मंदिर में हुआ रेप, तुम्हें हिंदू होने पर शर्म क्यों नहीं आई?

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लेखक – विश्व गौरवविश्व गौरव
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16 दिसंबर 2012, दिल्ली की एक बस में अपने दोस्त के साथ जा रही लड़की का सामूहिक बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी जाती है। बलात्कारियों को कड़ी सजा मिले, इसके लिए देशभर की छोटी-छोटी गलियों से लेकर राष्ट्रीय राजधानी तक हर उम्र के लोग सड़कों पर निकल पड़ते हैं। इतिहास में पहली बार आम लोग राष्ट्रपति भवन पहुंच जाते हैं, देश में पहली बार सभी राजनीतिक पार्टियां एक सुर में ऐसे अपराध के खिलाफ कड़े कानून की बात करने लगती हैं, कानून कितना कड़ा हुआ, यह अलग विषय है लेकिन जरा सोचिए आज, 2018 में, हम कहां आ गए हैं…

फाइल फोटो: बलात्कारियों के लिए सजा की मांग करते लोग

10 जनवरी को जम्मू-कश्मीर के लसाना गांव से एक 8 साल की बच्ची का अपहरण कर लिया जाता है। उस बच्ची का पहले जंगल में रेप किया जाता है फिर उसे कठुआ के एक मंदिर में छिपाकर वहां उसके साथ हवसीपन दिखाया जाता है। इसके बाद उस मासूम की हत्या कर दी जाती है। ऐसा करनेवालों में एक आरोपी उसी मंदिर का केयरटेकर है। बात सिर्फ इतनी-सी नहीं है। मामले में पुलिस की संलिप्तता सामने आने के बाद जब केस क्राइम ब्रांच को सौंपा गया तो मामले में लगभग 8 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इनमें कुछ पुलिसवाले और एक नाबालिग भी शामिल था। असल मामला अब शुरू होता है।
9 अप्रैल को जब क्राइम ब्रांच द्वारा गठित एसआईटी अपनी चार्जशीट दाखिल करने जा रही थी, उससे पहले बलात्कार के इन आरोपियों को बचाने के लिए एक संगठन खड़ा किया जाता है और उसे नाम दिया जाता है ‘हिंदू एकता मंच’। क्योंकि बलात्कार के लगभग सभी आरोपी हिंदू हैं और वह बच्ची मुस्लिम… 9 अप्रैल को क्राइम ब्रांच को चार्जशीट दाखिल नहीं करने दी जाती है और साथ ही 11-12 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर बंद भी बुला लिया जाता है।
अब सवाल यह है कि कौन थे वे लोग जिन्होंने उस मासूम को अपनी हवस का शिकार बनाकर अपने पुरुषत्व को प्रमाणित करने की कोशिश में नपुंसकता के प्रतिमान स्थापित कर दिए? कौन हैं वे लोग जो विशुद्ध पाखंड की पराकाष्ठा को पार कर इस तरह के घृणित कुकृत्य को अंजाम देनेवालों के समर्थन में खड़े हो गए हैं। जिस देवस्थल की सांस्कृतिक चेतना कन्याओं में देवी देखती है, उसी देवस्थल में हैवानियत के हिमालय खड़े करनेवाले लोगों में अगर किसी को ‘हिंदू’ दिख रहा है तो उसे अपनी आंखों का उपचार कराने की आवश्यकता है क्योंकि निश्चित ही उसे दृष्टिदोष है।

