पौन घण्टे कतार में लग दर्शन कर एस.पी. मिश्र और जिलाधीश गढ़पाले ने गढ़ी समानता की नज़ीर

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खण्डवा (इस्माईल खान) – वर्तमान परिदृश्य में जहां एक और छोटे कर्मचारियों और सरकारी बाबुओं में आम जन के समक्ष खुद को साहब कहलवाने की होड़ लगी दिखती है तो वहीं ऐसे नकारत्मक दृश्यों पर जिले की एक सकारात्मक घटना उच्च अधिकारियों के त्याग, समर्पण और जन मानस के प्रति अपने कर्त्तव्यनिष्ठा का बोध कराती हुई प्रतीत होती है ।

जिला मुख्यालय के अंतर्गत आने वाले भगवान ओंकारेश्वर के मंदिर को देश विदेशों में कौन नहीँ जानता किन्तु महापर्वों के दौरान आस्था के सैलाब में गोते लगती भीड़ जब ओंकार भक्ति में लीन होकर मंदिर परिसर में उमड़ती है तो प्रशासन के द्वारा की गई सारी व्यवस्थाएं बौनी दिखाई देती है । यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का जब इन अव्यवस्थाओं से सामना होता है तो ये तो भगवान ओंकार ही जानते होंगे कि उनके भक्त प्रशासन को सद्बुद्धि प्रदान करने की मनोकामना करते जाते हैं या कुछ और । किन्तु शायद अब भविष्य में आने वाले श्रद्धालु अपने हरेक कदम पर प्रशासन के हक में प्रार्थना करते दुआ देते ही दिखेंगे जो मुमकिन हो पायेगा आज हुई इस अविस्मरणीय घटना से ।

 

अवतार की कतार में खास बने आम…

जिले में स्थित ओम्कारेश्वर वैसे तो ज्योर्तिलिंग के कारण देश और दुनिया मे जाना पहचाना जाता है, लेकिन आज ओम्कारेश्वर ने नई इबारत लिखकर श्रद्धालुओं को आम और खास से ऊपर उठकर समानता के भाव की महत्ता को महत्व दिया, और इस नायब नजीर के वाहक बने खंडवा जिले के नवागत जिलाधीश महोदय विशेष गढ़पाले और एस.पी.मेडम रुचिवर्धन मिश्र ।

दरअसल शुक्रवार को अधिक मास होने के कारण श्रदालुओं की भीड़ लगभग 10 हजार को पार कर गई, ऐसे में कुछ लोग खास बनकर जहां वी आई पी द्वार से प्रवेश करने को आतुर दिखे वहीं जिले की दो महान शख्सियत को आम आदमी की लाइन में 40 मिनिट खड़ा देख हर कोई दांतो में उंगली लिए खड़ा था। सावन माह और उचित अवसरों में धर्मप्रेमियों को किन किन तकलीफों से दो चार होना पड़ता है इस हेतु आज इन्होंने खुद कतार में लगकर इसका कारण जानने के लिए आम लोगों के साथ मिलकर दर्शन किये, और होने वाली परेशानियों को करीब से जानकर इसके निष्पादन के लिए उचित व्यवस्था के कठोर निर्देश दिए।

जिले भर में इन अधिकारियों के इस कार्य की चर्चा आज दिन भर जोरों से चलती रही की भगवान के दरबार मे कोई छोटा या बड़ा नही होता ये साबित कर दिया इन दोनों नवागत उच्चाधिकारियों ने । ऐसे कर्मप्रधान अधिकारियों को देखकर किसी शायर की ये पंक्तियाँ बरबस ही मुझे याद आ रही हे-

“एक ही सफ़ में खड़े हो गए मेहमुदों अयाज़,
न कोई बन्दा रहा न कोई बन्दा नवाज़।”