#भारत का इतिहास पार्ट 73 : तुग़लक़ वंश के शासक : ग़यासुद्दीन तुग़लक़

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तुग़लक़ 1412 तक शासन करत रहे, तथापि 1399 में तैमूर द्वारा दिल्ली पर आक्रमण के साथ ही तुग़लक़ साम्राज्य का अंत माना जाना चाहिए।

शासकों के नाम
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– ग़यासुद्दीन तुग़लक़
– मुहम्मद बिन तुग़लक़
– फ़िरोज शाह तुग़लक़

ग़यासुद्दीन तुग़लक़
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ग्यासुद्दीन तुगलक: 1320-1325 ई
Ghyasuddin Tughlaq 1320-1325 AD.

गाजी मलिक का वंश स्वदेशीय समझा जा सकता है। उसका पिता बलबन के समय में हिन्दुस्तान आया था तथा उसने पंजाब की एक जाट कन्या से शादी की थी। गाजी मलिक अपनी योग्यता के कारण निम्न स्थिति धीरे साम्राज्य के सर्वोच्च पद तक पहुँच गया। उसने मंगोल आक्रमणों से दिल्ली साम्राज्य की सीमाओं रक्षा की थी। अंत में दैव ने वृद्धावस्था में उसे राज सिंहासन पर दिया मुल्तान के एक मस्जिद में एक अभिलेख पाया गया है जिसमें गाजी यह दावा किया है कि मैंने 29 लड़ाईयों में तत्तारों को पराजित किया है, मेरा नाम मलिक-उल-गाजी है। गाजी के बारे में अमीर खुसरो कहता है कि वह अपने राजमुकुट के नीचे सैकड़ों पंडितों का शिरस्तान (पगड़ी) छिपाये हुए था अर्थात् वह बहुत ही बुद्धिमान था।

सरदारों द्वारा दिल्ली के शासक के रूप में गाजी मलिक का चुनाव पूर्णतः न्यायोचित सिद्ध हुआ। उसके सिंहासन पर बैठने के समय परिस्थिति गम्भीर थी। सीमावर्ती प्रान्तों में दिल्ली सल्तनत का प्रभाव समाप्त हो चुका था। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद जो गड़बड़ी का युग आया, उसमें उसकी शासन-पद्धति भी विच्छिन्न हो गयी थी। परन्तु उसने अपने को परिस्थिति के उपर्युक्त सिद्ध कर दिखाया। अपने पूर्वगामियों से भिन्न, मुख्यतया विपरीत परिस्थितियों में अपने प्रारम्भिक प्रशिक्षण के कारण उसमें चरित्रबल था। वह पुण्यात्मा था तथा ईश्वर से डरता था। वह दयालु एवं उदार प्रकृति का था। उसने अपने दरबार को, शायद बलबन के समय को छोड, पहले से अधिक गंभीर बना दिया। वह संयम एवं चतुराई से काम करता था।

राज्याभिषेक के शीघ्र बाद ग्यासुद्दीन तुगलक अपने पूर्वगामी शासन के दोषों को दूर कर शासन-पद्धति को पुन: सुव्यवस्थित करने के काम में लग गया। मुबारक एवं खुसरो के अपव्यय के कारण राज्य की आर्थिक दशा शोचनीय हो। गयी थी। अत: ग्यासुद्दीन ने सभी विशेषाधिकारों एवं जागीरों की दृढ़ जाँच की जाने की आज्ञा दी। अवैध जागीरें राज्य की ओर से जब्त कर ली गयीं। इस कार्य से उसकी जो थोड़ी बदनामी हुई, वह उसकी विवेकपूर्ण उदारता एवं अपनी प्रजा की भलाई के परोपकारी कायों से शीघ्र मिट गयी। उसने प्रान्तों में कर्मनिष्ठ शासक नियुक्त किये। उसने राज्य के कर को घटा कर समूची उपज का दसवाँ या ग्यारहवाँ भाग निश्चित कर दिया और सरकारी लूट तथा उत्पीड़न के विरुद्ध भी व्यवस्था की। इस प्रकार उसने राजस्व का बोझा काफी हल्का कर दिया। खेती को, जो इस देश के लोगों का प्रमुख धंधा है, विशेष प्रोत्साहन मिला।

