पिछली डेढ़ सदी में विश्व-सर्वहारा की जय-पराजयों के लेखे-जोखे पर एक नज़र

Posted by

मुदित मिश्र विपश्यी
====================
आज अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा दिवस है!
हमें आज पिछली डेढ़ सदी में विश्व-सर्वहारा की जय-पराजयों के लेखे-जोखे पर एक नज़र डालनी चाहिए और उसके अनुभवों से रणनीतिक निष्कर्ष निकालने चाहिएं। विगत के इन निष्कर्षों की ठोस नींव पर ही वर्तमान और भविष्य की कार्रवाइयों के लिए लक्ष्य और कार्यक्रम निर्धारित किए जा सकते हैं।
इस डेढ़ सदी की पहली तिहाई में ही, हमारे वक़्त की असाधारण क्रान्तिकारी शक्ति, सर्वहारा ने, खुद को राजनीतिक रूप से संगठित और सशस्त्र किया और पेरिस कम्यून से विजय अभियान शुरू करते हुए, अक्टूबर क्रान्ति में राजनीतिक कार्रवाई के उच्चतम शिखर को छुआ।
अक्टूबर क्रान्ति में विजय ने, ‘सतत क्रान्ति’ के सिद्धांत को अनुमोदित करते हुए, मार्क्सवाद के क्रान्तिकारी सिद्धांत को नई धार दी। लेनिनवाद ने, बोल्शेविज़्म ने, खुद को इसी नई दिशा की ओर पुनर्निदेशित किया जिससे फरवरी से अक्टूबर की ओर तीखा मोड़ संभव हो सका।
सतत क्रान्ति का यह सिद्धांत, जड़सूत्रवाद के सैंकड़ों भिन्न रूपों के विरुद्ध संघर्ष में विकसित हुआ और विजयी अक्टूबर क्रान्ति का बैनर बना।
अक्टूबर क्रान्ति की विजय, पूर्व के पिछड़ेपन ने संभव बनाई थी जो आगे चलकर, विकसित पश्चिम में क्रान्तियों की पराजय और फलतः रूस में क्रान्ति के लंबे अलगाव के चलते, क्रान्ति के रास्ते की प्रमुख बाधा और उसके गले का फंदा साबित हुआ। पिछड़ेपन और अलगाव की इस सड़न पर ही ब्यूरोक्रेटिक प्रतिक्रिया की वह फफूंद उगी, जिसके बैनर पर लिखा था- स्टालिनवाद!
दुनिया और इतिहास के सबसे विकसित संपत्ति और सामाजिक संबंधों के बीचों-बीच, जारशाही रूस की घृणित विरासत ने, दमनकारी, क्रांतिविरोधी, ब्यूरोक्रेटिक सत्ता ने पुनर्जन्म लिया और क्रान्ति को नष्ट करना शुरू कर दिया। असीमित हिंसा और खूनखराबे के बीच, जिसमें लेनिन की समूची केंद्रीय समिति के सदस्यों सहित, अक्टूबर क्रान्ति के, पार्टी और लाल सेना के तमाम शीर्ष नेताओं और लाखों साधारण जांबाज़ कार्यकर्ताओं की हत्या शामिल हैं, प्रतिक्रांति ने विजय हासिल की। इस ब्यूरोक्रेटिक प्रतिक्रांति ने ‘एक देश में समाजवाद’ की पताका ऊंची करते हुए, विश्व समाजवादी क्रान्ति के महान लक्ष्य से खुला घात किया और उससे लहू की आखिरी बूंद को भी निचोड़ डाला।
पिछली सदी का इतिहास, अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा की एक के बाद दूसरी पराजयों का मनहूस इतिहास है।
हम इन पराजयों के ही दौर में रह रहे हैं जिनके चलते विश्व सर्वहारा की कतारें बिखरी हुई हैं और एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में सर्वहारा, विश्व परिदृश्य से गायब है।
इसके बावजूद, अक्टूबर क्रान्ति की अप्रतिम विजय और डेढ़ सदी की पराजयों का वृहत अनुभव, हमारे हाथ में मौजूद है। क्रान्ति के लिए, समाजवाद के निर्माण के लिए सभी वस्तुगत पूर्वापेक्षाएं मौजूद हैं। सिर्फ सर्वहारा और उसके नेतृत्व की राजनीतिक वर्ग-चेतना, स्टालिनवाद के जहरीले शिकंजे के चलते, पिछड़ गई है। परिपक्व वस्तुस्थिति और अपरिपक्व आत्मगत चेतना के बीच इस शून्य को भरना ही आज क्रान्ति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती के स्वीकरण का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है- विगत के क्रान्तिकारी संघर्षों के निष्कर्षों का समायोजन करते हुए, उनके आधार पर क्रान्तिकारी कार्यक्रम का निर्माण और इसके गिर्द विश्व-सर्वहारा की अंतरराष्ट्रीय पार्टी का निर्माण!
कार्यक्रम के लिए यह संघर्ष, क्रान्तिकारी मार्क्सवाद से विजातीय प्रवृत्तियों, विशेष रूप से बूर्जुआ राष्ट्रवाद, निम्न-बूर्जुआ क्रान्तिवाद, सामाजिक जनवाद और सबसे ऊपर अक्टूबर क्रान्ति का गला घोंटने वाले स्टालिनवाद और उनके भिन्न रूपों के विरुद्ध संघर्ष है!