#भारतीय उप महाद्वीप और इस्लाम : पार्ट 66 से पार्ट 70 तक एक साथ

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Khan Junaidullah
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भारतीय उप महाद्वीप और इस्लाम:
पार्ट # 66 से पार्ट # 70 तक एक साथ

पार्ट-66
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इस्लामिक सेना का राजा दाहिर से युद्ध और राजा दाहिर की मृत्यु:

मुहम्मद बिन क़ासिम के नेतृत्व में इस्लामिक सेना से लडी जाने वाली जंग में विरोधी सेंना का नेतृत्व राजा दाहिर कर रहे थे, वह खुद एक जंगी हाथी पर सवार थे और शत्रु सेना को ललकार रहे थे, उस समय भीषण गर्मी थी, और सूरज की गर्मी से धरती से अंगारे निकल रहे थे,राजा दाहिर की सेना आगे बढ कर शत्रु सेना पर हमले कर रही थी, तभी तेज गर्मी से और भारी हथियारों से लदा राजा दाहिर का हाथी प्यास के कारण महावत के नियंत्रण में नहीं रहा और बेकाबू हो गया, जिसके कारण राजा दाहिर को हाथी पर से उतरना पडा , यहीं से जंग की बाजी पलट गई, अब राजा दाहिर पैदल सिपाही की तरह लड़ रहा था, इतनी देर में मुस्लिम सेना के पांव जम चुके थे, दोनों तरफ के फौजी कट रहे थे और धरती पर शव बिखर गए थे, लेकिन तभी राजा दाहिर मैदान से भाग खड़े हुए इसके साथ ही राजा दाहिर की सेना के हौसले टूट गये , और कुछ देर में फौज भी भाग खडी हुई,मुस्लिम सेना ने हारी हुई फौज का अंत तक पीछा किया और बेशुमार सैनिकों की हत्या करी और अंत में राजा दाहिर की भी मृत्यु हो गई

पार्ट – 67
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राजा दाहिर की मृत्यु कैसे हुई:

एक मान्यता के अनुसार राजा दाहिर की मृत्यु कबीला बनी क़लाब के एक व्यक्ति से युद्ध करते हुए हुई,
एक और रिवायत में है कि राजा दाहिर की मृत्यु कबीला बनातु के सैनिक के साथ युद्ध करते हुए हुई,

एक प्रसिध्द भारतीय इतिहासकार क़ाज़ी अतहर मुबारक पुरी लिखते हैं कि:

राजा दाहिर और जिस व्यक्ति से युद्ध करते हुए राजा दाहिर की मृत्यु हुई थी, इन दोनों की मूर्तियां भडौच शहर में लगे हुए हैं, भारत में प्राचीन काल से बडे लोगों को मूर्ति बनाकर याद रखने का रिवाज है, चूंकि सिंध के राजा दाहिर की मृत्यु सौराष्ट्र और गुजरात के कच्छ में हुई थी, और यह क्षेत्र उस समय राजा रासिल का राज्य था, इस लिए दोनों की मूर्तियां गुजरात के पुराने शहर भडौच में लगा कर दोनों वीरों को याद किया गया है, दोनों ही वीर अपनी वीरता के लिए याद करने योग्य थे, राजा दाहिर ने अरब की फौज का जम कर मुकाबला किया, और दूसरे व्यक्ति जिसका नाम कशआम बताया जाता है, ने बहादुरी से लड़ते हुए राजा दाहिर का काम तमाम किया,
राजा दाहिर की मृत्यु के बाद पूरे सिंध पर मुहम्मद बिन क़ासिम का अधिकार हो गया, इसके बाद वह गांव गांव और शहर शहर को विजयी करते हुए वह अलवर की ओर बढे,

पार्ट – 68
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मुहम्मद बिन क़ासिम का अलवर/ अरवर की ओर कूच:

कच्छ के युद्ध की सफलता के बाद मुहम्मद बिन क़ासिम ने अलवर की ओर कूच किया,
अलवर या अरवर सिंध का पुराना शहर है और राय परिवार के राज्य की राजधानी है, यह शहर सिंधु नदी के किनारे बसा हुआ था और बहुत हरा भरा था, इस राज्य की सीमा उत्तर में गुजरात और सौराष्ट्र तक फैली हुई थी,

एक मान्यता के अनुसार राजा दाहिर की पत्नी और इसके परिवार के सदस्य अलवर में जा कर बस गये थे, वे अपने साथ सेवकों की फौज और बहुत सा धन भी साथ ले गये थे, कहते हैं कि जब राजा दाहिर की पत्नी को पता चला कि मुहम्मद बिन कासिम अलवर की ओर बढ रहा है तो उसने बहुत सी बंदियों के साथ आत्म दाह कर लिया और इस प्रकार जीवन का अंत कर लिया,यह कथा अरबी इतिहास की किताब ” फतह उल बलदान ” में लिखा है,