खिल्जी के समय के भूमि माप की व्यवस्था मसाहत की पद्धति को त्याग दिया। उसने खुर-मुकद्दम और चौधरी को कुछ रियायतें दिन लेकिन हुकूक-ए-खुती को वापस नहीं किया। खेतों को सींचने के लिए नहरें खोदी गयीं। सुल्तान था जिसने नहरें बनवाई। बगीचे लगाये गये। कृषकों को लुटेरों के विरुद्ध शरण देने के लिए दुर्ग बनाये गये। परन्तु सुल्तान के कुछ नियमों में भलाई की वह प्रवृत्ति नहीं थी।

न्याय एवं पुलिस जैसे शासन की दूसरी शाखाओं में सुधार किये गये, जिससे देश में व्यवस्था एवं सुरक्षा फैल गयी। सुल्तान ने दरिद्रों की सहायता के लिए एक व्यवस्था निकाली तथा धार्मिक संस्थाओं एवं साहित्यकों की सहायता की। उसके राजकवि अमीर खुसरो को राज्य से एक हजार टका प्रतिमास की पेंशन मिलती थी। पत्र-व्यवहार की सुविधा के लिए देश की डाक-व्यवस्था का पुनः संगठन किया गया। सैनिक विभाग को कार्यक्षम एवं सुव्यवस्थित बनाया गया।

विभिन्न प्रान्तों पर सल्तनत का प्रभुत्व स्थापित करने के विषय में ग्यासुद्दीन असावधान नहीं था। उसने सैनिक प्रभुत्व एवं साम्राज्यवाद की खल्जी नीति का अनुसरण किया, जिसके विरुद्ध प्रतिक्रिया उसके उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक की असफलता के साथ आरम्भ हो गयी। इसका दृष्टांत विशेषरूप से हम उनके कामों में पाते हैं, जो उसने दक्कन तथा बंगाल में किए।

दक्कन में वारंगल के काकतीय राजा प्रतापरुद्रदेव द्वितीय ने, जिसने अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद की अव्यवस्था के समय में अपनी शक्ति बढ़ा ली थी, दिल्ली सरकार को निश्चित कर देना बन्द कर दिया। अत: ग्यासुद्दीन ने अपने शासनकाल के द्वितीय वर्ष में अपने ज्येष्ठ पुत्र तथा भावी उत्तराधिकारी फख़रुद्दीन जौना खाँ के अधीन वारंगल के विरुद्ध एक सेना भेजी। आक्रमणकारियों ने वारंगल के मिट्टी के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। हिन्दुओं ने इसकी रक्षा दृढ़ निश्चय एवं वीरता के साथ की। षड्यंत्रों तथा सेना में महामारी फैल जाने के कारण शाहजादा जौना को बिना कुछ किये ही दिल्ली लौट आना पड़ा। परन्तु जौना के दिल्ली लौटने के चार महीने बाद ही सुल्तान ने पुन: उसी शहजादे के अधीन एक दूसरी सेना वारंगल के विरुद्ध भेजी। यह दूसरा प्रयत्न सफल रहा। भीषण युद्ध के पश्चात् काकतीय राजा ने परिवार एवं सरदारों के सहित आत्म-समर्पण कर दिया। शहज़ादा जौना ने उसे दिल्ली भेजकर काकतीयों के सम्पूर्ण देश को अधीन कर लिया तथा वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर कर दिया। यद्यपि दिल्ली के सुल्तान ने काकतीय राज्य को विधिवत् अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया, परन्तु शीघ्र ही इसकी प्राचीन शक्ति एवं गौरव का अन्त हो गया।

1322 ई. में बंगाल में शम्सुद्दीन फ़िरोज शाह की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों के बीच गृहयुद्ध के कारण ग्यासुद्दीन तुगलक ने उस प्रान्त के मामले में हस्तक्षेप किया। शम्सुद्दीन फ़िरोजू शाह के पाँच पुत्रों में ग्यासुद्दीन बहादुर, जो सोनारगाँव को अपनी राजधानी बनाकर पूर्वी बंगाल में 1310 ई. से स्वतंत्र रूप से शासन कर रहा था, शहाबुद्दीन बोगार शाह, जो बंगाल के राजसिंहासन पर अपने पिता के बाद बैठा और जिसकी राजधानी लखनौती थी तथा नासिरुद्दीन बंगाल में अपनी-अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिए संघर्ष करने लगे। ग्यासुद्दीन बहादुर ने शहाबुद्दीन बोगरा शाह को पराजित कर बंगाल के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। इस पर नसिरुद्दीन की भी लोलुप दृष्टि लगी थी। अत: नसिरुद्दीन ने सहायता के लिए दिल्ली के सुल्तान से अपील की, कि बंगाल के इस सुदूरवर्ती प्रान्त को, जिसकी दिल्ली के सुल्तान के प्रति भक्ति सदैव डाँवाँडोल रहती थी, पूर्णरूप से अपने अधिकार में लाने के इस अवसर का सुल्तान ने लाभ उठाया। 1324 ई. में वह लखनौती की ओर बढ़ा, ग्यासुद्दीन बहादुर को पकड़कर उसे बंदी के रूप में दिल्ली भेजा और नसिरुद्दीन को अधीन शासक के रूप में पश्चिमी बंगाल के राजसिंहासन पर बैठा दिया। पूर्वी बंगाल को भी दिल्ली सल्तनत का एक प्रान्त बना दिया गया। दिल्ली लौटते समय ग्यासुद्दीन ने तिरहुत के राजा हरसिंह देव पर आक्रमण कर दिया। पराजित राजा अब से दिल्ली सल्तनत का जागीरदार बन गया। बंगाल के अभियान से लौटने पर जौना खाँ ने उसके लिए एक लकड़ी का महल तैयार किया। उस महल के गिर जाने से ग्यासुद्दीन तुगलक की मृत्यु हो गई।

