#भारतीय उप महाद्वीप और इस्लाम : पार्ट 56 से पार्ट 60 तक एक साथ

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भारतीय उप महाद्वीप और इस्लाम :
पार्ट # 56 से पार्ट # 60 एक साथ

पार्ट-56
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इस्लामिक सेना का सिंध के “दबील” नगर पर आक्रमण और विजय पाना :
अरमाईल नगर की विजय के बाद मुहम्मद बिन क़ासिम ने इस्लामिक लश्कर को ‘दबील ‘ नगर की ओर कूच करने का निर्देश दिया, दबील अरमाईल से चार दिन की दूरी पर था, यही वह शहर था जहां डाकुओं ने उन किश्तियो को लूटा था जिनको सरन द्वीप के राजा ने रवाना किया था जिनमें मुसलमान औरतें और बच्चे थे ,
मुहम्मद बिन क़ासिम ने 93 हिजरी ( जून 712 ईस्वी) को रमजान के महीने में जुमा के दिन इस शहर की सीमा पर कदम रखा,
इस्लामी लश्कर ने दबील पहुंच कर शहर को चारों तरफ से घेर कर खंदक खोद दी थीं,यह खंदक हजाज बिन यूसुफ के निर्देश पर खोदी गयी थी, इन खंदकों पर हजारों की संख्या में बड़े बड़े भाले गाड दिये गये, और इन पर फौज के झंडे लगा दिए गए थे, हर भाले और झंडे के नीचे एक हथियार बंद सिपाही खड़ा कर दिया था,
यह फ़ौज अपने साथ एक तोप भी लाई थी , जिसका नाम “ऊरूस” था, यह तोप इतनी बड़ी और भारी भरकम थी कि इसे 500 आदमी खींचते थे,
फौज के आफिसरों ने इस तोप को एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान पर लगवा दिया था,

पार्ट – 57
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दबील शहर में एक बडा मंदिर था, जिसकी छत पर बहुत लंबा बांस का मोटा डंडा खड़ा कर दिया गया था, इस डंडे के ऊपरी भाग पर बहुत बडा झंडा हर समय लहलहाता रहता था, जब तेज़ हवा चलती तो इस झंडे की परछाई से पूरा शहर ढक जाता था,
हजाज बिन यूसुफ सिंध के युद्ध को बहुत महत्वपूर्ण समझता था, उसने मुहम्मद बिन क़ासिम को निर्देश दिया था कि हर तीसरे दिन इस युद्ध की सूचना उस तक पहुंचनी चाहिए ,
मुहम्मद बिन क़ासिम ने दबील शहर की पूरी स्थिति उसे ख़तों से बताई तो उसने सुझाव दिया कि “उरूस” तोप को शहर के पूर्व दिशा में लगाया जाये, और तोप का दहाना हमेशा ऊपर की ओर होना चाहिए, और मंदिर के बांस जिस पर बडा झंडा लहराता है, को निशाना बनाया जाये
ताकि जान का नुकसान न हो
चुनांचे इस तरह तोप चलाई गई और एक बार तोप का गोला झंडे पर लगा ,और झंडा बांस समेत जमीन पर गिर गया,

पार्ट – 58
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जब दबील शहर के मंदिर में लगे मंदिर का झंडा इस्लामिक सेना के साथ आई हुई तोप “उरूस” से गिरा दिया गया तो यह नगर वासियों के लिए बहुत बडा धचका था, वह बहुत उत्तेजित हो गये,वह सब क्रोधित हो कर नगर की दीवार से बाहर आ गये, और युद्ध करने के लिए तैयार हो गये,
भयंकर जंग हुई लेकिन इस्लामिक सेना ने उनको पराजित कर वापस शहर में जाने के लिए मजबूर कर दिया, अब इस्लामिक सेना शहर में घुसने के लिए बेताब थी, मगर वह दीवार जो शहर के चारों ओर बनी थी वह बहुत मजबूत और ऊंची थी, जिसे तोड़ना भी मुश्किल था और जिस पर चढ़ना भी मुश्किल था,
मुहम्मद बिन क़ासिम ने दीवार पर लंबी सीढियां लगाने का निर्देश दिया, तो बहुत मजबूत लकड़ी की सीढियां बनाई गई, जिससे इस्लामिक फौजें शहर में प्रवेश कर गईं, रिवायत में है कि जो पहला फौजी दीवार पर चढने में कामयाब हुआ था वह कूफे के कबीले बनी मुराद का था,

पार्ट – 59
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इस्लामी लश्कर के “दबील”शहर की दीवार पर चढने में कामयाब होने के बाद शहर को विजयी कर लिया गया,
राजा दाहिर शहर छोड़ कर भाग गया, उसके बाद मुहम्मद बिन क़ासिम वहां तीन दिन ठहरा, राजा दाहिर के सैनिकों की हत्या कर दी गई, शहर में एक मस्जिद बनाई गई और मुसलमानों को वहां बसाया गया,
“दबील” इस इलाके का बहुत बडा शहर था, यही राजा दाहिर की राजधानी थी,इस कारण रह शहर बहुत महत्वपूर्ण था,यहाँ के मंदिर में 700 महंत और पंडित हमेशा मौजूद रहते थे और इनके पास सोने और चांदी के ढेर लगे हुए थे,
इस शहर को फ़तह करना आसान काम नहीं था, “तारीख़ ए याक़ूबी” में लिखा है कि इस शहर को इस्लामिक सेनाओं द्वारा जीतने में कई महीने लग गए, इस जीत का मुसलमान सेनाओं पर अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ाव

पार्ट – 60
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दबील ( दैबल जी ) शहर की भौगोलिक स्थिति:

दबील शहर कहां स्थित था? रिसर्च स्कालरों का कहना है कि दबील शहर आज के कराची शहर के आस-पास था,कुछ लोगों का कहना है कि दबील शहर कराची की बंदरगाह कीमाडी से कुछ दूरी पर “मुनवरा” के पहाड़ के ऊपर जो बहुत पुराना किला है वही दबील शहर था, कुछ लोगों का कहना है कि आज का ठट्ठा शहर दबील है, जो कराची से 50 मील दूर है और आज “डाबे जी” के नाम से प्रसिद्ध है, वहां इसी नाम का रेलवे स्टेशन है, यहाँ भी स्टेशन से कुछ दूरी पर एक क़िले के निशान मिले हैं, खुदाई के बाद वहां कुछ कब्रें मिली है जिनमे मुर्दों की लाशें सही सलामत मिली है जिनको पुरातत्व विभाग ने सुरक्षित कर लिया है, इन ढांचों को देखने से मालूम होता है कि यह वह मुसलमान सैनिक होंगे जो दबील में युद्ध करते हुए शहीद हुए होंगे, कुछ शवों में तीर के टुकड़े भी मिले हैं, हो सकता है कि समय के साथ इस स्थान का नाम ” दैबल जी ” या दबील से बदल कर “डाबे जी” हो गया हो