मध्य प्रदेश : 10 रुपए के अनुबंध पर बेचा जा रहा है लड़कियों का जिस्म

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Sagar_parvez
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#डिजिटल_इंडिया_महिला_सम्मान! मात्र 10 रुपए का अनुबंध पर बेचा जा रहा लड़कियों का जिस्म- …ये भी बहने बेटियाँ ही हैं

कोई महिला-सशक्तिकरण की बात नहीं करता। विकास की तथाकथित आंधी वहां अभी पत्ते भी नहीं हिला पायी है।

क्या आपने किसी ऐसी प्रथा के बारे में सुना है, जिसमें लड़िकयों के जिस्मों को बेचा जाए। वह भी दस रुपए के स्टाम्प पर। यदि आप सोच रहे हैं कि ऐसा नहीं है तो आप गलत सोच रहे हैं। हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी ही प्रथा के बारे में जो कुप्रथा बन गयी है।

यह प्रथा है मध्य प्रदेश के शिवपुरी कि जो धड़ीचा प्रथा के नाम से प्रचलित है। औरतों की खरीद फरोख्त की इसी प्रथा की शिकार कल्पना अब तक दो पति बदल चुकी है और दो साल से दूसरे पति रमेश के साथ रह रही है।

ठीक उसी तरह रज्जो पहले पति को छोड़कर अब दूसरे पति के साथ है। दरअसल यहां प्रथा की आड़ में गरीब लड़कियों का सौदा होता है और उनकी मंडी लगती है। इसमें पुरुष अपनी पसंदीदा औरत की बोली लगाते हैं। सौदा तय होने के बाद बिकने वाली औरत और खरीदने वाले पुरुष के बीच अनुबंध किया जाता है और यह अनुबंध 10 रुपये से लेकर 100 रुपये तक के स्टाम्प पर किया जाता है।

यह बताते चले कि घटता का मुख्य कारण है लिंगानुपात। एक अनुमान के मुताबिक यहां हर साल करीब 300 से ज्यादा महिलाओं को दस से 100 रूपये तक के स्टांप पर खरीदा और बेचा जाता है इतना ही नहीं शर्त के अनुसार खरीदने वाले व्यक्ति को महिला को एक निश्चित रकम देना पड़ता है। रकम अदा करने के बाद, रकम के अनुसार महिला निश्चित समय के लिए उस व्यक्ति की बहू या पत्नी बन जाती है। रकम ज्यादा होने पर संबंध स्थाई या फिर संबंध खत्म हो जाते हैं।

फिर अनुबंध खत्म होने के बाद लौटी महिला का दूसरे के साथ सौदा कर दिया जाता है। कई बार इसे सरकार के समक्ष उठाया गया। लेकिन इसका कोई ठोस सबूत अभी तक पेश नहीं किया गया है। क्योंकि यहां पर इस खेल में शामिल महिलाएं या कोई पीड़ित खुलकर सामने नहीं आता औऱ न ही कोई इसके खिलाफ आवाज उठाता है। जिसके कारण यह धंधा यहां पर ऐसे ही चल रहा है।

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यहां बेटियों के ‘जिस्म’ से पलता है परिवार..
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यह अपनी बेटियों के जिस्म को बेचकर पेट पालने वाली एक ऐसी जाति का काला सच है, जिसकी दास्तां सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। हालांकि है यह बहुत ही कड़वी हकीकत। कई सरकारें आईं और चली गईं मगर कोई भी समाज के इस बदनुमा दाग को नहीं मिटा सकी।

हैरानी इस बात की भी है कि कुप्रथा खत्म होने के बजाय अब हाईप्रोफाइल और हाईटेक होती जा रही है। जिस्म बेचने वाली लड़कियों को बाकायदा स्टाइलिश हेयर कट, कास्ट्यूम, स्मार्टफोन इस्तेमाल कर अपना रहन-सहन बदलने की टिप्स दी जा रही है ताकि उन्हें अच्छे ग्राहक मिल सकें।

मंदसौर-नीमच और रतलाम जिले में रहने वाली बांछडा जाति पंरपरा के नाम पर ऐसी घिनौनी कुप्रथा ढो रही है, जिसे भारतीय समाज कभी स्वीकार नहीं कर सकता। इस इलाके में बरसों से इनके डेरों पर जिस्मफरोशी की जाती रही है। एक लंबा वक्त गुजर जाने के बाद लगता था कि अब ये घिनौना करोबार बंद या कम हो चुका होगा, लेकिन जो देखने को मिला वह वाकई चौंकाने वाला था।

अब तो जिस्म का ये बाजार बढ़ा ही नहीं है बल्कि नए ट्रेंड्स के साथ पूरे शबाब पर पंहुच चुका है। यहां तक कि इस समाज में लड़कियां पैदा होने की मन्नतें की जाती हैं। लड़की पैदा होते ही उसकी परवरिश बेहद खास तरीके से की जाती है। इस समाज में लड़कियां पैदा होना किसी लॉटरी से कम नहीं माना जाता। महज दस साल की उम्र में इन्हें उन लोगों के सामने परोस दिया जाता है जो हवस के भूखे होते हैं।

पहली बार धंधे में उतारने के लिए बाकयदा एक रस्म अदा की जाती है। शौकिया धन्ना सेठों या इलाके के अफीम तस्कर इनकी बोली लगाकर इनके साथ पहली रात गुजारते हैं। घर-परिवार को इस रात के बदले मोटी रकम अदा की जाती है। इसे नथ उतारना कहा जाता है। इस दिन से लड़की खिलावड़ी कहलाने लगती है। बडी उम्र की लडकियां इन्हें सिखाती हैं कि ग्राहकों को कैसे संतुष्ट किया जाए और बदले में उनकी जेब कैसे ढीली की जाती है।

राजस्थान से सटे तीनों जिलों में बांछडा समुदाय की करीब दो हजार लड़कियां जिस्मफरोशी के इस धंधे से जुड़ी हुई हैं। हैरानी की बात ये है कि बांछड़ा समुदाय के पुरुष लड़कियों के जिस्म से मिलने वाली कमाई के भरोसे ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। गांवों में रहने वाली बांछड़ा जाति के हाईवे पर कई सारे डेरे बने हुए हैं। हाईवे किनारे शाम ढलने और रात के अंधेरे से लगाकर दिन के उजाले तक में जिस्म की मंडी हर दिन सरेबाजार सजती है।

इस हाईवे से हर दिन पुलिस, अफसर, नेता हर कोई यहां से गुजरता है मगर मजाल कि कोई इस धंधे पर अंकुश लगा सके। कई सामाजिक संगठन और सरकारें इन्हें मुख्यधारा में शामिल कराने और यह काम बंद कराने के नाम पर प्रोजेक्ट और शोध कर बेहिसाब रुपया खर्च कर गईं मगर नतीजा आज भी जस का तस यानी ढाक के तीन पात ही है।