भारत में मुस्लिम समाज ‘कन्या भ्रूण-हत्या’ की लानत से सुरक्षित है, इस्लाम में बेटियों को क़त्ल करने वालों को सख़्त-चेतावनी है

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सिकंदर कायमखानी
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कन्या भ्रूण-हत्या
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पाश्चात्य देशों की तरह, भारत भी नारी-अपमान, अत्याचार एवं शोषण के अनेकानेक निन्दनीय कृत्यों से ग्रस्त है। उनमें सबसे दुखद ‘कन्या भ्रूण-हत्या’ से संबंधित अमानवीयता, अनैतिकता और क्रूरता की वर्तमान स्थिति हमारे देश की ही ‘विशेषता’ है…उस देश की, जिसे एक धर्म प्रधान देश, अहिंसा व आध्यात्मिकता का प्रेमी देश और नारी-गौरव-गरिमा का देश होने पर गर्व है।

वैसे तो प्राचीन इतिहास में नारी पारिवारिक व सामाजिक जीवन में बहुत निचली श्रेणी पर भी रखी गई नज़र आती है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान की उन्नति तथा सभ्यता-संस्कृति की प्रगति से परिस्थिति में कुछ सुधार अवश्य आया है, फिर भी अपमान, दुर्व्यवहार, अत्याचार और शोषण की कुछ नई व आधुनिक दुष्परंपराओं और कुप्रथाओं का प्रचलन हमारी संवेदनशीलता को खुलेआम चुनौती देने लगा है। साइंस व टेक्नॉलोजी ने कन्या-वध की सीमित समस्या को, अल्ट्रासाउंड तकनीक द्वारा भ्रूण-लिंग की जानकारी देकर, समाज में कन्या भ्रूण-हत्या को व्यापक बना दिया है। दुख की बात है कि शिक्षित तथा आर्थिक स्तर पर सुखी-सम्पन्न वर्ग में यह अतिनिन्दनीय काम अपनी जड़ें तेज़ी से फैलाता जा रहा है।

इस व्यापक समस्या को रोकने के लिए गत कुछ वर्षों से कुछ चिंता व्यक्त की जाने लगी है। साइन बोर्ड बनाने से लेकर क़ानून बनाने तक, कुछ उपाय भी किए जाते रहे हैं। जहां तक क़ानून की बात है, विडम्बना यह है कि अपराध तीव्र गति से आगे-आगे चलते हैं और क़ानून धिमी चाल से काफ़ी दूरी पर, पीछे-पीछे।

नारी-आन्दोलन (Feminist Movement) भी रह-रहकर कुछ चिंता प्रदर्शित करता रहता है, यद्यपि वह नाइट क्लब कल्चर, सौंदर्य-प्रतियोगिता कल्चर, कैटवाक कल्चर, पब कल्चर, कॉल गर्ल कल्चर, वैलेन्टाइन कल्चर आदि आधुनिकताओं (Modernism) तथा अत्याधुनिकताओं (Ultra-modernism) की स्वतंत्रता, स्वच्छंदता, विकास व उन्नति के लिए; मौलिक मानवाधिकार के हवाले से—जितना अधिक जोश, तत्परता व तन्मयता दिखाता है, उसकी तुलना में कन्या भ्रूण-हत्या को रोकने में बहुत कम तत्पर रहता है।

कुछ वर्ष पूर्व एक मुस्लिम सम्मेलन में (जिसका मूल-विषय ‘मानव-अधिकार’ था) एक अखिल भारतीय प्रसिद्ध व प्रमुख एन॰जी॰ओ॰ की एक राज्यीय (महिला) सचिव ने कहा था: ‘पुरुष-स्त्री अनुपात हमारे देश में बहुत बिगड़ चुका है (1000:840, से 1000:970 तक, लेकिन इसकी तुलना में मुस्लिम समाज में पुरुष-स्त्री अनुपात बहुत अच्छा, हर समाज से अच्छा है। मुस्लिम समाज से अनुरोध है कि वह इस विषय में हमारे समाज और देश का मार्गदर्शन और सहायता करें…।’

