पटाख़ों की आहट : मेरे कानों में बार बार अब भी नश्तर की तरह चुभ रही है!

पटाख़ों की आहट : मेरे कानों में बार बार अब भी नश्तर की तरह चुभ रही है!

Posted by

Javed Khan
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पटाखों की आवाज़ कुछ लोगों के कान से चढ़ कर दिमाग मे नश्तर चुभो गई। हम खेल भावना कहें, देश प्रेम कहें या दिमागी खुराफात, बेशक हम सब को अपने वतन से मोहब्बत है, इसे जताने या बताने या प्रूफ करने की ज़रूरत बिल्कुल नही है, हुआ सिर्फ इतना ही है कि पाकिस्तान किर्केट में जीत गया । जबकि हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी में हम 7-1 से पाकिस्तान से जीत गये।

इन सारी बातों को ध्यान में रख कर मैंने कुछ लोगो से मुलाक़ात की, जानना चाहा कि आखिर ये फितना क्यो बरपा है,पहले मैं आपको बता दूं मैं एक मुस्लिम हूँ मुस्लिम परिपेक्ष में मेरी परवरिश हुई , इसलिए मुसलमानो को मैं बहुत करीब से जनता हूँ। इसलिए शुरुआत मुसलमानों से ही करता हूँ, बुधवारा भोपाल में एक बुजुर्ग जिन्हें सब प्यार से

चच्चा कहते हैं, ये कहने की ज़रूरत नही की उनको अपने मुल्क से बे पनाह मुहब्बत है, उनके मज़े लेने के लिए अक्सर उनके सामने पाकिस्तान की तारीफ करदो तो मां बहन भाई खाला सब एक कर देते हैं, कल मैंने उनसे पूछ ही लिया क्या बात है चच्चा? पाकिस्तान तो मैच जीत गई ,आप कुछ बोले नहीं , वो खामोश रहे , मुझे बड़ी हैरत हुई, ज़्यादा पूछने पर उन्होंने जो कहा उससे मेरा दिल हिल गया, बोले बेटा इस बार भारत के हारने से मुझे ज़्यादा अफसोस नही हुआ, मैं बड़ी हैरत में ? मैंने कहा चच्चा आप ठीक तो हैं, बार बार पूछने पर वो मायूस होकर बोले-जब जब पाकिस्तान से भारत जीतता है कुछ लोग इकठ्ठे हो कर एक धर्म विशेष के नारे लगाते हैं , वो आपस मे तो खूब गले मिलते हैं, खुशियां मनाते हैं, मगर हमे दुश्मन की तरह देखते हैं, कटाक्ष करते हैं, ग़द्दार तक कहकर संबोधित कर जाते हैं,

जैसे वो किर्केट में पाकिस्तान से नहीं हम से लड़कर जीते हैं, ये इन लोगो को क्यों समझ नहीं आती की हम by birth & by choice भारतीय हैं यानि पैदा भी यहीं हुए और हमे पाकिस्तान जाने की भी आज़ादी थी फिर भी हमारे बुज़ुर्गो ने हिंदुस्तान को चुना, ये मेरा देश है, फिर वो आगे बिना बोले मायूस होकर चले गए,
उनकी बातें मेरे कानों में बार बार अब भी नश्तर की तरह चुभ रही है,
शेष….
जावेद खान