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ग़यासुद्दीन तुग़लक़
ग़ाज़ी मलिक या तुग़लक़ ग़ाज़ी, ग़यासुद्दीन तुग़लक़ (1320-1325 ई.) के नाम से 8 सितम्बर, 1320 को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। इसे तुग़लक़ वंश का संस्थापक भी माना जाता है। इसने कुल 29 बार मंगोल आक्रमण को विफल किया। सुल्तान बनने से पहले वह क़ुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी के शासन काल में उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त का शक्तिशाली गर्वनर नियुक्त हुआ था। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था, जिसने अपने नाम के साथ ‘ग़ाज़ी’ (काफ़िरों का वध करने वाला) शब्द जोड़ा था।

आर्थिक सुधार
सुल्तान ने आर्थिक सुधार के अन्तर्गत अपनी आर्थिक नीति का आधार संयम, सख्ती एवं नरमी के मध्य संतुलन (रस्म-ए-मियान) को बनाया। उसने लगान के रूप में उपज का 1/10 या 1/12 हिस्सा ही लेने का आदेश जारी कराया। ग़यासुद्दीन ने मध्यवर्ती ज़मीदारों विशेष रूप से मुकद्दम तथा खूतों को उनके पुराने अधिकार लौटा दिए, जिससे उनको वही स्थिति प्राप्त हो गयी, जो बलबन के समय में प्राप्त थी। ग़यासुद्दीन ने अमीरों की भूमि पुनः लौटा दी। उसने सिंचाई के लिए कुँए एवं नहरों का निर्माण करवाया। सम्भवतः नहर का निर्माण करवाने वाला ग़यासुद्दीन प्रथम सुल्तान था। अलाउद्दीन ख़िलजी की कठोर नीति के विरुद्ध उसने उदारता की नीति अपनायी, जिसे बरनी ने ‘रस्मेमियान’ अथवा ‘मध्यपंथी नीति’ कहा है।

उदार व्यक्ति
ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की डाक व्यवस्था श्रेष्ठ थी। न्याय व्यवस्था के अन्तर्गत ग़यासुद्दीन ने एक न्याय विभाग का निर्माण करवाया। उसमें धार्मिक सहिष्णुता का अभाव था। उसने अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा चलाई गयी दाग़ने तथा चेहरा प्रथा को प्रभावी तरीक़े से लागू किया। वह दानी स्वभाव का होने के साथ जनकल्याणकारी कार्यों को कराने में दिलचस्पी रखता था। बरनी के अनुसार सुल्तान अपने सैनिकों के साथ पुत्रवत व्यवहार करता था। उसकी सेना में गिज, तुर्क, मंगोल, रूमी, ताजिक, खुरासानी, मेवाती एवं दोआब के राजपूत सैनिक शामिल थे।

उसकी महत्त्वपूर्ण विजय निम्नलिखित थीं-
वारंगल व तेलंगाना की विजय (1324 ई.)
तिरहुती विजय, मंगोल विजय (1324 ई.) आदि।

तुग़लक़ वंश
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शासक काल
ग़यासुद्दीन तुग़लक़ 1320-1325 ई.
मुहम्मद बिन तुग़लक़ 1325-1351 ई.
फ़िरोज शाह तुग़लक़ 1351-1388 ई.
ग़यासुद्दीन तुग़लक़ द्वितीय 1389 ई.
अबूबक्र 1389-1390 ई.
नासिरुद्दीन महमूदशाह 1390-1394 ई.
नसरत शाह तुग़लक़ 1395-1398 ई.
महमूद तुग़लक़ 1399-1413 ई.

