#भारतीय_मुस्लिम_स्वतन्त्रता_सेनानी : निज़ाम मीर उस्मान अली : सेना की मदद के लिए 5 टन सोना दिया था

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Sikander Kaymkhani
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निज़ाम मीर उस्मान अलीः जिन्होंने मुश्किल वक्त में देश की सेना की मदद के लिए दान कर दिया था पांच टन सोना

उस मुल्क की सरहदों को कोई छू भी नहीं सकता जिस ​मुल्क के ​लोग उसे मुसीबत में देखकर अपना सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हों ये बात उस दौर की याद दिलाती है… हिंद की जमीन पर विदेशी हमले का खतरा बढ़ रहा था और प्रधानमंत्री के कहने पर एक निजाम ने अपना खजाना भारत की रक्षा के लिए खोल दिया था. 1965 में हैदराबाद के निजाम ‘मीर उस्मान अली’ नाम था उस दानी का! पैसों के मामले में भारत की सेना के लिए इतना बड़ा दान शायद ही किसी ने किया होगा तो चलिए जानते हैं उस किस्से को जिसने ‘मीर उस्मान अली’ को ‘मोहसिन-ए-हिन्दुस्तान’ बना दिया–

एक टोपी में जिंदगी गुजारने वाला ‘रईस’ निजाम


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हैदराबाद के निजाम की संपत्ति का इसी बात से आंकलन किया जा सकता है कि वो 5 करोड़ पाउंड की कीमत वाले शुतुरमुर्ग के अंडे के आकार जितने बड़े एक हीरे को पेपरवेट के तौर पर इस्तेमाल करते थे. वहीं उनके पैलेस में करीब 6000 लोग काम किया करते थे, जिनमें से 38 लोग तो केवल मोमबत्ती स्‍टैंड की धूल ही साफ करते थे.

इतना सब होने के बाद भी उस्मान अली बेहद साधारण किस्म का जीवन-यापन करते थे. वह एक टिन की प्‍लेट में खाना खाते थे, वहीं अपने कपड़ों पर कभी प्रेस तक नहीं करवाते थे. कहा तो यहां तक जाता है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी केवल एक ही टोपी पहनकर और एक ही पुराना कंबल ओढ़कर गुजार दी. वहीं इनकी दरियादिली भी इस साधारण जीवन से ऊपर थी, उन्होंने ​बनारस हिंदू वि​श्वविद्यालय के लिए आर्थिक मदद मांगने के तुरंत बाद बिना देरी किए एक लाख रुपए दान कर दिए।

चीन बन चुका था खतरा!
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1965 में भारत पाकिस्तान से युद्ध जीत चुका था और जीत के जश्न में डूबा था. भारतीय इस जीत का जश्न अभी ठीक से मना भी नहीं पाए कि उनके सामने दूसरा खतरा चीन के रूप में खड़ा हो गया. तिब्बत को आजाद कराने के लिए चीन ने भारत को दादागिरी दिखानी शुरू कर दी और युद्ध तक की धमकी दे डाली।

ऐसे में भारत इस बात से चिंतित हो उठा

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भारत कुछ दिन पहले ही एक भयावह युद्ध से गुजरा था हालांकि युद्ध में हमारी जीत हुई लेकिन पुन: एक और युद्ध उस पर थोपा जाना कहीं से भी अनुचित था. हालांकि सेना में जवानों की कमी अब भी नहीं थी. देश के युवा बड़ी संख्या में सेना में शामिल होने के लिए तैयार थे, लेकिन असली समस्या थी सेना के लाव-लश्कर, साजो-सामान और असलाह, गोला-बारूद की।

चूंकिे चीन की सेना पूरी तरह से युद्ध के लिए तैयार थी और यहां सैनिकों के हाथ खाली थे, वहीं देश विभाजन का दर्द झेल रहा था और पाकिस्तान से युद्ध के चलते भारत सरकार के पास धन की भी कमी थी. ऐसे में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सेना की मदद के लिए भारतीय रक्षा कोष की स्थापना की

शास्त्री जी ने लोगों से सेना के लिए दान करने की अपील की इस अपील ने लोगों को देश भावना से ओत-प्रोत कर दिया और वो देश सेवा के लिए टूट पड़े, आम नागरिक जो हो सकता था दान करने में जुट गए. जिसके पास पैसा नहीं था वह कपड़े और भोजन दान कर रहा था।

5 टन सोना देकर की सेना की मदद
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प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने रेडियो द्वारा लोगों और राजे-रजवाड़ों से देश के लिए मदद मांगी. पीएम के इस आह्वान को हैदराबाद में बैठे निजाम भी सुन रहे थे, जिहाजा उन्होंने इस मामले में मदद का मन बनाया और शास्त्री जी और इंग्लैंड व स्कॉटलैंड दोनों के बराबर बड़ी रियासत पर राज्य किया था।

उस समय उनकी कुल संपत्ति अमेरिका की कुल अर्थव्यवस्था का 2 प्रतिशत थी. इसी के चलते टाइम पत्रिका ने सन 1937 में उनकी फोटो अपनी मैग़ज़ीन के कवर पेज पर लगाई थी. चूंकि सेना को तत्काल सहायता की जरूरत थी इसलिए निमंत्रण मिलते ही बिना किसी देरी के लाल बहादुर शास्त्री उड़नखटोला में सवार होकर हैदराबाद पहुंच गए. निजाम उस्मान अली ने उनका बेगमपेठ एयरपोर्ट पर स्वागत किया।

शास्त्री जी जानते थे कि हैदराबाद से उन्हें निराशा नहीं मिलेगी इसलिए पीएम ने जल्दी निजाम से बात की और उन्हें स्थिति के बारे में अवगत कराया, लेकिन उस्मान अली इसके लिए पहले से तैयार थे। बिना एक सेकंड के सोचे निजाम मीर उस्मान अली ने अपना खजाना भारत की रक्षा के लिए खोल दिया और राष्ट्रीय रक्षा कोष के लिए 5 टन सोना देने का ऐलान कर दिया।

सभार हेडलाईन 24. हिन्दी