एक और रिवायत में है जो ” तारीख़ याकूबी” में लिखा है कि राजा दाहिर की पत्नी बहुत सी सेविकाओं के साथ अलवर में थी और वहां के राजा ने उनको संरक्षण दे रखा था, मुहम्मद बिन क़ासिम ने यहां पहुंच कर इनकी घेरा बंदी की, उन लोगों को अब तक राजा दाहिर की मृत्यु की सूचना नहीं पहुंची थी, क़ासिम ने कुछ लोगों के द्वारा उन्हें राजा दाहिर की मृत्यु की सूचना दी, और समर्पण करने को कहा, नगर का दरवाज़ा खोल दिया गया और शहर ने समर्पण किया ,मुहम्मद बिन क़ासिम ने शहर में जा कर नये प्रबंध किये, वहां अपना उत्तराधिकारी बैठाया, और आगे की ओर कूच किया,

पार्ट – 69
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मुहम्मद बिन क़ासिम द्वारा ब्रहमणाबाद को विजय करना:

राजा दाहिर की पराजय और मृत्यु के बाद उसके बहुत से सैनिक भाग कर ब्रहमणाबाद चले गए थे, यहाँ बहुत से जंगल थे, जिसमें लोगों के छुपने की बहुत गुंजाइश थी, राजा दाहिर की फौज के सैनिक यहाँ से मुहम्मद बिन क़ासिम पर हमला करना चाहते थे,मुहम्मद बिन क़ासिम को इसकी सूचना हुई तो उसने पहले आक्रमण किया, और बहुत तेजी से यहाँ पहुंच कर शत्रु को घेर लिया,राजा दाहिर के सैनिकों ने मुकाबला किया लेकिन बुरी तरह से पराजित हुए, एक सूचना के अनुसार 8000 और दूसरी रिवायत के अनुसार 26000 सैनिकों की मृत्यु हुई,

पार्ट – 70
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मुहम्मद बिन क़ासिम की सेना , कुछ और शहरों की ओर:

राजा दाहिर की सेना के जो सिपाही अरवड़ और ब्रहमणाबाद में छुपे हुए थे और हजारों की संख्या में थे, उनको पराजित करने के बाद मुहम्मद बिन क़ासिम ने कुछ और शहरों की ओर कूच किया, वह आस पास के दो बडे शहरों को विजयी करना चाहते थे, इस जमाने में एक शहर का नाम अलरोर था और दूसरे शहर का नाम बग़रोर था, रास्ते में एक कस्बा साविंद्री भी पड़ता था,
जब मुहम्मद बिन कासिम की सेना कस्बे के पास पहुंची तो कस्बे के लोगों ने सीमा से बाहर आकर सेना का स्वागत किया और युद्ध न करने की इच्छा जताई, मुहम्मद बिन क़ासिम ने उनकी इच्छा इस शर्त के साथ कबूल करी कि वे लोग अगले पड़ाव में सेना का मार्गदर्शन करें, यह शर्त मान ली गई और सेना अगले पड़ाव बमसद नाम के कस्बे में पहुंची, वहां भी शांति प्रस्ताव आया और यहाँ भी इन्ही शर्तों के साथ शांति प्रस्ताव स्वीकार किया गया ,

इसके बाद इस्लामिक सेना अलरोर शहर के पास पहुंची , यह इस इलाके का बडा शहर था, यहाँ जो शांति संधि की शर्तें रखी गई वो इस तरह से थीं- किसी नागरिक की हत्या नहीं होगी, न पूजा स्थलों को तोड़ा जायेगा, इनके पूजा स्थलों को वही स्थान होगा जो मुसलमानों के राज्य में यहूदियों और ईसाईयों के पूजा स्थलों को होता है,

वहां पर मुहम्मद बिन क़ासिम की ओर से धन उगाही की शर्तें भी रखी गई, लेकिन अगर समय पर उगाही न हो जबरदस्ती न करने का सुझाव दिया गया,

यही सब शर्तें बग़रोर के निवासियों के साथ भी हुईं और किसी प्रकार का युद्ध नहीं हुआ,

इन शहरों में मस्जिदों का निर्माण हुआ और मुसलमानों को बसाया भी गया,

मुहम्मद बिन क़ासिम ने 93 हिजरी( 712 ईस्वी ) में सिंध की धरती पर कदम रखा था, और यह सब कार्य 712 ईस्वी में ही संपन्न हुए, अर्थात यह सभी विजय अभियान एक वर्ष के भीतर हो गये थे ,