मेरी बेटी शिज़ा
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उपरोक्त असंतुलित लिंग-अनुपात (Gender Ratio) के बारे में एक पहलू तो यह है कि कथित महिला की जैसी चिंता, हमारे समाजशास्त्री वर्ग के लोग आमतौर पर दर्शाते रहते हैं और दूसरा पहलू यह है कि जैसा कि उपरोक्त महिला ने ख़ासतौर पर ज़िक्र किया, हिन्दू समाज की तुलना में मुस्लिम समाज की स्थिति काफ़ी अच्छी है। इसके कारकों व कारणों की समझ भी तुलनात्मक विवेचन से ही आ सकती है। मुस्लिम समाज में बहुएं जलाई नहीं जातीं। ‘बलात्कार और उसके बाद हत्या’ नहीं होती। लड़कियां अपने माता-पिता के सिर पर दहेज और ख़र्चीली शादी का पड़ा बोझ हटा देने के लिए आत्महत्या नहीं करती। जिस पत्नी से निबाह न हो रहा हो उससे ‘छुटकारा’ पाने के लिए ‘हत्या’ की जगह पर ‘तलाक़’ का विकल्प है और इन सबके अतिरिक्त, कन्या भ्रूण-हत्या की लानत मुस्लिम समाज में नहीं है।

मुस्लिम समाज यद्यपि भारतीय मूल से ही उपजा, इसी का एक अंग है, यहां की परंपराओं से सामीप्य और निरंतर मेल-जोल (Interaction) की स्थिति में वह यहां के बहुत सारे सामाजिक रीति-रिवाज से प्रभावित रहा तथा स्वयं को एक आदर्श इस्लामी समाज के रूप में पेश नहीं कर सका, बहुत सारी कमज़ोरियों उसमें भी घर कर गई हैं, फिर भी तुलनात्मक स्तर पर उसमें जो सद्गुण पाए जाते हैं, उनका कारण सिवाय इसके कुछ और नहीं हो सकता, न ही है, कि उसकी उठान एवं संरचना तथा उसकी संस्कृति को उत्कृष्ट बनाने में इस्लाम ने एक प्रभावशाली भूमिका अदा की है।

इस्लाम, 1400 वर्ष पूर्व जब अरब प्रायद्वीप (Arabian Penisula) के मरुस्थलीय क्षेत्र में एक असभ्य और अशिक्षित क़ौम के बीच आया, तो अनैतिकता, चरित्रहीनता, अत्याचार, अन्याय, नग्नता व अश्लीलता और नारी अपमान और कन्या-वध के बहुत से रूप समाज में मौजूद थे। इस्लाम के पैग़म्बर का ईश्वरीय मिशन, ऐसा कोई ‘समाज सुधर-मिशन’ न था जिसका प्रभाव जीवन के कुछ पहलुओं पर कुछ मुद्दत के लिए पड़ जाता और फिर पुरानी स्थिति वापस आ जाती। बल्कि आपका मिशन ‘सम्पूर्ण-परिवर्तन’, समग्र व स्थायी ‘क्रान्ति’ था, इसलिए आप (सल्ल॰) ने मानव-जीवन की समस्याओं को अलग-अलग हल करने का प्रयास नहीं किया बल्कि उस मूल-बिन्दु से काम शुरू किया जहां समस्याओं का आधार होता है। इस्लाम की दृष्टि में वह मूल बिन्दु समाज, क़ानून-व्यवस्था या प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बल्कि स्वयं ‘मनुष्य’ है अर्थात् व्यक्ति का अंतःकरण, उसकी आत्मा, उसकी प्रकृति व मनोवृत्ति, उसका स्वभाव, उसकी चेतना, उसकी मान्यताएं व धारणाएं और उसकी सोच (Mindset) तथा उसकी मानसिकता व मनोप्रकृति (Psychology)।

इस्लाम की नीति यह है कि मनुष्य का सही और वास्तविक संबंध उसके रचयिता, स्वामी, प्रभु से जितना कमज़ोर होगा समाज उतना ही बिगाड़ का शिकार होगा। अतएव सबसे पहला क़दम इस्लाम ने यह उठाया कि इन्सान के अन्दर एकेश्वरवाद का विश्वास और पारलौकिक जीवन में अच्छे या बुरे कामों का तद्नुसार बदला (कर्मानुसार ‘स्वर्ग’ या ‘नरक’) पाने का विश्वास ख़ूब-ख़ूब मज़बूत कर दे। फिर अगला क़दम यह कि इसी विश्वास के माध्यम से मनुष्य, समाज व सामूहिक व्यवस्था में अच्छाइयों के उत्थान व स्थापना का, तथा बुराइयों के दमन व उन्मूलन का काम ले। इस्लाम की पूरी जीवन-व्यवस्था इसी सिद्धांत पर संरचित होती है और इसी के माध्यम से बदी व बुराई का निवारण भी होता है।

