पैग़म्बरे इस्लाम सअव का स्वर्गवास और हज़रत इमाम हसन की शहादत : विशेष

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28 सफ़र सन 11 हिजरी क़मरी को मदीना नगर में 63 वर्ष की आयु में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का निधन हुआ और इसी शहर में उन्हें दफ़्न किया गया।

इसके लगभग चार दशक बाद 28 सफ़र सन 50 हिजरी क़मरी को उनके नवासे हज़रत इमाम हसन को मुआविया के कारिंदों ने ज़हर देकर शहीद कर दिया। पैग़म्बरे इस्लाम का निधन और उनके नवासे की शहादत इस्लामी जगत के लिए अत्यंत दुखद घटनाएं थीं।

पैग़म्बरे इस्लाम अपने जीवन के अंतिम दिनों में बीमार पड़ गए थे। एक दिन वे बीमारी की अवस्था में ही मस्जिद गए और सुबह की नमाज़ के बाद उन्होंने कहा कि हे लोगो! मैं शीघ्र ही अपने पालनहार से मुलाक़ात करूंगा और तुम लोग प्रलय में कौसर नामक हौज़ पर मेरे पास पहुंचोगे। वहां मैं तुमसे ईश्वर की किताब और अपने परिजनों के बारे में प्रश्न करूंगा तो इस बात पर ध्यान रखो कि तुम मेरे बाद उनके साथ कैसा व्यवहार करते हो क्योंकि ईश्वर ने मुझे सूचित कर दिया है कि ये दोनों प्रलय में मुझसे मिलने तक एक दूसरे से अलग नहीं होंगे। अवगत रहा कि मैंने इन दोनों को तुम्हारे बीच छोड़ दिया है तो इनसे आगे बढ़ने की कोशिश न करना कि तुम बिखर जाओगे और इन्हें छोड़ कर पीछे भी न रह जाना कि तुम तबाह हो जाओगे।

इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने घर की ओर चल पड़े। लोग आंखों में आंसू लिए ईश्वर के अंतिम पैग़म्बर को विदा कर रहे थे और वे अपने अंतिम समय में भी लोगों से एक दूसरे के अधिकारों पर ध्यान देने की सिफ़ारिश कर रहे थे। फिर उन्होंने कहा कि मेरे भाई और मित्र को यहां बुलाओ। पैग़म्बर की पत्नी उम्मे सलमा ने कहा कि अली को बुलाओ कि पैग़म्बर का तात्पर्य उनके अलावा किसी और से नहीं है। जब हज़रत अली आए तो पैग़म्बर ने उन्हें निकट आने का इशारा किया। फिर उन्हें गले से लगा कर देर तक धीमे स्वर में बातें करते रहे और फिर बेहोश हो गए। यह देख कर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नवासे इमाम हसन और इमाम हुसैन रोने लगे और उन्होंने अपने आपको पैग़म्बर के शरीर पर गिरा दिया। हज़रत अली ने उन दोनों को हटाना चाहा कि उसी समय पैग़म्बर होश में आ गए और उन्होंने कहाः हे अली! इन दोनों को यहीं रहने दो ताकि मैं उनकी सुगंध सूंघूं और और वे मेरी सुगंध सूंघें।