उस बच्ची का गैंगरेप हुआ, सोशल मीडिया पर जो भी उस बच्ची के लिए न्याय की मांग करता दिखा, उसे असम, सासाराम और सहारनपुर जैसे स्थानों पर हुए बलात्कारों की याद दिलाई जाने लगी क्योंकि इन स्थानों पर हुए बलात्कारों में पीड़िता हिंदू थीं और आरोपी मुसलमान। संवेदनहीनता की इससे अधिक पराकाष्ठा क्या होगी कि लोग एक रेप पीड़िता का भी धर्म खोज लाए। बलात्कार चाहे किसी हिंदू लड़की का हो या मुस्लिम लड़की का, अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए। पीड़िता का कोई धर्म नहीं होता और ना ही अपराधी का… लेकिन जरा रुकिए… देश में हर रोज बलात्कार होते हैं लेकिन मैं कठुआ में हुए बलात्कार को लेकर ही क्यों लिख रहा हूं? क्योंकि मुझे आज अपने देश प्रेमी होने, अपने भारतीय होने और अपने भारतीय होने पर शर्म आ रही है…
8 साल की एक बच्ची का मंदिर में रेप हो जाता है और लोग बलात्कारियों के समर्थन में तिरंगे लेकर निकल आते हैं, वे ‘जय श्रीराम’, ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हैं। मुझे एक सनातनी के तौर पर शर्म आती है क्योंकि मेरे श्रीराम के नाम का इस्तेमाल बलात्कारियों के समर्थन में किया जा रहा है। मुझे एक हिंदू के तौर पर शर्म आती है क्योंकि हिंदुत्व के नाम पर उस 8 साल की बच्ची के बलात्कार और हत्या को अप्रत्यक्ष रूप से जायज ठहराने की कोशिश हो रही है। मुझे एक भारतीय के तौर पर शर्म आती है क्योंकि मेरे तिंरगे का इस्तेमाल एक बच्ची की अस्मत को तार-तार करनेवाले नरपिशाचों को बचाने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि उन बलात्कारियों को बचाने के लिए ‘भारतमाता की जय’ जैसे नारे लगाए जाते हैं। मुझे राष्ट्रवादी होने पर शर्म आ रही है क्योंकि मैंने जिस राष्ट्रवाद का करीबी मानते हुए एक पार्टी विशेष को वोट दिया, उसी पार्टी के नेता बलात्कारियों के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं।
और हां, ऐसी ही शर्म तब मुसलमानों को भी आनी चाहिए जब कोई मौलवी किसी 6 साल की बच्ची को चॉकलेट देने के बहाने ले जाता है और उसका बलात्कार कर देता है। हिंदुस्थानी मुसलमान होने पर उन्हें तब शर्म आनी चाहिए जब तिरंगे की जगह पाकिस्तान और आईएसआईएस के झंडे लहराए जाते हैं। मुसलमानों को ऐसी ही शर्म तब आनी चाहिए जब इस्लाम के नाम पर ‘अल्लाह हु अकबर’ जैसे नारों के साथ मासूम और निर्दोष लोगों का कत्ल कर दिया जाता है।
‘दूसरे पक्ष’ का क्या करें?
कठुआ में जो हुआ, उसे लेकर सोशल मीडिया के शूरवीर कह रहे हैं कि मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए। जांच से परहेज नहीं है लेकिन प्राथमिक सवाल समझिए..
1. क्या बच्ची का अपहरण नहीं हुआ था?
2. क्या बच्ची का रेप नहीं हुआ था?
3. क्या बच्ची की हत्या नहीं हुई थी?

फाइल फोटो: देशभर में हो रहे हैं प्रदर्शन

जब इतना सबकुछ हुआ था और पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा गठित एसआईटी ने जांच कर ली है तो सीबीआई जांच की जरूरत क्यों? मान लीजिए, प्रदेश में किसी विपक्षी पार्टी की सरकार होती तो आप कह सकते थे कि पुलिस ने विपक्षी पार्टी के हिसाब से रिपोर्ट में गड़बड़ी की, इसलिए सीबीआई जांच चाहिए लेकिन यहां तो आपकी ही सरकार है, पुलिस भी आपके ही अंडर में आती है और अगर आपको अपनी ही पुलिस पर भरोसा नहीं है तो सरकार क्यों चला रहे हैं? लेकिन आप इसपर सवाल नहीं उठाएंगे क्योंकि आपके संगठन के पंजीकृत कार्यकर्ता उन नर रूपी पिशाचों के समर्थन में बाजार बंद करा रहे हैं, आपकी ‘बुआ’ के पुलिसवाले उस बच्ची को इसलिए नहीं मरने देना चाहते थे क्योंकि उन्हें भी अपनी हवस की आग बुझानी थी, और तुम्हारे साहेब को उन्हीं बुआ के साथ मिलकर देश के एक बड़े क्षेत्रफल पर भगवा कब्जा भी तो दिखाना है…
याद रखना बीजेपीवालो, बेटियां तुम्हारे घर में भी हैं, ये बड़ी-बड़ी गाड़ियों से घूमनेवाले, घर के फाइव स्टार शौचालय से लेकर रैलियों के ए-ग्रेड मंचों तक जेड ग्रेड सुरक्षा रखनेवालों की बेटियों को कोई नुकसान नहीं होगा लेकिन अगर तुम सिर्फ इसलिए चुप रहे क्योंकि तुम्हारी बेटी फिलहाल सुरक्षित है तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं है जब मानवता और शुचिता के ये दुश्मन तुम्हारे घर के अंदर घुसकर तुम्हें ललकारेंगे और तुम सिर्फ मोदी-योगी चिल्लाते रहोगे।

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डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं
लेखक
विश्व गौरवविश्व गौरव
लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए (फ़िलॉसफ़ी) करने के बाद भोपाल के माखनलाल. . .