#मस्जिद और इबादत part 36_इस्लाम में मस्जिद की अहमियत ”मस्जिदे इमाम*

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इससे पहले आपको बताया कि इस्लाम में शुरू से ही मस्जिद उपासना शिक्षा व प्रशिक्षण का केन्द्र होने के साथ ही राजनैतिक केन्द्र के रूप में भी अपना विशेष स्थान रखती है।

पैग़म्बरे इस्लाम ने इस्लामी शासन की स्थापना करने के तत्काल बाद समस्त मामलों को व्यवस्थित बनाने के लिए मस्जिद के निर्माण को प्राथमिकता में रखा जो मुसलमानों के एकत्रित होने का केन्द्र हो। पैग़म्बरे इस्लाम ने एकेश्वरवाद की इस इमारत की रक्षा पर बहुत अधिक बल दिया।

मक्के से पलायन के बाद मदीना पहुंचते ही पैग़म्बरे इस्लाम ने मस्जिद के निर्माण का आदेश दिया तथा मस्जिद के निर्माण में ख़ुद भी बड़ी मेहनत से हाथ बंटाते रहे। इस मस्जिद को मस्जिदुन्नबी कहा जाता है। मस्जिदुन्नबी उपासना और स्मरण का केन्द्र होने के साथ ही इस्लामी शासन की आप्रेशनल कमांड, शिकायतों की समीक्षा के लिए न्यायिक केन्द्र, इस्लामी नियमों की शिक्षा की पाठशाला और नास्तिकों के ख़िलाफ़ युद्ध के लिए मुस्लिम सिपाहियों को एकत्रित करने का केन्द्र भी थी। इसी कारण तथा मुसलमानों के बीच इस पवित्र स्थल के विशेष सम्मान की वजह से कहा जा सकता है कि लोगों के भौतिक व आध्यात्मिक विषयों में मस्जिद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी और आज भी है। मुसलमानों का इतिहास भी इसकी पुष्टि करता है। मुसलमानों के प्रमुख ऐतिहासिक मोड़ और घटनाओं का जायज़ा लिया जाए तो बहुत स्पष्ट रूप से इस विचार की पुष्टि हो जाती है। मस्जिदों में बहुत महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं और मस्जिदों से बड़े महत्वपूर्ण आंदोलन निकले। जैसे कि ईरान की इस्लामी क्रान्ति में भी मस्जिदों का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान रहा और मस्जिदों ने इस्लामी आंदोलन को अस्तित्व में लाने और उसे विस्तार देने और विजय दिलाने में मस्जिदों की भूमिका बिल्कुल स्पष्ट है।

इस्लामी क्रान्ति के दौरान मस्जिदें क्रान्ति के मामलों के संचालन का केन्द्र बन गईं। केलीफ़ोर्निया की बर्कले युनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टड़ीज़ की शिक्षक हामिद अलगार के अनुसार मस्जिदें ईरान की इस्लामी क्रान्ति की पूरी व्यवस्था की बुनियाद थीं। इस्लामी क्रान्ति की सफलता इसलिए संभव हुई कि मस्जिद और उसके सभी आयामों को पुनरजीवित कर दिया गया। अब मस्जिद एकांतवास का स्थान नहीं थी जहां समाज के कुछ लोग सभी मामलों से खुद को अलग करके केवल उपासना में लीन रहें, तसबीह पढ़ते रहें, कुरआन सुनते रहें। बल्कि इसके विपरीत मस्जिद संघर्ष को नियंत्रित करने वाली कमान बन गई मस्जिद को वह सारी भूमिकाएं मिल गईं जो पैग़म्बरे इस्लाम का काल में मस्जिदों को प्राप्त थीं।

