फ़िलिस्तीनी मुद्दे के हल पर एक नज़र

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फ़िलिस्तीन संकट, पिछले 70 वर्षों से मध्यपूर्व के चुनौती भरे मुद्दों में से एक है।

फ़िलिस्तीन संकट, पिछले 70 वर्षों से मध्यपूर्व के चुनौती भरे मुद्दों में से एक है। यह मुद्दा इतना संवदेनशील है कि इसने पश्चिम एशिया के संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा को बहुत अधिक प्रभावित किया है जिसके कारण क्षेत्र में बहुत से युद्ध, संकट और रक्तपात हुए। वर्ष 1948, 1956,1973,1967,1982,2006,2008, और वर्ष 2014 के वर्षों में कई युद्ध शुरु किए गये, फ़िलिस्तीनियों की धरती पर क़ब्ज़ा किया गया, लाखों लोगों को घर बार छोड़ने पर विवश किया गया, सरकारी आतंकवाद से अप्रैल 1948 में दैरे यासीन और कफ़र क़ासिम गांवों में फ़िलिस्तीनियों का व्यापक स्तर पर जनसंहार किया गया, सितम्बर 1982 में सबरा और शतीला कैंप में हज़ारों फ़िलिस्तीनी और लेबनानी महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को मौत के हवाले कर दिया गया, प्रतिदिन व्यवस्थित रूप से फ़िलिस्तीनियों का जनसंहार होने लगा और उसके बाद सीरिया की गोलान हाइट्स सहित पड़ोसी देशों की धरती पर अवैध क़ब्ज़े शुरु हो गये, लेबनान के शबआ फ़ार्म को हड़प लिया गया, संकट की आग में घी का काम करने के लिए सीरिया, इराक़ और यमन में हस्तक्षेप किया गया और आतंकवादियों का समर्थन किया गया, यह सब क्षेत्र में अवैध ज़ायोनी शासन के जीवन को लंबा करने के लिए ज़ायोनियों के काले कारनामों के हिस्से हैं।

इन सब बातों पर ध्यान देने से पता चलता है कि मध्यपूर्व का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा जो क्षेत्र के लिए निर्णायक होता है, वह फ़िलिस्तीन का मुद्दा है और ज़ायोनी शासन के अतिग्रहण को समाप्त करने का विषय है।

अब सवाल यह पैदा होता है कि इस विस्तृत संकट को कैसे हल किया जाए?

मिस्र के नेतृत्व में अरब देशों ने इस्राईल के साथ टकराव की रणनीति अपनाई किन्तु अभी तक कुछ हो नहीं सका। अरब देशों ने फ़िलिस्तीन के मुद्दे को अरबों और इस्राईल की लड़ाई के तौर पर पेश करने का प्रयास किया और इसको अरबों का विशेष मुद्दा बनाकर पेश किया किन्तु पश्चिम द्वारा ज़ायोनी शासन के समर्थन के बाद इस्राईल के साथ होने वाले युद्ध में अरब सेनाएं पराजित हुईं। इस्राईल के सामने अरब देशों की कुछ न चलने के बाद सऊदी अरब, मिस्र और जार्डन के नेतृत्व में ज़ायोनी शासन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की साज़िशें शुरु हो गयीं। इस बीच कुछ अरब देशों को स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी देश के गठन की आशा है और उन्होंने दुनिया में अतिग्रहण की समाप्ति और फ़िलिस्तीनी देश के गठन का सुझाव पेश किया।

वर्ष 1993 में ओस्लो समझौता हुआ और उसके बाद वर्ष 2002 में सऊदी अरब की ओर से अरब शांति योजना पेश की गयी। यद्यपि इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि इस्राईल ने कभी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों, प्रतिबद्धताओं और वचनों का पालन नहीं किया और उसने ज़ायोनी बस्तियों का निर्माण जारी रखा बल्कि उसको तेज़ कर दिया। बहरहाल अमरीकी सत्ता में डोनल्ड ट्रम्प के पहुंचने और उनके द्वारा ज़ायोनी शासन के भरपूर समर्थन के कारण अरब देशों की शांति योजना पूरी तरह से बंद गली में पहुंच गयी है। इस बंद गली से निकलने के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात सहित कुछ देशों ने बैतुल मुक़द्दस को बेचने और ट्रम्प की योजना का फ़िलिस्तीनियों द्वारा समर्थन किए जाने की अपील की है। इस योजना में कुछ लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनकी ज़िम्मेदारी क्या है जबकि कुछ पश्चिम के अनुसरणकर्ता है और जबकि कुछ अमरीका और ज़ायोनी शासन के कार्यक्रम का खुलकर विरोध करने का साहस ही नहीं रखते।

इसी मध्य इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने रविवार की शाम विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसरों, बुद्धिजीवियों और विचारकों से मुलाक़ात में ग़ज़्ज़ा और बैतुल मुक़द्दस में ज़ायोनी शासन के अपराधों पर यूरोप के मौन की आलोचना करते हुए कहा कि ऐतिहासिक फ़िलिस्तीन देश में किस प्रकार की सरकार हो इसके लिए दुनिया में प्रचलित शैली और उस शैली का प्रयोग होना चाहिए जिसे जनमत स्वीकार करे।

वरिष्ठ नेता ने कहा कि ऐतिहासिक फ़िलिस्तीन देश में किस प्रकार की सरकार हो इसके लिए दुनिया में प्रचलित शैली का प्रयोग होना और उस शैली का प्रयोग होना चाहिए जिसे जनमत स्वीकार करे और इसमें समस्त वास्तविक फ़िलिस्तीनियों से चाहे वह मुस्लिम हों, यहूदी हों, या ईसाई हों जो कम से कम 80 वर्षों से इस धरती पर थे, चाहे वह विदेश में हों या अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में हों, पूछा जाए और जनमत संग्रह हो।

वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस्लामी गणतंत्र ईरान का यह सुझाव जो आधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ में पंजीकृत है, क्या दुनिया में प्रचलित मापदंडों के अनुसार नहीं है? तो फिर यूरोप इसको समझने को तैयार क्यों नहीं है।

वरिष्ठ नेता ने बच्चो के हत्यारे ज़ायोनी प्रधानमंत्री के यूरोप दौरे के दौरान स्वयं को अत्याचारग्रस्त दिखाने के ढोंग की ओर संकेत करते हुए कहा कि यह अपराधी, इतिहास के समस्त अत्याचारों का सरदार है और यूरोपीयों से उसने झूठ बोला कि ईरान हमें और कुछ लाख यहूदियों को तबाह करना चाहता है जबकि ईरान द्वारा फ़िलिस्तीन मुद्दे के समाधान के लिए पेश किया गया सुझाव पूर्ण रूप से तार्किक और लोकतंत्र के मापदंडों के अनुरूप है।

दूसरे आयाम से देखने से पता चलता है कि ज़ायोनी शासन के अवैध अस्तित्व को जारी रखने के लिए इस और उसके पश्चिमी समर्थकों ने फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों का घोर हनन कर रखा है और ईरान की ओर से पेश की गयी योजना, मध्यपूर्व और पश्चिमी एशिया में शांति स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।