थी के कोई मजदुर मिल जाए जो इसका सामान मंजिले मकसूद तक पहोचाए।
इत्तेफाक की बात उधरसे एक नौजवान का गुजर हुआ। परेशान बूढिया को देखकर नौजवान उस बूढिया की जानिब बड़ा ही था के बूढिया ने भी जल्दीसे पुकार लिया और कहेने लगी बेटा मेरे सामान की ये गठरी फलां मुकाम तक पहोंचा दो। मुनासिब सब मजदूरी मिल जायेंगी।
नौजवान ने झुककर सामान को गठरी उठाई और बुढिया के साथ चल पड़ा। रास्ते में बूढिया कहेने लगी देखो बेटा सूना है कोई मोहम्मद(स.) नाम का शख्स है वो हमारे बुतो( मूर्तियों) को बुरा-भला कहता फिरता है। वो अपने बाप दादा के दींन से फिर गया है। मै तो उस के लिए बददुआ करती हूँ और जानते हो मै इस जगह को छोड़ कर क्यू जा रही हूँ? मैंने काबा में बड़े बड़े बुतोसे दरख्वास्त की थी के वो इसे हालाक कर दे। बिजलियाँ गिरा दे मन्नते मांगी मिठाइया चढा़ई। बेटा इससे बचकर रहना। वो बहोत बड़ा जादूगर है जो भी उस की बात सुनता है,उसी का होकर रह जाता है।
बूढिया की मंजिल आ चुकी थी। सामान की गठरी रख कर नौजवान जाने लगा। बूढिया ने उसे रोककर कहा बेटा अपनी मजदूरी तो लेता जा..!
नौजवान ने मासूमियत से जवाब दिया भला ये कौनसा बड़ा काम है जिस की मजदूरी ली जाए। कमजोरों और नादारों की मदद करना तो हर इंसान फ़र्ज था। और भी कोई ख़िदमत हो तो बजा लाऊ।
नौजवान की बातोसे बुढिया बहोत ज्य़ादा मुत्तसिर हुई और कहेने लगी तू बहुत भोला-भाला है। मेरी दुआ है के तू मोहम्मद(स.) के जादू से महफूज रहे। अच्छा बेटा जाते-जाते अपना नाम तो बताता जा।
नौजवान ने कहा,माफ़ करना माँ मेरा नाम मोहम्मद(स.) है। बूढिया उसी वक़्त चीख मारकर आप (स.) के कदमों पर पड़ी। और माफ़ी मांगने लगी हुजुर अकदस (स.) ने इस को दिलासा दिलाया वो फ़ौरन इस्लाम ले आई।