#भारतीय_मुस्लिम_महिला_स्वतन्त्रता_सेनानी : बेगम हज़रत महल ने की थी अंबेडकर से भी पहले समानता की बात

Posted by

सिकंदर कायमखानी
===========

भीम राव अंबेडकर से भी पहले, बेगम हज़रत महल ने की थी समानता की बात


एक तम्मन्ना थी

आज़ाद वतन हो जाये

जिसने जीने न दिया

चैन से मरने न दिया…

बेगम हज़रत महल

7 अप्रैल 2018 महान स्वतन्त्रता सेनानी बेगम हज़रत महल की 139वी पुण्य तिथी थी। हज़रत महल ने अवध छेत्र में 1857, स्वतन्त्रता संग्राम क्रान्ति का नेतृत्व किया। वाजिद अली शाह की पत्नी के ओहदे से उपर उठ कर, हज़रत महल नेत्री के रूप में उभरी। उनका बेटा बिरजीस क़द्र, जिसकी लखनऊ में, दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह ज़फर के वज़ीर के बतौर ताजपोशी हुई, सिर्फ 14 साल का था।

लखनऊ में अन्ग्रेज़ विरोधी सत्ता का पूरा भार हज़रत महल के कन्धो पर था। उनकी टीम में राजा जय लाल सिंह कुर्मी, राजा बालकृष्ण कायस्थ, राजामुण्ड तिवारी, बरकत अहमद, मौलवी अह्मदुल्लाह शाह, मम्मू खान, वीरा पासी जैसे लोग थे।

हज़रत महल ने आठ महीने से उपर लखनऊ एवं अवध के अनेको जिले जैसे उन्नाव, हर्दोई, सीतापुर, फैज़ाबाद, गोण्डा, बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती, अमेठी, राय बरेली, सुल्तानपुर, अम्बेडकरनगर, प्रतापगढ़ को स्वतन्त्र रखा। इसके अलावा, गोरखपुर, जौनपुर, आज़मगढ़, बस्ती, कुशीनगर, देवरिया इत्यादी जिले भी हज़रत महल के नेतृत्व में अंग्रेज़ी राज्य से मुक्त रहे।

उस समय, अवध में 652 तालुकेदार, छोटे ज़मीनदार, और पट्टीदार-नायक-किसान थे। इनमे से केवल 43 अन्ग्रेज़ों के साथ थे। कई बार हारने के बाद, मार्च 1858 में जब अन्ग्रेज़ों ने लखनऊ पर दुबारा कब्ज़ा किया, तो अवध के गांवो में गुरिल्ला युध्द 1860 तक चला।

बेगम हज़रत महल को नेपाल पहुंचाने के लिये जिन 119 तालुकेदार, छोटे ज़मीनदार, और पट्टीदार-नायक-किसानो ने लड़ते-लड़ते अपनी जान दे दी, उनमे से 89 हिन्दू थे! बेगम हज़रत महल ने महिला होते हुए कई बार खुद सेना का नेतृत्व किया, गांव-गांव घूम कर जनता के बीच भाषण दिये; और सभी जातियों के नायकोंं को प्रोत्साहित किया।

50,000 की संख्या को पार करती, जिस साम्राज्यवादी फौज ने 1858 में लखनऊ पर कब्ज़ा किया, उसमे सिर्फ अंग्रेज़ नही थे। पूरे योरोप के हर देश से, अवध जैसे 12 जिलों के छोटे इलाके को हराने, सिपाही आये थे। उस समय, अवध की भूमी वाकई पूरे पूरब की अस्मिता की लड़ाई का प्रतीक बन गयी थी। सभ्यताओं के जंग में, अवध ने पूरब का नेतृत्व किया। और पश्चिमी सभ्यता को पीछे ढकेल दिया।

उस समय अवध की जनसंख्या 1 करोड़ थी। इसमे 25 लाख लोग मारे गये थे। अवध के ही मंगल पाण्डे, जिनकी पट्टीदारी बलिया तक फैली थी, ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहली गोली चलायी। दुनिया मे ऐसी कोई मिसाल नही, जहांं एक प्रान्त के 25% लोगों ने पूरे देश की आज़ादी के लिये अपने प्राण न्योछावर कर दिये।

भारत के संविधान बनने के नब्बे साल पहले, बेगम हज़रत महल ने आज़ादी और सामाजिक क्रान्ति का दस्तावेज़ जारी किया था, जिसमे समानता और भाईचारे की बात की गई थी। इस मामले में हज़रत महल और उनकी टीम ने अम्बेडकर और संविधान के अन्य रचयताओं का पूर्वानुमान किया था। नीचे तस्वीर मे, बेगम हज़रत महल की वारिस मन्ज़िलत फातिमा, जो कलकत्ते में रहती हैं, भी मौजूद हैं!

घोषणापत्र: “सभी हिन्दू एवं मुसलमान चार चीज़ो पर एत्माद रखते हैं: सबसे पहले दीन, दूसरे क़ौल (इज़्ज़त-आबरू), तीसरे जीवन, और चौथे सम्पत्ती। एक देसी सरकार के अन्तर्गत ये चारो चीज़ें सुरक्षित हैं। सभी लोग अपने-अपने दीन पर मजबूती से क़ायम रह सकते हैं। और अज़ादी से अपना जीवन यापन कर सकते हैं। चाहे वो मुसलमानो मे शेख, सैय्यद, मुगल, पठान हों; या हिन्दुओं नाएं ब्राहमण, छत्री, वैश्य या कैथ हों। इसके साथ-साथ, छोटी जातियां जैसे चमार, धानुक, पासी और सफाई वाले, भी ऊंची जात वालों से बराबरी जर सकते हैं”!