ईरान में इस्लामी क्रान्ति का दायरा फैला तो मस्जिदों ने इस संदर्भ में बड़ा प्रभावी योगदान दिया। मस्जिदों, इमामबाड़ों तथा धार्मिक स्थलों पर धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों के भाषणों से लोगों में देश के भीतर आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनैतिक ढांचे में फैले भ्रष्टाचार, अन्याय और भेदभाव के प्रति जागरूकता बढ़ी। मस्जिदों ने शाह को देश से भगाने में जितनी भूमिका निभाई उतनी ही भूमिका ईरानी राष्ट्र को उसकी गरिमा और उसकी क्षमताओं से अवगत कराने में भी निभाई। लोगों को अपनी इस्लामी पहचान का पुनरबोध हुआ और लोग इस्लामी व मानवीय मूल्यों की ओर लौटे। इस्लाम की ओर यह गहरा रुझान केवल ईरान तक सीमित नहीं रहा बल्कि अन्य इस्लामी देशों में भी फैलता गया। उदाहरण स्वरूप फ़िलिस्तीन की जनता ने इस्लामी क्रान्ति से प्रेरणा लेते हुए अपने राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक हालात के अनुरूप मैदान में क़दम रखे तथा मस्जिद को अपने संघर्ष के संचालन का केन्द्र बनाया। इस्लामी शिक्षाओं की मदद से उन्हें यह विश्वास हुआ कि अमरीका और इस्राईल जैसे अत्याचारी अजेय नहीं हैं बल्कि उनका मुक़ाबला किया जा सकता है और उन्हें पराजित भी किया जा सकता है।

मस्जिद के परिचय के इस भाग में हम आपको ईरान के इसफ़हान शहर की मस्जिदे इमाम के बारे में बताएंगे जो मस्जिदे शाह, मस्जिदे सुलतानी और जामे अब्बासी के नाम से भी मशहूर है। इसफ़हान की मस्जिदे इमाम सफ़वी काल की महत्वपूर्ण मस्जिदों में से एक है। इससे पहले यह मस्जिद, मस्जिदे शाह, मस्जिदे सुलतानी और जामे अब्बासी के नाम से प्रसिद्ध थी। यह मस्जिद 11वीं शताब्दी की वास्तुकला, कारपेन्टर कला तथा सेरामिक कला का मूल्यवान नमूना है। इस मस्जिद का निर्माण इसफ़हान के मशहूर नक़्शे जहान मैदान के दक्षिणी सिरे पर वर्ष 1019 हिजरी क़मरी बराबर 1611 ईसवी में शाह अब्बास सफ़वी के आदेश पर शुरू हुआ जबकि इसकी सजावट तथा अतिरिक्त भागों के निर्माण का काम उनके उत्तराधिकारियों के काल में पूरा हुआ। मस्जिद के मुख्य द्वार पर स्थापित शिलालेख में 1025 हजरी की तारीख़ लिखी हुई है और इस शिलालेख से पता चलता है कि शाह अब्बास ने इस मस्जिद का निर्माण अपनी निजी संपत्ति से किया तथा इसके निर्माण का सवाब अपने दादा शाह तहमास्ब को देने की प्रार्थना की। इस मस्जिद का निर्माण आम लोगों के लिए किया गया।

मस्जिदे इमाम की ख़ास बात यह है कि यह बहुत सुंदर और मनमोहक होने के साथ ही बड़ी सादगी वाली मस्जिद है। मस्जिद के हर भाग में आराम से जाया जा सकता है कहीं कोई रुकावट नहीं है। मस्जिद के फ़र्श पर कहीं कोई ज़ीना, सीढ़ी या चबूतरा नहीं है। कोई बंद दरवाज़ा नहीं है। कोई भी जगह एसी नहीं है जहां कोई विशेष भाग हो और जो अन्य भागों से अलग हो। मस्जिद का हर भाग समान है कहीं पर कोई विशेष चीज़ नहीं रखी गई है जो उस भाग को अन्य भागों से अलग करे। मस्जिद में नमाज़ के लिए एकत्रित होने वाले लोग किसी भी भाग से सरलता के साथ अन्य भागों को देख सकते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम की सुन्नत के अनुसार इस मस्जिद को पूरी तरह धर्म की सेवा के लिए विशेष कर दिया गया।

