मज़्हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोसिताँ हमारा

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Pradeep Kasni
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इक़बाल वाणी ∆
#सारे_जहाँ_से_अच्छा_हिन्दोसिताँ_हमारा

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलसिताँ हमारा

ग़ुर्बत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा

परबत वह सबसे ऊँचा, हम्साया आसमाँ का
वह संतरी हमारा, वह पासबाँ हमारा

गोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँ
गुल्शन है जिनके दम से रश्के-जनाँ हमारा

ऐ आबे-रूदे-गंगा! वह दिन हैं याद तुझको?
उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा

मज़्हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोसिताँ हमारा

यूनानो-मिस्रो-रूमा सब मिट गये जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी नाम-व-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे-ज़माँ हमारा

‘इक़्बाल’! कोई महरम अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को दर्दे-निहाँ हमारा !

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आब-ए-रूद-ए-गंगा — गंगा का बहता पानी । गुर्बत — परदेस । जहां — लोक; दुनिया । दर्द-ए-निहाँ — छिपा हुआ दु:ख । दुश्मन — शत्रु । नाम-व-निशाँ — नाम और चिह्न । पासबाँ — रक्षक । मज़्हब — धर्म । महरम — परिचित । यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा — यूनान, मिस्र और रोम । रश्क-ए-जनाँ — स्वर्ग का प्रतिस्पर्धी । वतन — स्वदेश । हमसाया — पड़ोसी । हस्ती — अस्तित्व । हिन्दी — भारत के रहने वाले ।

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