#भारतीय उप महाद्वीप और इस्लाम : पार्ट 61 से पार्ट 65 तक एक साथ

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भारतीय उप महाद्वीप और इस्लाम:
(पार्ट # 61 से पार्ट # 65 तक एक साथ)
पार्ट – 61
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मुहम्मद बिन क़ासिम की सेना का “नीर वन” (पाकिस्तान स्थित हैदराबाद) की ओर कूच:

मुहम्मद बिन क़ासिम ने दैबल नगर का प्रबंधन को अच्छे हाथों में सौंपने के बाद, नीर वन की तरफ कूच किया जो दबील से चार दिन की दूरी पर दक्षिण में स्थित था,जिसे आज के समय में हैदराबाद ( सिंध) के नाम से जाना जाता है,
उस समय नीर वन के राजा का नाम सुंदर था, और राजा दाहिर के नेतृत्व में राज करता था, लेकिन इसने मुहम्मद बिन क़ासिम के आक्रमण से कई साल पहले हजाज बिन यूसुफ के पास आदमी भेज कर संधि कर ली थी,
इसके परिणाम में जब मुहम्मद बिन कासिम की सेना नीर वन पहुंची तो राजा की ओर से कोई विरोध नहीं किया गया, नीर वन के राजा ने शहर से बाहर निकल कर मुहम्मद बिन क़ासिम का स्वागत किया और सम्मान के साथ उन्हें शहर के भीतर ले गये, सारी सेना के खाने पीने और आराम का प्रबंध किया,
नीर वन से मुहम्मद बिन क़ासिम ने हजाज बिन यूसुफ को खत लिखकर वहां की स्थिति बताई और हजाज से आगे बढ़ने की अनुमति मांगी, इन दिनों खुरासान के शासक क़तीबा बिन मुस्लिम बाहली विजय करते हुऐ चीन की सीमा तक पहुंच गये थे इन्होंने भी हजाज बिन यूसुफ से आगे बढ़ने की अनुमति मांगी,
हजाज बिन यूसुफ ने दोनों को एक ही जवाब दिया जहां तक जीत प्राप्त कर सकते हो बढते जाओ.

पार्ट – 62
मुहम्मद बिन क़ासिम नीर वन से आगे बढते हैं:
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मुहम्मद बिन क़ासिम ने कुछ दिन नीर वन में विश्राम करने के बाद आगे की ओर कूच किया, वह जिस ओर जाते विजय पताका लहराते, इतिहासकारों ने लिखा है कि मुहम्मद बिन कासिम नीर वन के आगे सिंध और सहीदान की दो दरियाओं के ओर बढ़े थे , लेकिन यह मालूम नहीं हो पाया कि वहां कहां कहां से गुजरे थे, इतना पता चलता है कि वहां के एक क्षेत्र के राजा का नाम सरूप दास था, जब इस्लामी लश्कर इनके क्षेत्र में आया तो यहाँ के राजा ने भी इनका स्वागत किया और संधि की पेशकश की, और अपने राज्य को लड़ाई के खतरे से बचा लिया, मुहम्मद बिन क़ासिम , वहां के लोगों से बहुत प्रेम से मिला, और फौज कुछ धन लेने के बाद वहां से आगे बढ गई,
इसके बाद इस्लामिक सेना सिंधु नदी की ओर बढी और एक बडे मैदान में पड़ाव किया, वहां पास में एक शहर था जिसे अरबी इतिहासकारों ने “सदोसान” कहा है, यह शहर सिंधु नदी के पूर्व दिशा में था, जहां बौद्ध धर्म के मानने वाले थे, वहां मुहम्मद बिन क़ासिम ने एक बहादुर फौजी मुहम्मद बिन मसाअब को बात करने के लिए भेजा, उसके वहां पहुंचने पर नगर वासियों ने संधि की पेशकश की, और इस्लामिक सेना ने ख़िराज देने के बदले संधि स्वीकार की, और उनसे वफादारी की शर्त के साथ इस्लामिक सेना वहां से भी आगे कूच कर गई,