1321 ई. में ग़यासुद्दीन ने वारंगल पर आक्रमण किया, किन्तु वहाँ के काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव को पराजित करने में वह असफल रहा। 1323 ई. में द्वितीय अभियान के अन्तर्गत ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने शाहज़ादे ‘जौना ख़ाँ’ (मुहम्मद बिन तुग़लक़) को दक्षिण भारत में सल्तनत के प्रभुत्व की पुन:स्थापना के लिए भेजा। जौना ख़ाँ ने वारंगल के काकतीय एवं मदुरा के पाण्ड्य राज्यों को विजित कर दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया। इस प्रकार सर्वप्रथम ग़यासुद्दीन के समय में ही दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया गया। इन राज्यों में सर्वप्रथम वारंगल था। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ पूर्णतः साम्राज्यवादी था। इसने अलाउद्दीन ख़िलजी की दक्षिण नीति त्यागकर दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया।

ग़यासुद्दीन जब बंगाल में था, तभी सूचना मिली कि, जूना ख़ाँ (मुहम्मद बिन तुग़लक़) निज़ामुद्दीन औलिया का शिष्य बन गया है और वह उसे राजा होने की भविष्यवाणी कर रहा है। निज़ामुद्दीन औलिया को ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने धमकी दी तो, औलिया ने उत्तर दिया कि, “हुनूज दिल्ली दूर अस्त, अर्थात् दिल्ली अभी बहुत दूर है। हिन्दू जनता के प्रति ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की नीति बहुत उदार थी। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ संगीत का घोर विरोधी था। बरनी के अनुसार अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन स्थापित करने के लिये जहाँ रक्तपात व अत्याचार की नीति अपनाई, वहीं ग़यासुद्दीन ने चार वर्षों में ही उसे बिना किसी कठोरता के संभव बनाया।

राजस्व सुधार
अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने अमीरों तथा जनता को प्रोत्साहित किया। शुद्ध रूप से तुर्की मूल का होने के कारण इस कार्य में उसे कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई। ग़यासुद्दीन ने कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों के हितों की ओर ध्यान दिया। उसने एक वर्ष में इक्ता के राजस्व में 1/10 से 1/11 भाग से अधिक की वृद्धि नहीं करने का आदेश दिया। उसने सिंचाई के लिए नहरें खुदवायीं तथा बाग़ बनवायें।

सार्वजनिक सुधार
जनता की सुविधा के लिए अपने शासन काल में ग़यासुद्दीन ने क़िलों, पुलों और नहरों का निर्माण कराया। सल्तनत काल में डाक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का श्रेय ग़यासुद्दीन तुग़लक़ को ही जाता है। ‘बरनी’ ने डाक-व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया है। शारीरिक यातना द्वारा राजकीय ऋण वसूली को उसने प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन हिन्दू जनता के प्रति उसकी कठोर नीति यथावत बनी रही। उसने हिन्दुओं का धन जमा करने की आज्ञा का निषेध किया।

धार्मिक कार्य
ग़यासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। इस्लाम धर्म में उसकी गहरी आस्था और उसके सिद्धान्तों का वह सावधानीपूर्वक पालन करता था। उसने मुसलमान जनता पर इस्लाम के नियमों का पालन करने के लिए दबाव डाला। उसने अन्य धर्मों के प्रति भी सहिष्णुता की नीति अपनाई थी।

निर्माण कार्य
स्थापत्य कला के क्षेत्र में ग़यासुद्दीन ने विशेष रूप में रुचि ली। अपने शसन काल में उसने तुग़लक़ाबाद नामक एक दुर्ग की नींव रखी।

मृत्यु
जब ग़यासुद्दीन तुग़लक़ बंगाल अभियान से लौट रहा था, तब लौटते समय तुग़लक़ाबाद से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अफ़ग़ानपुर में एक महल (जिसे उसके लड़के जूना ख़ाँ के निर्देश पर अहमद अयाज ने लकड़ियों से निर्मित करवाया था) में सुल्तान ग़यासुद्दीन के प्रवेश करते ही वह महल गिर गया, जिसमें दबकर उसकी मार्च, 1325 ई. को मुत्यृ हो गयी। इस घटना के समय शेख रुकनुद्दीन महल में मौजूद था, जिसे उलूग ख़ाँ ने नमाज़ पढ़ने के बहाने उस स्थान से हटा दिया था। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ का मक़बरा तुग़लक़ाबाद में स्थित है।