#मस्जिद और इबादत part 31_इस्लाम में मस्जिद की अहमियत!!”मस्जिदे आज़म कुम!!

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मस्जिद ईश्वर का घर और उपासना स्थल है।

मस्जिद वह स्थान है जहां समाज के विभिन्न वर्गों के लोग धार्मिक दायित्वों को अदा करने के लिए एकत्रित होते हैं। मस्जिद में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग नमाज़ पढ़ने के लिए एकत्रित होते हैं और वहां वे एक दूसरे से विचारों का आदान- प्रदान करते हैं। इस बात के दृष्टिगत मस्जिद उपासना के अलावा राजनीतिक गतिविधियों का भी एक महत्वपूर्ण केन्द्र हो गयी। अतः मस्जिद की एक उपयोगिता राजनीतिक कार्य हैं। जिस समाज में इस्लामी शासन हो उसमें लोगों और जिम्मेदार अधिकारियों के बीच दूरी नहीं होनी चाहिये। अतः मुसलमान, समाज में सरकार के क्रिया- कलापों और दृष्टिकोणों पर अच्छी तरह नज़र रख सकते हैं और साथ ही वे राजनीतिक मामलों में खुलकर अपने दृष्टिकोणों को बयान कर सकते हैं। इसी प्रकार लोग अपने रचनात्मक प्रस्तावों, सुझावों व कार्यक्रमों को पेश करके इस्लामी सरकार की सहायता कर सकते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम ने मदीना नगर में इस्लामी सरकार की बुनियाद रखने के बाद इस्लामी सरकार में लोगों के शामिल होने और उन्हें धार्मिक व ग़ैर धार्मिक मामलों से अवगत कराने के लक्ष्य से मस्जिद को इस्लामी सरकार के एक केन्द्र के रूप में चुना। यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि पैग़म्बरे इस्लाम के बाद के कालों में भी राजनीतिक कार्यों के लिए मस्जिद का प्रयोग होता था और उस समय बहुत से कार्य मस्जिद में ही अंजाम दिये जाते थे। जैसे ख़लीफा का चयन, उसके साथ बैअत करना अर्थात उसकी आज्ञा पालन की वचनबद्धता, गवर्नरों और दूसरे अधिकारियों की नियुक्ति, विचार विमर्श के लिए बैठक करना, जेहाद के लिए मुसलमानों को प्रोत्साहित करना आदि समस्त कार्य मस्जिद में होते थे। इस प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम के पावन जीवन काल से लेकर अब्बासी शासकों के आरंभ तक मस्जिदों को उपासना के अलावा समस्त राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र समझा जाता था। उदाहरण के तौर पर हज़रत फातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने बाग़े फदक के बारे में मस्जिद में भाषण दिया और उसके संबंध में पहले ख़लीफा के काल में मस्जिद में ही आपत्ति जताई।

मदीना में इस्लामी सरकार गठित हो जाने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम समस्त राजनीतिक गतिविधियों को मस्जिद में अंजाम देते थे। इसी प्रकार दूर -दूर से जो प्रतिनिधिमंडल और दूत मदीना आते थे पैग़म्बरे इस्लाम सबका स्वागत और उनसे वार्ता मस्जिद में ही करते थे। पैग़म्बरे इस्लाम इन प्रतिनिधिमंडलों और दूतों से जो वार्ता करते थे उनमें से एक वार्ता ताज़ा इस्लाम धर्म के बारे में होती थी। इसी प्रकार इन भेंटों में इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण के बारे में भी वार्ता होती थी। मस्जिदुन्नबी में एक विशेष स्तंभ था जिसके नीचे दूसरी जगहों से आये प्रतिनिधिमंडलों और दूतों आदि से वार्ता होती थी। इसी कारण मस्जिद के उस स्तंभ को “अमुदूल वुफूद” के नाम से जाना जाता था।

विभिन्न क्षेत्रों में इस्लाम के फैल जाने के साथ विभिन्न नगरों व गांवों में मस्जिदें बन गयीं और उन नगरों व गांवों में मस्जिदों की उपस्थिति इस्लामी सरकार की सूचक थी। साथ ही जब मुसलमान किसी क्षेत्र पर विजय प्राप्त करते थे तो उनका प्रयास यह होता था कि नगर की मुख्य मस्जिद का निर्माण शासक के जीवन स्थल के निकट हो। कुछ नगरों में मस्जिद और शासक के निवास स्थान को मिलाकर बनाया गया था इस प्रकार से कि विदित में दो इमारतें एक दूसरे से मिली हुई थीं। मस्जिद और इस्लामी शासक के घर की निकटता इस आस्था को दर्शाती थी कि समस्त धार्मिक और राजनीतिक मामलों की ज़िम्मेदारी और ताक़त शासक के हाथ में है। वास्तव में इस्लाम धर्म की एक विशेषता यह है कि इसमें धर्म और राजनीति एक दूसरे से अलग नहीं हैं। इसी प्रकार मस्जिद के राजनीतिक महत्व को इस चीज़ से समझा जा सकता है कि राजकोष की सुरक्षा हमेशा नगर की अस्ली मस्जिद में की जाती थी।