पार्ट – 63

मुसलमान सैनिकों के साथ गैर मुस्लिम सेना का मिलना:
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सदोसान से रवाना होते समय मुहम्मद बिन मुसाअब सक़फी ने वहां के कुछ आदमी भी साथ में लिए, ताकि जो शांति संधि की शर्तें हैं उन पर अमल हो सके, एक रिवायत के अनुसार मुहम्मद बिन मुसाअब जब मुहम्मद बिन क़ासिम के पास पहुंचे तो सदोसान के 4 हजार जाट सैनिक उनके साथ थे , यह सब सैनिक इस्लामिक फौज में शामिल कर लिये गये और भविष्य में भारतीय उप महाद्वीप में होने वाली जंगो में मुसलमानों की ओर से लड़े, मुहम्मद बिन क़ासिम ने सदोसान राज्य का कार्यभार अपने विश्वसनीय मित्र के सुपुर्द किया और आगे बढ गये,

पार्ट – 64

इस्लामिक सेना का राजा दाहिर से युद्ध :
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मुहम्मद बिन क़ासिम ने जब दबील ( दैबल / दैवल) नामक शहर को विजयी किया था तो राजा दाहिर ने वहां से पलायन कर लिया था और सिंध की सीमा से निकल कर राजा रासल की राजधानी जो कच्छ के स्थान पर थी , पर पहुंच गये थे, यह क्षेत्र भी हिंदुस्तान का भाग था, जो आज के समय में गुजरात के ठियावाड का हिस्सा है, वहां राजा दाहिर ने राजा रासिल से मिल कर मुहम्मद बिन क़ासिम के विरुद्ध बडे स्तर पर युद्ध की तैयारी शुरू कर रखी थी, मुहम्मद बिन क़ासिम उस समय हिंदुस्तान के बडे शहरों को विजयी करने के बाद अपनी फौज की दिशा इसी ओर मोड़ना चाहते थे,
इसके लिए युद्ध स्तर पर सिंधु नदी पर पुल बनाया गया , जिसे पार कर मुस्लिम सेना ने कच्छ में प्रवेश किया, जहां राजा दाहिर जो लंबे समय से जंग के साज़ ओ सामान इकट्ठा कर रहा था, बहुत आत्मविश्वास, तेज़ गति और वीरता के साथ युद्ध के मैदान में आया, वह खुद एक जंगी हाथी पर सवार था और इसके इर्द-गिर्द 27 और हाथी जिन्हे युद्घ की ट्रेनिंग दी रही थी , आगे पीछे चल रहे थे,

राजा दाहिर इस युद्ध को अंतिम युद्ध बनाना चाहते थे, और यह जंग वास्तव में निर्णायक सिद्ध हुई, इसमें हजारों की संख्या में ठाकुर भी राजा दाहिर के नेतृत्व में लड़ रहे थे, यह बहुत बहादुर सेना थी, जिसने मुसलमान सेना का मुकाबला बहुत वीरता के साथ किया, इतिहास में लिखा गया है कि जंग की तीव्रता का यह आलम था कि आस पास के क्षेत्रों में ऐसी जंग इससे पहले नहीं हुई थी

पार्ट – 65

इस्लामिक सेना का राजा दाहिर से युद्ध :
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भारतीय उप महाद्वीप में युद्ध के समय में हाथी बहुत महत्वपूर्ण होते थे, हाथियों को युद्ध के मैदान में कुछ इस तरह से उतारा जाता था कि जो सबसे शक्तिशाली हाथी होता था उसकी सूंड पर तलवार बांध दिया करते थे, इस तलवार को कटारा कहा जाता था, इसके साथ साथ पूरी सूंड को लोहे की कीलों से ढांप दिया जाता था, इस हाथी के शरीर पर भी लोहे के कवच और कीलें लगी होती थी, फिर यह हाथी दुश्मन की सेना में छोड़ दिया जाता था, इसके साथ इस हाथी के आस पास 500 सैनिक भी युद्ध के लिए तैयार रहते थे,इस तरह से यह हाथी और सैनिकों का गठजोड़ शत्रुओं की 5-6 हजार की सेना पर भारी पड़ता था, यह गठजोड़ युद्ध में जिस ओर हमला कर देता मैदान साफ हो जाता था,
राजा दाहिर की फौज में मुहम्मद बिन क़ासिम की सेना से युद्ध करने के लिए इस प्रकार के 27 हाथी तैयार किए गए थे, जिनके साथ 14-15 हजार फौजियों की सेना थी,
इसके अतिरिक्त कई हजार सैनिकों की पैदल सेना और घुड़सवार सेना भी साथ में थी ,
इस तरह से अंतिम युद्ध में राजा दाहिर की कुल सेना 40 हज़ार से अधिक थी