बेटियों की निर्मम हत्या की उपरोक्त कुप्रथा को ख़त्म करने के लिए पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰द्) ने अभियान छेड़ने, भाषण देने, आन्दोलन चलाने, और ‘क़ानून-पुलिस-अदालत-जेल’ का प्रकरण बनाने के बजाय केवल इतना कहा कि ‘जिस व्यक्ति के तीन (या तीन से कम भी) बेटियां हों, वह उन्हें ज़िन्दा गाड़कर उनकी हत्या न कर दे, उन्हें सप्रेम व स्नेहपूर्वक पाले-पोसे, उन्हें (नेकी, शालीनता, सदाचरण व ईशपरायणता की) उत्तम शिक्षा-दीक्षा दे, बेटों को उन पर प्रमुखता व वरीयता न दे, और अच्छा-सा (नेक) रिश्ता ढूंढ़कर उनका घर बसा दे, तो पारलौकिक जीवन में वह स्वर्ग में मेरे साथ रहेगा।’

‘परलोकवाद’ पर दृढ़ विश्वास वाले इन्सानों पर उपरोक्त संक्षिप्त-सी शिक्षा ने जादू का-सा असर किया। जिन लोगों के चेहरों पर बेटी पैदा होने की ख़बर सुनकर कलौंस छा जाया करती थी (क़ुरआन, 16:58) उनके चेहरे अब बेटी की पैदाइश पर, इस विश्वास से, खिल उठने लगे कि उन्हें स्वर्ग-प्राप्ति का एक साधन मिल गया है। फिर बेटी अभिशाप नहीं, वरदान, ख़ुदा की नेअमत, बरकत और सौभाग्यशाली मानी जाने लगी और समाज की, देखते-देखते काया पलट गई।

मनुष्य की कमज़ोरी है कि कभी कुछ काम लाभ की चाहत में करता है और कभी डर, भय से, और नुक़सान से बचने के लिए करता है। इन्सान के रचयिता ईश्वर से अच्छा, भला इस मानव-प्रकृति को और कौन जान सकता है? अतः इस पहलू से भी कन्या-वध करने वालों को अल्लाह (ईश्वर) ने चेतावनी दी। इस चेतावनी की शैली बड़ी अजीब है जिसमें अपराधी को नहीं, मारी गई बच्ची से संबोधन की बात क़ुरआन में आई हैः

‘और जब (अर्थात् परलोक में हिसाब-किताब, फ़ैसला और बदला मिलने के दिन) ज़िन्दा गाड़ी गई बच्ची से (ईश्वर द्वारा) पूछा जाएगा, कि वह किस जुर्म में क़त्ल की गई थी’ (81:8,9)।

इस वाक्य में, बेटियों को क़त्ल करने वालों को सख़्त-चेतावनी दी गई है और इसमें सर्वोच्च व सर्वसक्षम न्यायी ‘ईश्वर’ की अदालत से सख़्त सज़ा का फ़ैसला दिया जाना निहित है। एकेश्वरवाद की धारणा तथा उसके अंतर्गत परलोकवाद पर दृढ़ विश्वास का ही करिश्मा था कि मुस्लिम समाज से कन्या-वध की लानत जड़, बुनियाद से उखड़ गई। 1400 वर्षों से यही धरणा, यही विश्वास मुस्लिम समाज में ख़ामोशी से अपना काम करता आ रहा है.

आज भी, भारत में मुस्लिम समाज ‘कन्या भ्रूण-हत्या’ की लानत से पाक, सर्वथा सुरक्षित है। देश को इस लानत से मुक्ति दिलाने के लिए इस्लाम के स्थाई एवं प्रभावकारी विकल्प से उसको लाभांवित कराना समय की एक बड़ी आवश्यकता है.

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कन्‍या शिशु हत्‍या: गुपचुप गायब होती लाडली
महिला और बाल कल्याण को लेकर मध्य प्रदेश सरकार के दावे जो भी हों, इस प्रदेश में लाड़लियों की जान को सबसे ज्‍यादा खतरा है. नई दिल्ली के निर्माण भवन से निकली स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आसूचना ब्यूरो की रिपोर्ट ‘नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2010’ के पांच साल के आंकड़े तो यही कहते हैं.

सुधीर गोरे और समीर गर्ग
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महिला और बाल कल्याण को लेकर मध्य प्रदेश सरकार के दावे जो भी हों, इस प्रदेश में लाड़लियों की जान को सबसे ज्‍यादा खतरा है. नई दिल्ली के निर्माण भवन से निकली स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आसूचना ब्यूरो की रिपोर्ट ‘नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2010’ के पांच साल के आंकड़े तो यही कहते हैं. ब्यूरो ने ये आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हवाले से दिए हैं.