मस्जिदे आज़म कुम की एक प्राचीन और ऐतिहासिक मस्जिद है। इसमें प्रतिदिन हज़ारों तीर्थयात्री और ग़ैर तीर्थयात्री नमाज़ पढ़ते हैं। पवित्र नगर कुम में इमाम रज़ा की बहन हज़रत फातेमा मासूमा का पावन रौज़ा है और यह मस्जिद रौज़े से बिल्कुल लगी हुई है। इस मस्जिद का निर्माण अपने समय के वरिष्ठतम शीया धर्मगुरू आयतुल्लाह बुरुजेर्दी ने 1954 में करवाया। उन्होंने इस मस्जिद का निर्माण अपने समय के प्रसिद्ध वास्तुकार हुसैन बिन मोहम्मद से कराई जो उस्ताद लुरज़ादे के नाम से मशहूर हैं चूंकि यह मस्जिद बहुत बड़ी है इसलिए इसे मस्जिदे आज़म कहा जाता है।

इस मस्जिद में महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएं घटी हैं। जैसे वर्ष 1964 में स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने इस मस्जिद में ऐतिहासिक भाषण दिया। इसी प्रकार पवित्र नगर कुम में धार्मिक शिक्षा दिये जाने की एक महत्वपूर्ण जगह यह मस्जिद है। इस मस्जिद में वरिष्ठ धर्मगुरूओं की बड़ी- बड़ी क्लासें होती हैं। जैसे आयतुल्लाहिल उज़मा वहीद खुरासानी, आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी, आयतुल्लाह सुब्हानी, आयतुल्लाह शुबैरी ज़न्जानी, आयतुल्लाह नूरी हमदानी, आयतुल्लाह जवादी आमूली और आयतुल्लाह अलवी बुरुजेर्दी। इसी प्रकार इस मस्जिद में शोक सभाओं आदि का भी आयोजन होता है।


दिवंगत आयतुल्लाहिल उज़्मा हाज हुसैन तबातबायी बुरुजेर्दी ने इस मस्जिद को बनवाया है। उनका मानना था कि हज़रत फातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के रौज़े के बगल में गौहर शाद मस्जिद जैसी एक मस्जिद होनी चाहिये जो मस्जिद पवित्र नगर मशहद में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े के बगल है। इसी प्रकार उनका मानना था कि भविष्य में कुम के शिक्षा केन्द्र को बड़ी जगह की ज़रुरत पड़ेगी और कितना अच्छा होगा कि यह जगह मस्जिद हो और वह भी हज़रत फातेमा मासूमा के रौज़े के बगल में। आयतुल्लाहिल उज़्मा हुसैन तबातबाई ने हज़रत मासूमा के रौज़े के आस- पास के घरों और दुकानों को खरीद लिया और इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर यानी 21 तीर 1333 अर्थात 1954 को इस मस्जिद की आधार शिला रख दी। इस मस्जिद के निर्माण पर जो खर्च आया उसके एक भाग को स्वयं आयतुल्लाहिल उज़्मा बुरुजेर्दी और शेष लोगों ने दिया।

इस मस्जिद का क्षेत्रफल 12 हज़ार वर्गमीटर है। चूंकि यह मस्जिद बहुत बड़ी है इसलिए सामूहिक रूप में पढ़ी जाने वाली नमाज़ों और दूसरे धार्मिक कार्यक्रमों के लिए बहुत उचित स्थान है। इस मस्जिद का निर्माण अपने समय के प्रसिद्ध वास्तुकार हाज हुसैन लुरज़ादे ने किया था। उन्होंने इस मस्जिद के निर्माण में मुख्य रूप से लोहे, ईंट और चूने का प्रयोग किया है और उसका एसा निर्माण किया है जो कई शताब्दियों तक चलेगी। हाज हुसैन लुरज़ादे ने मस्जिद के गुंबद का निर्माण इतना मजबूत और ऊंचा किया है जो उस जैसे दूसरे गुंबद हैं उनसे भी कई बराबर अधिक समय तक बाकी रहेगा। लुरज़ादे ने सबसे पहले आदेश दिया कि गुंबद का फ्रेम खड़ा किया जाये, फिर उसे लोहे के तार से अच्छी तरह बांधा गया और वेल्डिंग की गयी। उसके बाद लोहे के इस ढांचे में ईंट लगायी गयी यानी अंदर और बाहर से ईंट व सीमेंट का प्रयोग करके ढांचे को मज़बूत बना दिया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गुंबद कई शताब्दियों तक बना रहेगा।


