मनुष्य अपनी विपत्तियों को निमंत्रण देता है

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मुदित मिश्र विपश्यी
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हाँ, मनुष्य अपनी विपत्तियों को निमंत्रण देता है और फिर इन दुखदायी अतिथियों के प्रति विरोध प्रकट करता है, क्योंकि वह भूल जाता है कि उसने कैसे , कब और कहाँ उन्हें निमन्त्रण-पत्र लिखे तथा भेजे थे। परन्तु समय नहीं भूलता; समय उचित अवसर पर हर निमन्त्रण-पत्र ठीक पते पर दे देता है, और समय ही हर अतिथि को मेजबान के घर पहुँचाता है।

मैं तुमसे कहता हूँ , किसी अतिथि का विरोध मत करो,कहीं ऐसा न हो कि बहुत ज्यादा देर तक ठहरकर, या जितनी बार वह अन्यथा आवश्यक समझता उससे अधिक बार आकर, वह अपने स्वाभिमान को लगी ठेस का बदला ले।

अपने सभी प्रेमपूर्ण अतिथियों का प्रेमपूर्वक सत्कार करो, चाहे उनकी चाल-ढाल और उनका व्यवहार कैसा भी हो क्योंकि वे वास्तव में केवल तुम्हारे लेनदार हैं। खासकर अप्रिय अतिथियों का जितना चाहिये उससे भी अधिक सत्कार करो ताकि वे सन्तुष्ट और आभारी होकर जायें, और यदि दोबारा तुम्हारे घर आयें तो मित्र बनकर आयें, लेनदार बनकर नहीं।

प्रत्येक अतिथि की ऐसी आवभगत करो मानो वह तुम्हारा विशेष सम्मानित अतिथि हो , ताकि तुम उसका विश्वास प्राप्त कर सको और उसके आने के गुप्त उद्देश्यों को जान सको।

दुर्भाग्य को इस प्रकार स्वीकार करो मानो वह सौभाग्य हो, क्योंकि दुर्भाग्य को यदि एक बार समझ लिया जाये तो वह शीघ्र ही सौभाग्य में बदल जाता है। जब कि सौभाग्य का यदि गलत अर्थ लगा लिया जाये तो वह शीघ्र ही दुर्भाग्य बन जाता है।

समय और स्थान के अन्दर कोई आकस्मिक घटना नहीं होती। सब घटनाएँ प्रभु – इच्छा के आदेश से घटती हैं, जो न किसी बात में गलती करती है, न किसी चीज़ को अनदेखा करती है।

【📘किताब-ए-मीरदाद, पृष्ठ – १३८,१३९】