भगतसिंह, नेहरू और भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री……..अव्यक्त

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Pawan Karan
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9 अगस्त, 1929 को जवाहरलाल नेहरू लाहौर सेंट्रल जेल में भगतसिंह और उनके साथियों से मिलने गए थे। प्रसंगशः उल्लेख करना पड़ रहा है कि नेहरू उस दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे।

अगले दिन यानी 10 अगस्त, 1929 को ‘दी ट्रिब्यून’ अखबार में इसपर एक रिपोर्ट भी छपी थी।

जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के विरोध में भगतसिंह और उनके साथी उस समय भूख हड़ताल पर थे। नेहरू ने जेल प्रशासन से उनकी पैरवी भी की थी और बाद में जेल प्रशासन का रवैया संभवतः बदला भी था।

अपनी आत्मकथा में नेहरू ने भगतसिंह से अपनी मुलाकात बारे में कुछ इस तरह लिखा है-

“जब (जेल में भगतसिंह और जतीन्द्रनाथ दास की) भूख-हड़ताल एक महीने तक चल चुकी थी, उस दौरान मैं इत्तफाक से लाहौर पहुंचा। मुझे कुछ कैदियों से जेल में मिलने की इजाजत दे दी गई, और मैंने इसका फायदा उठाया। भगतसिंह से यह मेरी पहली मुलाकात थी।

…मैं जतीन्द्रनाथ दास वगैरह से भी मिला। भगतसिंह का चेहरा आकर्षक था और उससे बुद्धिमत्ता टपकती थी। वह निहायत गंभीर और शांत था। उसमें गुस्सा नहीं दिखाई देता था। उसकी दृष्टि और बातचीत में बड़ी मृदुलता थी।

…मगर मेरा खयाल है कि कोई भी शख्स जो एक महीने तक उपवास करेगा, आध्यात्मिक और मृदुल दिखाई देने लगेगा। …भगतसिंह की खास हसरत अपने चाचा सरदार अजितसिंह, जो 1907 में लाला लाजपतराय के साथ जिला-वतन कर दिए गए थे, से मिलना या कम से कम उनकी खबर पाना मालूम हुई।“

स्रोत- मेरी कहानी (पंडित जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा), पृष्ठ- 338-339, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली, 1938

इस बात की पूरी संभावना है कि हमारे प्रधानमंत्री जी को उनके सलाहकारों ने बाद में भी यह बात नहीं बताई होगी। यह जनक और याज्ञवल्क्य वाला भारत नहीं है। यह राजा कृष्णदेव राय और तेनालीराम वाला भारत नहीं है। यह अकबर और बीरबल वाला भारत नहीं है।

चाटुकारों की फौज से घिरे रहनेवाले सत्तासीनों का भारत है यह। कहावत में है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे! इसलिए भाषण संबंधी उनकी रिसर्च-टीम के लोगों ने भी सोचा होगा कि प्रधानमंत्री जी के ज्ञानवर्द्धन करने की हिम्मत कौन करे!

तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है- सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।। यानी मंत्री, वैद्य और गुरु- ये तीन यदि नाराजगी के डर या लाभ की आशा से हित की बात न कहकर ठकुरसुहाती कहने लगते हैं, तो राज्य, शरीर और धर्म- इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।

प्रधानमंत्री के बड़े-से-बड़े शुभचिंतक भी ऐसा कभी नहीं चाहेंगे कि वह दूसरी बार ऐसी तथ्यात्मक गलती करके अपनी छवि खराब करें, इसलिए उनके हितार्थ यह बात दुहराई जा रही है।

वैसे प्रधानमंत्रीजी इस प्रसंग में न ही पड़ते तो अच्छा था। क्योंकि भगतसिंह के मामले में उस राजनीतिक परंपरा से जुड़ी संस्थाओं का इतिहास बहुत अच्छा नहीं है, जिससे प्रधानमंत्रीजी स्वयं संबंध रखते हैं। बल्कि भगतसिंह को फांसी के बाद कानपुर में दंगे भड़काकर उनकी संप्रदायमुक्त छवि को धूमिल करने का काम मूढ़ हिंदुवादिता के शिकार लोगों ने जरूर किया था।