मध्य प्रदेश ने वर्ष 2009 के दौरान भ्रूण हत्या के 23 मामलों और शिशु हत्या के 51 मामलों के साथ पंजाब-हरियाणा सहित देश के सभी राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पीछे छोड़ते हुए शर्मनाक रूप से पहला स्थान हासिल किया है. 

ज्‍यादा दिन नहीं हुए जब एनसीआरबी रिपोर्ट में कहा गया था कि बलात्कार के सबसे ज्‍यादा 2,998 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज हुए और देश के ऐसे कुल मामलों में इस राज्‍य का 14 फीसदी हिस्सा है. 19.2 फीसदी (24,201 में से 4,646) भागीदारी के साथ बच्चों के साथ हुए अपराधों में मध्य प्रदेश का नाम सबसे ऊपर था. इतना ही नहीं, मध्य प्रदेश (39) और पंजाब (23) गर्भस्थ शिशुओं की हत्या के मामले में सबसे आगे हैं. देश में होने वाले इस जघन्य अपराध में दोनों राज्‍यों का 44.3 फीसदी हिस्सा है.

बच्चों के अधिकारों के लिए कार्यरत भोपाल स्थित सामाजिक संस्था विकास संवाद की ओर से जुटाए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2005 से जनवरी 2011 के बीच मेडिकली टर्मिनेटेड प्रैग्नेंसी.ज (एमपीटी) के रूप में प्रदेश में 1,44,066 गर्भस्थ शिशुओं को जान गंवानी पड़ी. प्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की मासिक रिपोर्टों के आधार पर इस संस्था का कहना है कि मध्य प्रदेश में बीते छह वर्षों में 1 वर्ष से कम आयु के 1,50,512 शिशुओं की मौत हो गई. प्रदेश में घटते शिशु लिंगानुपात की मौजूदा विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर छोटे बच्चों की ये मौतें संवेदनशील नजर आती हैं.

बीते 4 अप्रैल को जारी हुए जनगणना-2011 के प्रारंभिक आंकड़े भी मध्य प्रदेश में नन्ही बालिकाओं की जिंदगी को लेकर स्याह तस्वीर पेश करते हैं. शिशु लिंगानुपात (6 वर्ष से कम उम्र के बालकों की तुलना में बालिकाओं का अनुपात) के आंकड़े भी काफी हद तक चौकाने वाले हैं. जहां यह अनुपात वर्ष 2001 की जनगणना के प्रति 1,000 बालकों पर 932 बालिकाओं की तुलना में 20 अंक घट कर 912 रह गया.

वर्ष 2001 में जहां 4 जिलों मुरैना, भिंड, ग्वालियर और दतिया में 1,000 लड़कों पर 900 से कम लड़कियां थीं वहीं अब 2011 के प्रारंभिक आंकड़ों में यह स्थिति 10 जिलों में हो गई है और इनमें अब शिवपुरी, टीकमगढ़, छतरपुर, श्योपुर और प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर भी जुड़ गए हैं तथा नरसिंहपुर (900) तथा गुना (901) भी किनारे पर हीं हैं. भिंड (महज 2 अंक की बढ़ोतरी) के अलावा मध्य प्रदेश के सभी जिलों में 0 से 6 वर्ष की लड़कियों की संख्या घट गई है.

नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2010 को लेकर मध्यप्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग में प्रमुख सचिव बी.आर. नायडू इससे अनभिज्ञ हैं, ”किसकी रिपोर्ट है, किस मंत्रालय की है? अभी इसे देखा नहीं है, आपसे जानकारी मिली है तो देखते हैं.” महिला और बाल विकास मंत्री रंजना बघेल का कहना है, ”प्रदेश के 14 जिलों में लड़कियों को लेकर भेदभाव की बात लिंगानुपात से पता चलती थी किंतु आज लोगों की सोच में अंतर आया है.”

दरअसल, सामाजिक कारणों की वजह से मध्य प्रदेश का ग्वालियर-चंबल अंचल कन्या भ्रूणहत्या और कन्या शिशुहत्या का प्रमुख केंद्र रहा है. गांवों में यह कहावत प्रचलित है कि एक रुपया और एक मोडा किसी का काम नहीं. परंपरागत रूप से चली आ रही इस सामाजिक बुराई के पीछे कई भ्रांतियां और सामाजिक कुरीतियां जिम्मेदार हैं.

गांवों में पोर्टेंबल सोनोग्राफी मशीन के जरिए लिंग परीक्षण किया जाता है. लड़का और लड़की की पहचान के लिए कोडवर्ड ईजाद किए गए हैं. ऐसे परीक्षण या अवैध गर्भपात के मामले सामने आते भी हैं, लेकिन ज्यादातर सबूतों के अभाव में दम तोड़ जाते हैं.