मस्जिदे इमाम का प्रेवश द्वार नक़्शे जहांन मैदान में है मगर मस्जिद को क़िबले की दिशा से समन्वित रखने के लिए प्रवेश द्वार को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि आप जब इसके बरामदे से गुज़र कर प्रवेश द्वार पर पहुंचेंगे तो 45 डिग्री तक आपका रुख़ दाहिनी ओर मुड़ चुका होगा लेकिन आपको इसका आभास नहीं होगा। मस्जिदे इमाम का ऊंचा प्रवेश द्वार दोनों ओर बने वैभवशाली मीनारों के साथ इस इमारत को और भी शानदार बना देता है। इस प्रवेश द्वार को रंग बिरंगी टाइलों से इस तरह सजाया गया है कि उस पर फूल पत्तियों और चिड़ियों की आकृतियां उभर आई हैं।

इस मस्जिद में पश्चिमी और पूर्वी भागों में दो शबिस्तान या हाल हैं जो प्रागड़ के दो सिरों पर हैं। पूर्वी हाल अधिक बड़ा लेकिन बहुत सादा और हर प्रकार की सजावट से रिक्त है। दूसरा हाल छोटा है लेकिन उसे सतरंगी टाइलों से सजाया गया है। इस मस्जिद का मेहराब इसफ़हान की मस्जिदों के अति सुंदर मेहराबों में से एक है।

दक्षिण पश्चिमी तथा दक्षिण पूर्वी सिरों पर दो मदरसे हैं। दक्षिण पूर्वी सिरे पर जो मदरसा है उसमें कई कोठरियां बनी हैं जिनमें धार्मिक छात्र रहते हैं इसके मदरसए नासिरी कहते हैं जबकि दक्षिण पश्चिमी सिरे पर बने मदरसे का नाम सुलैमानिया है। दक्षिण पश्चिमी सिरे पर बने मदरसे में एक सादा पत्थर का टुकड़ा है एक स्थान पर रखा है जो चारों मौसमों में इसफ़हान की दोपहर के समय को बताता है। कहते हैं कि शाह अब्बास के काल के विख्यात विद्वान, धर्मगुरु और गणितज्ञ शैख़ बहाई ने बड़ी दक्षता से इस स्थान का निर्धारण करके वहां यह पत्थर लगवाया था। इस पत्थर को शाख़िस कहते हैं। इसका ऊपरी भाग त्रिकोण की शक्ल का है। इसका एक कोण क़िबले की दिशा को, दूसरा कोण दोपहर के समय को बताता है।

मस्जिद के दक्षिणी हाल की ऊंचाई 33 मीटर है और इसके दोनों ओर दो मीनार हैं। हर मीनार की ऊंचाई 48 मीटर है। इन दोनों मीनारों को टाइलों से सजाया गया है और तथा इन पर मुहम्मद और अली नाम बार बार लिखे गए हैं। इसफ़हान की मस्जिदे इमाम में अनेक शिलालेखों पर शाह अब्बास प्रथम के अनेक आदेश लिखे हुए हैं। वैसे तो इस मस्जिद के हर भाग का बहुत अधिक एतिहासिक महत्व है लेकिन इसके कुछ भागों की विशेषताएं अधिक हैं। विशेष रूप से मस्जिद का मिंबर जो सोमाक़ पत्थर से बनाया गया है इसमें कहीं कोई जोड़ नहीं है।

 

इस मस्जिद की एक और विशेष बात बड़े वाले गुंबद में आवाज़ की प्रतिध्वनि है। यह गुंबद लगभग 400 साल पहले इस तरह डिज़ाइन किया गया कि इसके बीच में खड़े होकर बहुत हल्की आवाज़ भी निकाली जाए तो उसकी प्रतिध्वनि बहुत साफ़ सुनाई देती है। अतीत में जब लाउड स्पीकर नहीं हुआ करते थे तो गुंबद की यह विशेषता अज़ान तथा भाषणों में बड़ी मदद करती थी। यह विशेषता वास्तुकारों की दक्षता और ज्ञान को दर्शाती है।

मस्जिद की एक और विशेषता वास्तुकारों की रचनात्मक दक्षता है। इसे इस तरह बनाया गया है कि नक़्शे जहान मैदान में खड़े होकर देखा जाए तो मस्जिद का भीतरी भाग भी दिखाई देता है और उसके हर भाग का आकार पूरी तरह स्पष्ट नज़र आता है।