इस पर महात्मा गांधी ने 26 मार्च, 1931 को कांग्रेस के करांची अधिवेशन में कहा था-

“अखबारों से पता चलता है कि भगत सिंह की शहादत से कानपुर के हिन्दू पागल हो गए, और भगतसिंह के सम्मान में दुकान न बंद करनेवालों को धमकाने लगे। नतीजा आपको मालूम ही है। मेरा विश्वास है कि अगर भगतसिंह की आत्मा कानपुर के इस कांड को देख रही है, तो वह अवश्य गहरी वेदना और शरम अनुभव करती होगी।”

इस आलेख का उद्देश्य आज की ‘कांग्रेस पार्टी’ का बचाव करना या उसका पक्ष लेना नहीं है। इस आलेख का उद्देश्य है मनगढंत कहानियों से भरे इतिहास के राजनीतिक दुरुपयोग की पूरी परिघटना पर चिंतन करना। चाहे वह दुष्प्रचार जिस किसी भी दल या संस्था द्वारा किया जा रहा हो।

ऐसा नहीं है कि यह केवल भारत में ही हो रहा है। दुनिया भर में यह प्रवृत्ति आज जोरों पर है। बल्कि अब तो समाज-वैज्ञानिक से लेकर मनोवैज्ञानिक तक इस प्रवृत्ति का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं।

इसे ‘हिस्टोरिकल रिविज़निज़्म’ (ऐतिहासिक संशोधनवाद) या हिस्टोरिकल निगेशनिज़्म/डिनायलिज़्म (ऐतिहासिक नकारवाद) का नाम दिया गया है।

लेकिन भारत में व्हाट्सएप और यूट्यूब के माध्यम से और राजनेताओं के द्वारा परोसे जानेवाले इतिहास की स्थिति तो यह हो गई है कि इसे ‘ऐतिहासिक मनगढंतवाद या झूठवाद’ का नाम दे देना चाहिए।

यह किसी सभ्य और जागरूक समाज की निशानी नहीं है। अपने ही ऐतिहासिक महापुरुषों और महास्त्रियों का चरित्र-हनन कर नवपीढ़ियों को कुंठित मानसिकता का बनाया जा रहा है। समाज में द्वेष और विभाजन पैदा करनेवाली ऐतिहासिक शख्सियतों का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

यह लोगों की स्मृतियों से खेलने का सुनियोजित प्रयास है। हो सकता है भविष्य में ऐतिहासिक रिकॉर्डों से भी छेड़छाड़ की जाए। आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों को भी अजीबोगरीब नकारात्मक तथ्यों से भर दिया जाए।

सवाल है कि लोग, खासकर ‘नई सोच’ वाली युवा-पीढ़ी भी क्यों इसे हाथोंहाथ ले रही है? इसका कारण है कि भारत में इतिहास का ज्ञान स्कूली शिक्षा से अधिक सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अधिक होता है। परिवार और पड़ोस के प्रौढ़ और बुजुर्ग अपनी-अपनी तरह का इतिहास बच्चों के सामने परोसते हैं।

टीवी धारावाहिकों से लेकर सिनेमा तक इतिहास को अपने तरीके से प्रस्तुत करते रहे हैं, जिसका असर लंबे समय तक लोगों के दिमाग पर रहता है। भारत में सामाजिक विज्ञान को ठीक से पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति का नितांत अभाव रहा है।

विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गुणवत्ता के स्तर में भी भारी विषमता मौजूद है। स्कूल से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक अध्यापकों और पुस्तक-लेखकों का अपना पूर्वाग्रह हावी रहता है। इसके अलावा युवाओं का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो स्कूली स्तर के बाद सामाजिक विज्ञान के अध्ययन से पूरी तरह कट जाता है।