मुरैना और श्योपुर जिले में सक्रिय एनजीओ ‘धरती’ के 40 वर्षीय देवेंद्र भदौरिया कहते हैं ”मुरैना में ही 15 और ग्वालियर में 150 से 200 सोनोग्राफी सेंटर हो गए हैं. यह प्रवृत्ति शिक्षित तबके में बढ़ गई है. कई बुजुर्ग भी कहते हैं कि 1000-2000 रुपए डॉक्टर को देने पर काम बनता है तो क्यों पाप मोल लें.”

विकास संवाद के प्रमुख सचिन जैन का कहना है, ”कन्या भ्रूणहत्या, कन्या शिशु हत्या और गिरते लिंगानुपात में समाज के पढ़े-लिखे और सामाजिक रूप से संपन्न समुदायों की भूमिका ज्‍यादा रही है. जो समुदाय जातिगत व्यवस्था में ऊंचा स्थान रखते हैं, उन्होंने अल्ट्रा साउंड जैसी तकनीकों का ज्‍यादा उपयोग किया है.” जैन का कहना है, ”जरूरत है लिंग चुनाव और भ्रूण हत्या विरोधी कानून के ठोस क्रियान्वयन की.” एक समय तक जिला चिकित्सा अधिकारियों को ही इस कानून के क्रियान्वयन और निगरानी के अधिकार थे, जिन्होंने अपने और दूसरे डॉक्टरों के हितों का संरक्षण किया. हजारों बालिकाओं की हत्या होती रही पर किसी भी अपराधी डाक्टर को सालों तक कोई सजा नहीं हुई. एक तरफ सरकार चिंता जाहिर करती रही और दूसरी तरफ क़ानून का बेहद लचर क्रियान्वयन हुआ.

मध्य प्रदेश वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक मुकेश सिन्हा का दावा है, ”इंदौर में पिछले ढाई वर्ष में स्थानीय प्रशासन के साथ निगरानी प्रक्रिया में सिविल सोसाइटी के सदस्यों की सहभागिता के कारण भ्रूणहत्या के मामलों पर रोक में काफी मदद मिली है.”

मध्य प्रदेश सरकार ने इस मसले पर काम करते हुए लाडली लक्ष्मी योजना और कन्यादान योजना शुरू की. महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक सुरेश तोमर का कहना है कि किसी भी योजना के लागू होने से लोगों की मानसिकता में बड़ा बदलाव नहीं आया है फिर भी चंबल अंचल के भिंड जिले में लोगों की सोच बदलने में मदद मिली है. वे कहते हैं कि चंबल अंचल में पुरुषों की सोच हरियाणा से अलग नहीं है, जिसमें वे महिलाओं को ज्यादा इज्जत नहीं देते हैं.

आखिर चंबल अंचल में ऐसा क्यों है, इसके बारे में जीवाजी विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ. विमलेन्द्र सिंह राठौड़ के मुताबिक, ”यहां लोगों की मानसिकता यही है कि लड़की पराया धन है, जबकि लड़के होंगे तो समाज में रुतबा कायम रहेगा.”

सरकार यह मानती है कि लड़कियों की संख्या कम होने के पीछे गरीबी या आर्थिक कारण सबसे अहम हैं और आर्थिक मदद देकर लड़कियों को बचाया जा सकव्गा. लेकिन जैन का मानना है, ”यह नजरिया बिलकुल सही नहीं है. वास्तव में सरकार को समाज की पितृसत्तात्मक सोच पर प्रहार करना होगा, जो यह मानता है कि लड़की एक परिवार को कमजोर करती है. चिकित्सकीय गर्भपात और शिशु मृत्यु संबंधी आंकड़ों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है.”

लिंगानुपात की विषमता पर रोक लगाने के लिए पिछले वर्ष भी ग्वालियर में अपना रिकार्ड सही नहीं रखने के चलते कई अल्ट्रासाउंड सेंटरों को बंद किया गया था, लेकिन इन लोगों ने फिर से अपनी पहुंच का इस्तेमाल किया और कारोबार शुरू कर दिया. ग्वालियर के कलेक्टर आकाश त्रिपाठी इस समस्या से निपटने के लिए अल्ट्रासाउंड सेंटर में सोनोग्र्राफी को रिकॉर्ड करने के लिए एक हार्डवेयर डिवाइस लगाने संबंधी प्रयोग कर रहे हैं.

-साथ में महश शर्मा