इस मस्जिद का निर्माण इस्लामी वास्तुकला में किया गया है और इसके उपर एक बड़े गुंबद का भी निर्माण किया गया है। इस गुंबद की गोलाई 30 वर्गमीटर है और मस्जिद की छत से इस गुंबद की ऊंचाई 15 वर्गमीटर है जबकि मस्जिद के तल से इसकी ऊंचाई 35 वर्गमीटर है। इसी प्रकार मस्जिद में ऊंचे- 2 दो मीनार हैं जिनकी ऊंचाई ज़मीन की सतह से 25 वर्गमीटर है और अज़ान देने के दो स्थान भी हैं जिनकी ऊंचाई 5 वर्ग मीटर है। इसी प्रकार अलग से एक टावर का निर्माण किया गया है जिसमें एक बड़ी घड़ी लगायी गयी है और यह टावर मस्जिद के उत्तर में है जिसे चारों ओर से देखा जा सकता है।

मस्जिद में चार बड़े- बड़े हाल हैं। जो हाल गुंबद के नीचे है वह 400 वर्गमीटर है और उसके बगल में जो हाल हैं उनमें से हर एक 900 वर्गमीटर है। इसी प्रकार मस्जिद के उत्तर में जो टावर है उसके नीचे भी लगभग 300 वर्गमीटर का एक हाल है। हर हाल की छत की ऊंचाई ज़मीन से लगभग 10 मीटर है। मस्जिद के बाहर और उसके पश्चिमी छोर पर शौचालय, वुज़ू करने की जगह है और इसी प्रकार वहीं पर मस्जिद के सेवकों के विश्राम स्थल का भी निर्माण किया गया है। इसी प्रकार इस मस्जिद के बगल में एक पुस्तकालय का भी निर्माण किया गया है जिसमें अध्ययन करने के दो बड़े-2 हाल हैं जबकि एक बड़ा हाल केवल पुस्तकों के रखने से विशेष है यानी वहां पर किताबें रखी हुई हैं। यह पुस्तकालय मस्जिद के पश्चिमी छोर पर है और उसका जो प्रवेश द्वार है मस्जिदे आज़म में प्रवेश द्वार के ठीक बगल में है।


आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद हुसैन बुरुजेर्दी की आरंभ में इच्छा यह थी कि कुम नगर में एक स्वतंत्र पुस्तकालय का निर्माण करें परंतु जब मस्जिदे आज़म का निर्माण पूरा हो गया तो पवित्र नगर कुम के गणमान्य लोगों ने मस्जिद के लिए एक पुस्तकालय के निर्माण का प्रस्ताव दिया। आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद हुसैन बुरुजेर्दी ने 23 बहमन 1338 अर्थात 13 फरवरी 1960 को मस्जिदे आज़म के बगल में एक सार्वजनिक पुस्तकालय के निर्माण का आदेश दिया। उन्होंने मस्जिद के वास्तुकार हुसैन लुरज़ादे से कहा कि वह पुस्तकालय के लिए जगह को नज़र में रखें। इसके बाद हुसैन लुरज़ादे ने मस्जिद के पश्चिम में पुस्तकालय के लिए जगह नज़र में रख ली और उसके बाद पुस्तकालय का भी निर्माण कर दिया। इस पुस्तकालय में हाथ से लिखी हुई 7096 पुस्तकें हैं। इसी प्रकार इस पुस्तकालय में दूसरी कई हज़ार मूल्यवान किताबें हैं। काज़ार शासन काल में जो किताबें पढ़ाई जाती थीं वे भी इस पुस्तकालय में मौजूद हैं। इस समय हस्तलिखित पुस्तकों की दृष्टि से यह पुस्तकालय ईरान के महत्वपूर्ण पुस्तकालयों में से एक है। अलबत्ता पुस्तकालय में अध्ययन के लिए जो दो हाल हैं वे छोटे पड़ते हैं इसलिए अध्ययन करने वालों की संख्या के दृष्टिगत जो किताबें हस्तलिखित हैं उन सबकी सीड़ी बना दी गयी है ताकि इन किताबों के अध्ययन के इच्छुक आसानी से इन किताबों का अध्ययन कर सकें। इस समय इस पुस्तकालय का संचालन पवित्र नगर कुम का धार्मिक शिक्षा केन्द्र करता है। आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद हुसैन बुरुजेर्दी की कब्र मस्जिदे आज़म के पश्चिमी छोर पर है। उनके पोते मोहम्मद जवाद अलवी बुरुजेर्दी का कहना है कि इस जगह पर पहले 60 वर्ग मीटर का एक छोटा मकान था और आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद हुसैन बुरुजेर्दी ने अपने व्यक्तिगत पैसे से उसे खरीद लिया था और जब उनकी ज़िन्दगी में यह तय हो गया कि उन्हें कहां दफ्न किया जायेगा तो उन्होंने बाकी ज़मीन मस्जिद के नाम वक्फ कर दी। आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद हुसैन बुरुजेर्दी ने कहा था कि यह जगह हज़रत मासूमा के पवित्र रौज़े का प्रवेश द्वार है, मुझे यहीं पर दफ्न करना ताकि तार्थ यात्रियों के जूतों की धूल मेरी क़ब्र पर पड़े।