अंततः पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम इस दुनिया से सिधार गए। उनका निधन ऐसी स्थिति में हुआ कि उनका सिर हज़रत अली अलैहिस्सलाम की गोद में था। हज़रत अली ने लोगों को पैग़म्बर के निधन की सूचना दी। यह ख़बर पूरे इस्लामी समुदाय के लिए अत्यंत दुखद थी। हज़रत अली के शब्दों में यह दुख इतना बड़ा था कि मानो घर की दीवारें और दरवाज़े भी विलाप कर रहे थे। उन्होंने कहाः हे ईश्वर के पैग़म्बर! मेरे माता-पिता आप पर क़ुर्बान। आपकी मौत से वह रिश्ता टूट गया जो किसी और की मौत से नहीं टूटा था और वह पैग़म्बरी और ईश्वरीय संदेश का रिश्ता है। आपकी मौत का दुख हमेशा मेरे अस्तित्व में बाक़ी रहेगा और आपकी मौत के दुख के सामने सारे दुख हीन हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपनी पैग़म्बरी के 23 वर्षों में जो काम किए वे मानव इतिहास की सबसे अहम सफलताओं के रूप में याद किए जाते हैं। उन्होंने एक नए समाज को अस्तित्व प्रदान किया, अरब को क़ुरआने मजीद पर आधारित एक राजनैतिक व सामाजिक ढांचे के अंतर्गत एकजुट किया और अपने अनुयाइयों के हृदय व मन में ईमान का शासन स्थापित किया। उनके अनुयाइयों ने उनका संदेश दुनिया के कोने-2 तक पहुंचा दिया। इस आधार पर कहा जाता सकता है कि इतिहास पर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का प्रभाव, मानव इतिहास के पन्नों पर अंकित हर चीज़ से अधिक व गहरा है।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने जिस सभ्यता का आधार रखा था उसकी एक अहम विशेषता सहनशीलता थी। जिसे उन्होंने उस समय के अरब जगत में प्रचलित जातीय व धार्मिक कट्टरता के स्थान पर पेश किया था। उन्होंने व्यवहार में संतुलन व मध्यमार्ग का रास्ता पेश करके विभन्न प्रकार के मानव ज्ञानों, कलाओं और उद्योगों के प्रसार का मार्ग समतल किया। अमीरका के प्रख्यात इतिहासकार व लेखक विल डुरेन्ट अपनी प्रसिद्ध किताब सभ्यता का इतिहास में लिखते हैं कि मुहम्मद ने मरुस्थल में बिखरे हुए और मूर्तियों की पूजा करने वाले क़बीलों से एक एकजुट समुदाय बनाया। उन्होंने यहूदी और ईसाई धर्म और अरबों के प्राचीन धर्म से श्रेष्ठ एक सरल, सादा, स्पष्ट और मज़बूत धर्म पेश किया जिसके मानने वाले अत्यंत साहसी थे और जिन्होंने थोड़े ही समय में एक महान शासन खड़ा कर दिया और हमारे समय में भी यह एक अहम ताक़त है जो आधे संसार पर प्रभाव रखती है।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के बड़े नवासे हज़रत इमाम हसन लगभग छः साल की आयु तक अपने नाना की छत्रछाया में रहे थे और उन्होंने देखा था कि किस प्रकार नाना हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके पश्चात माता हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा और पिता हज़रत अली ने इस्लाम की रक्षा करते हुए विभिन्न कठिनाइयों व षड्यंत्रों के विरुद्ध संघर्ष किया था।हज़रत इमाम हसन ने भी इन्हीं हस्तियों के पदचिन्हों पर चलते हुए अंतिम सांस तक ईश्वर के अंतिम धर्म इस्लाम के सिद्धांतों व मूल्यों की रक्षा की।

हज़रत अली की शहादत के बाद हज़रत इमाम हसन ने इमामत अर्थात समाज के नेतृत्व व मार्गदर्शन का पद संभाला। उनकी इमामत कूफ़ा नगर से आरंभ हुई जो हज़रत हज़रत अली के शासन का केंद्र था। इमामत के आरंभ में ही उन्हें हज़रत मुआविया के शासक का सामना हुआ जो हज़रत अली के ख़िलाफ़ भी युद्ध कर चुका थे । कूफ़े के लोगों ने बड़ी संख्या में इमाम हसन के आज्ञापालन का प्रण लिया लेकिन उनमें निष्ठावान और विश्वसनीय लोग कम ही थे। उनमें से अधिक लोगों के अपने अपने हित व उद्देश्य थे जिनके चलते उन्होंने हज़रत इमाम हसन की बैअत की थी। इमाम हसन के मुक़ाबले में हज़रत मुआविया अपनी सत्ता मज़बूत बनाने की कोशिश में लगे हुये थे, जिसके चलते कम ही लोग थे जो पूरी सच्चाई और निष्ठा के साथ हज़रत इमाम हसन का साथ दे सकते थे।