ऐसे किशोर और युवा विचारधारा, परिप्रेक्ष्य, उपागम और हिस्टोरिओग्राफी जैसी चीजों को समझने से कोसों दूर रह जाते हैं। मूल स्रोतों को पढ़ने-समझने, जांचने-परखने या उसे मानवीय नज़रिए से देखने की इच्छा और उदारता उनमें नहीं के बराबर होती है।

इसका कारण है कि अपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश, जाति, धर्म और आय-वर्ग इत्यादि पूर्वाग्रहों से प्रभावित अन्यान्य स्रोतों से उन्हें जो भी इतिहास-ज्ञान मिलता रहता है, उसे ही वह एकमात्र सत्य समझकर लड़ने-मारने पर उतारू रहते हैं।

आज भले ही हमारे राजनेताओं को यह अच्छा और फायदे का सौदा लग रहा हो, लेकिन है यह आत्मघाती ही। कई-कई पीढ़ियों को आप सामाजिक बुद्धिमत्ता और चिंतनशीलता से वंचित कर रहे हैं। उन्हें बौद्धिक रूप से अवैज्ञानिक और अंधविश्वासी बना रहे हैं।

उनकी सहजबुद्धि या कॉमन-सेंस तक को पंगु बना रहे हैं। यही लोग आगे जाकर परिवार, समाज और देश में जिम्मेदार पदों पर आसीन होंगे। शासन और कार्य-व्यापार चलाएंगे। कोई बताए कि ऐसे देश और समाज का भविष्य फिर क्या होगा?

इतिहास का वास्तविक उद्देश्य अतीतोन्मुखी बनाना नहीं, बल्कि भविष्योन्मुखी बनाना होना चाहिए। सच है कि पहले भी इतिहास और इतिहास-लेखन राजनीति से अछूती नहीं रही, लेकिन आज तो राजनीति और राजनेता मानो इतिहास को पूरी ढिठाई से निगलने के लिए तैयार हैं।

हमारे राजनेता इतिहास को राजनीतिक अफवाह और प्रचार का हथकंडा बनाने पर तुले हुए हैं। अतीत के अन्यायों की सच्ची-झूठी कहानियों के जरिए सुनियोजित तरीके से हमारी नई पीढ़ियों में घृणा, द्वेषभाव और सांप्रदायिक आक्रोश भरा जा रहा है। पुराने हिसाब-किताब बराबर करने के लिए उन्हें हिंसा के मार्ग पर धकेला जा रहा है।

ऐतिहासिक प्रसंगों से कोई छलपूर्वक छेड़छाड़ न करे इसके लिए जर्मनी जैसे देशों ने कड़े कानून तक बनाकर इसे आपराधिक कृत्य तक की श्रेणी में डाल दिया है। हालांकि ऐसे कानून दोधारी तलवार भी साबित होते हैं।

मानवीय चेतना के मुक्त-विकास के लिए तो जरूरी यह है कि हमारी नई पीढ़ियां अपने अतीत और वर्तमान का उदारतापूर्वक मूल्यांकन करना सीखें। वे सह-अस्तित्व की भावना के साथ नए समाज की रचना करने में सक्षम बनें। वे अतीत के प्रसंगों के आधार पर विक्टिमहुड, आत्महीनता या प्रतिशोध की भावना से ग्रसित और बीमार न बनें।

कितना अच्छा होता कि भगतसिंह और नेहरू के उपरोक्त प्रसंग में प्रधानमंत्री कार्यालय से एक भूल-सुधार वाली विज्ञप्ति जारी की जाती। कहा जाता कि इस ऐतिहासिक तथ्य के मामले में प्रधानमंत्री से अनजाने में चूक हुई है।

अगर ऐसा किया जाता तो न केवल उनका व्यक्तिगत रूप से मान ही बढ़ता, बल्कि यह संदेश भी जाता कि ज्ञान के सृजन, शोधन और प्रस्तुतिकरण के मामले में भारत का समाज तथ्यों से कोई समझौता नहीं करता। उसमें अपनी गलती को स्वीकारने और सुधारने का आत्मविश्वास भी है।

इतने बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री से न्यूनतम जिम्मेदारी की यह अपेक्षा कुछ ज्यादा तो नहीं है!