बेशक अल्लाह से कुछ भी छुपा हुआ नहीं है

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Sikander Kaymkhani
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क़ुरआन वह किताब है जो इंसानो के पालनहार ईश्वर की तरफ से सारी इंसानियत के मार्गदर्शन के लिये भेजी गई है. इसमे उन तमाम मूलभूत सवालों का जवाब है जो हर इंसान जानना चाहता है यानी यह की यह मनुष्य, सृष्टि, और जीवन क्या है?, जीवन से पहले क्या था और जीवन के बाद क्या है? इंसान की अपनी हैसियत इस सृष्टी मे क्या है?

जीवन की हर समस्या इंसान के सामने एक प्रश्न चिन्ह लगाती है और हर इंसान इस बात को अच्छी तरह समझता है की वोह अपनी समझ और शक्ति के एतबार से बहुत सीमित है इसलिये दूसरे के बारे मे तो क्या वोह अपने बारे मे भी कोई बात यक़ीन के साथ नही कह सकता है की उसके लिये क्या अच्छा है और क्या बुरा है? तो इससे बढी बेवक़ूफी क्या हो सकती है की वोह दूसरो का मर्ग दर्शन करने लगे?

इससे पता चलता है की इंसान किसी खुदाई (दिव्य) मार्गदर्शन का मोहताज है. खुदा ने यह दिव्य मार्गदर्शन अपने पैग़म्बरो के द्वारा हर समय मे भेजा है. और अब आखरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के द्वारा क़ुरआन भेजा जो क़ुरआन है. यह सारे इंसानो के लिये कयामत (प्रलय) के दिन तक के आखिरी मार्ग दर्शन है.

बेशक अल्लाह से कुछ भी छुपा हुआ नहीं है, वह भी नही जिसे आज का तुच्छ मनुष्य जान कर इतरा रहा है और वह भी नही जो उसने अभी भी नही जाना और वह भी नही जो वोह कभी भी नही जान सकेगा, मगर चूंकी उसने इंसान को पैदा किया इसलिए वोह इस इंसान की सिमित बुद्धी और क्षमता को ध्यान मे रखते हुऐ अपनी किताब क़ुरआन मजीद और पैगम्बर की सुन्नत के ज़रिये इतनी ही जानकारी पहुँचाई जितनी इंसान के लिए ज़रूरी है और जिसे वोह आसानी से ग्रहण कर सके जो उसकी मूलभूत जरूरतों से जुडी हुई है.

रही विज्ञान और इंसान के फायदे के दूसरे विषय जिस से इंसान फायदे हासिल करता है तो उसके लिये सारे जीवो से बहतर बुद्धी प्रदान की है. अगर खुदा सारी बातें बताने लगता तो यह कभी ना खत्म होने वाली किताब बन जाती.

कुरआन का विषय है की इंसान का खुदा के साथ क्या सम्बन्ध है, खुद इंसान का अपने आप से क्या सम्बन्ध है और दूसरे के साथ उसका क्या समबन्ध है. यही वोह सवाल है जिसकी खोज मे हर इंसान है और जो इंसान अपने दिमाग से हल नही कर सकता है. अगर करेगा तो सारे स्रष्टी में त्राही-त्राही फैल जाऐगी जैसा की हम आज देख रहे है.

रहा इस बात का सवाल की खुदा बार-बार क्यो दोहराता है की ‘वह सब जानता है’ तो चूंकी अल्लाह ने इंसान की रचना की तो वोह बेहतर समझ सकता है की इंसान को अपनी बात समझाने के लिये कौन सा अन्दाज़ बेहतर हो सकता है. असल मे विचारविमर्श करने का मुद्दा यह नही है जो आप ने उठाया है. असल मुद्दा यह है की क़ुरआन अल्लाह (सारे मनुष्यों का इश्वर) की तरफ से भेजी हुई किताब है की नही? क्योकी अगर कोई यह समझ में आ जाऐ कि कुरआन इंसानो के इश्वर के तरफ से भेजी हुई किताब है तो आगे इस तरह के फिज़ूल सवालो की गुंजाइश नहीं रहती है.