इस प्रकार की स्थिति में इमाम हसन ने ऐसे चरित्रवान लोगों के प्रशिक्षण का प्रयास किया जो हर तरह का बलिदान देने के लिए तैयार हों लेकिन इस प्रकार के लोगों की संख्या बहुत कम थी जिसके कारण हज़रत इमाम हसन, हज़रत मुआविया से युद्ध नहीं कर सकते थे। उन्होंने बड़े दुखी मन से कहा कि ईश्वर की सौगंध! अगर मेरा साथ देने वाले होते तो मैं कभी युद्ध से हाथ नहीं खींचता। इन परिस्थितियों में जब हज़रत मुआविया ने हज़रत इमाम हसन के सामने संधि का प्रस्ताव रखा और उनकी हर शर्त को मानने की बात कही तो उन्होंने उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया क्योंकि इस तरह इस्लाम की भी रक्षा होती और हज़रत इमाम हसन के अनुयाइयों की जान भी सुरक्षित रहती। यूं हज़रत इमाम हसन ने इस वास्तविकता को दर्शा दिया कि सत्य की रक्षा के विरुद्ध संघर्ष में समय और परिस्थितियों के अनुसार फ़ैसला करना चाहिए ताकि अनावश्यक रक्तपात न हो और वांछित परिणाम भी सामने आ जाए।

हज़रत मुआविया से संधि के बाद इमाम हसन मदीना नगर को लौट गए और नए रूप में अपनी राजनैतिक, सांस्कृतिक व वैचारिक गतिविधियां आरंभ कर दीं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर उमवी शासक हज़रत मुआविया के अत्याचारों और इस्लाम विरोधी क्रियाकलापों पर प्रकाश डाल कर जनता को मुआविया की सच्चाई से अवगत कराया। मुआविया से संधि के बावजूद इमाम हसन उसकी इस्लाम विरोधी और जनता को धोखा देने वाली कार्यवाहियों पर चुप नहीं बैठे बल्कि निरंतर जनता को सत्य व वास्तविकता का मार्ग दिखाते रहे। चूंकि मुआविया अपने काम, इस्लाम के नाम पर और इस्लाम की आड़ में किया करता था इस लिए धर्म में परिवर्तन और भ्रष्टाचार का ख़तरा बढ़ गया था। इस आधार पर इमाम हसन अलैहिस्सलाम की अधिकतर वैचारिक व सांस्कृतिक गतिविधियां, शुद्ध इस्लामी सिद्धांतों व आदेशों को जनता के समक्ष पेश करने पर केंद्रित थीं ताकि जनता सही व ग़लत का फ़ैसला ख़ुद कर सके। वे लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का अनुसरण करने का निमंत्रण देते थे और सद्कर्मों के लिए उन्हें प्रोत्साहित करते रहते थे।

इमाम हसन के प्रयासों से जनता को पता चल गया कि मुसलमानों के नेतृत्व का अधिकार केवल पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों को है और हज़रत मुआविया ने ख़िलाफ़त हथिया रखी है। इसके बाद हज़रत मुआविया के ख़िलाफ़ आंदोलन का मार्ग समतल होने लगा । उसके सलाहकारों ने उसे बताया कि इमाम हसन ने अपने पिता हज़रत अली की याद ताज़ा कर दी है जिससे उसकी सत्ता ख़तरे में पड़ गई है। हज़रत मुआविया ने अपनी सत्ता बचाने के लिए इमाम हसन के अस्तित्व को समाप्त करने का फ़ैसला किया और अंततः उसने एक षड्यंत्र रचा और इमाम हसन की एक पत्नी के माध्यम से उन्हें ज़हर दे दिया। इस तरह 28 सफ़र सन 50 हिजरी क़मरी को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के प्राणप्रिय नवासे हज़रत इमाम हसन शहीद हो गए।