महिलाओं की क़ाबिलियत उनके तैयार होने के तरीक़े से तय हो सकती है?

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“मैंने बचपन से कभी मेकअप नहीं किया था, इसलिए जब पहली रेड लिपस्टिक ख़रीदी, तो अगले दिन ऑफ़िस लगाकर गई. लड़के तो लड़के, लड़कियों ने भी ऐसे देखा जैसे मैं एलियन हूं. अगले कुछ दिन भी यही चलता रहा तो मैंने लिपस्टिक उठाकर रख दी. क्या फ़ायदा कुछ ऐसा करने का जिस पर लोग रोज़ असहज महसूस करवाएं.”

दिल्ली में बतौर कॉन्टेंट क्यूरेटर काम करने वाली प्रतिभा मिश्रा एक सांस में ये कह जाती हैं.

क्या दफ़्तर में मेकअप करके आने वाली महिलाओं को लोगों के रवैये में कोई फ़र्क़ महसूस होता है?

ये सवाल स्कॉटलैंड में हुई एक रिसर्च के बाद उठा है. इस रिसर्च के मुताबिक़, मेकअप करने वाली औरतें ख़राब मैनेजर होती हैं.

168 लोगों पर की गई इस रिसर्च के दौरान कई महिलाओं के मेकअप और बग़ैर मेकअप वाले चेहरे दिखाकर पूछा गया कि लोगों को कौन सा चेहरा बेहतर मैनेजर का लगता है?

रिसर्च के मुताबिक़, “ज़्यादातर लोगों ने बग़ैर मेकअप वाले चेहरों में ज़्यादा भरोसा दिखाया.”

एबरटे यूनिवर्सिटी में हुई इस रिसर्च में शामिल लोगों ने बताया कि ‘उन्हें लगता है कि मेकअप लगाने वाली औरतें काम को लेकर कम गंभीर होती हैं और इसलिए वे अच्छी टीम लीडर नहीं बन सकतीं.’

नोएडा में बतौर पत्रकार काम करने वाली एक महिला ने बताया कि वो ऐसे जजमेंट दिन-रात फ़ेस करती हैं, “मैं मीडिया इंडस्ट्री में हूं और यहां अगर आप एक ख़ास तरीक़े से तैयार होते हैं तो लोगों का पहला इंप्रेशन होता है कि ये गंभीर ख़बरें नहीं कर पाएगी. एंटरटेनमेंट की स्टोरीज़ पर भेज दो. एक तो वैसे ही लोगों को लगता है कि महिलाओं को सब कुछ आसानी से या शॉर्टकट से मिल जाता है, उस पर मेकअप या ख़ास तरह के कपड़े पहनने वाली महिलाओं को तो आसानी से उपलब्ध भी मान लिया जाता है.”

नाम न छापने की शर्त पर वे आगे कहती हैं, “मेरे एक सहयोगी ने एक बार मुझे सुनाते हुए कहा कि महंगे कपड़े और मेकअप पहनने वाली महिलाएं हाई मेन्टेनेंस होती हैं और घर नहीं बसा सकतीं. ऐसा सिर्फ़ आदमी ही नहीं करते, औरतें भी आपको छोटा महसूस कराती हैं. मेरी एक महिला बॉस को हमेशा इस बात पर हैरानी होती थी कि मुझे ख़ुद का ख़्याल रखने का टाइम कैसे मिल जाता है क्योंकि वो ख़ुद कभी ठीक से तैयार नहीं होती थीं.”

स्कॉटलैंड में आए ये नतीजे 2016 में हुई ऐसी ही एक और रिसर्च से बिल्कुल उलट हैं. उसमें बताया गया था कि मेकअप करने वाली औरतों को दफ़्तर में ज़्यादा इज़्ज़त दी जाती है.

ऐसे में हमने अलग-अलग उम्र के महिला और पुरुषों से पूछा कि क्या उन्हें भी लगता है कि महिलाओं की क़ाबिलियत उनके तैयार होने के तरीक़े से तय हो सकती है?

वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका वर्तिका नंदा कहती हैं, “इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपने मेकअप किया है या नहीं. आपकी क़ाबिलियत और अंदरूनी सुन्दरता ही आपको आगे बढ़ाते हैं.”

लेकिन दिल्ली के इक्विटास बैंक में काम करने वाले अमनदीप सिंह की राय इससे अलग है. उन्हें लगता है कि मेकअप करने वाली महिलाएं काम को लेकर गंभीर नहीं होतीं.

उन्होंने कहा, “लीपापोती करने वाली लड़की का ध्यान तो अपनी बिंदी, लाली में ही लगा रहता है, काम कब करेंगी?”

वहीं, गुड़गांव जेनपेक्ट में सीनियर एनालिस्ट जुगल किशोर को लगता है कि “किसी महिला के मेकअप करके ऑफ़िस आने में कोई बुराई नहीं क्योंकि इसका उसके काम से कोई लेना-देना नहीं है.”

यूटीवी में एवीपी रहीं अनुराधा गाखड़ की राय भी क़मोबेश ऐसी ही है, “मेकअप करना न करना किसी का निजी फ़ैसला है, लेकिन एविएशन और सर्विस इंडस्ट्री जैसी कुछ नौकरियों में तो ये पेशे की ज़रूरत भी होती है. आदमी भी तो ख़ुद को ग्रूम करते हैं. उनकी इसके लिए तारीफ़ की जाती है तो महिलाओं पर सवाल क्यों?”

फ़िलहाल मुंबई में टीवी शोज़ के लिए स्क्रिप्ट लिखने वालीं अनुराधा आगे कहती हैं, “ख़ुद कंपनियां भी आपको प्रेज़ेंटेबल दिखने के लिए कहती हैं. मैं किसी पर जजमेंट पास नहीं कर रही लेकिन अगर मैं किसी ऐसे इंसान से मिलूं जो मीटिंग में ऐसे आ जाए जैसे अभी सोकर उठा/उठी है तो मुझे उसे अपना काम सौंपते हुए हिचक होगी. लगेगा कि ये अपना ख़्याल नहीं रख पा रहा/रही तो मेरे काम का क्या रखेगा/रखेगी?”

हालांकि अनुराधा यह भी साफ़ कर देती हैं कि प्रेज़ेंटेबल दिखने का मेकअप से कोई ताल्लुक़ नहीं है. वो इसका महज़ एक हिस्सा भर है.

जेलों को लेकर काम कर चुकी वर्तिका नंदा कहती हैं, “ये ग़लतफ़हमी है कि कोई महिला ध्यान आकर्षित करने के लिए सजती है. जेल में किसी भी तरह के मेकअप या श्रृंगार की इजाज़त नहीं होती. ऐसा सामान वहां ले जाया भी नहीं जा सकता. लेकिन इसके बाद भी कुछ महिलाएं चूड़ी या बिंदी पहन लेती हैं. आपको लगता है कि जेल में बैठी वो महिला किसी और के लिए ऐसा करती है? ख़ुद को सजाना-संवारना ख़ुश रहने का एक तरीक़ा होता है.”

बेंगलुरु की एक फ़िनटैक कंपनी में बतौर कॉन्टेंट स्पेशलिस्ट काम करने वाले एआर हेमंत का कहना है कि किसी मैनेजर के अच्छे या बुरे होने का उनके महिला या पुरुष होने से या मेकअप करने, न करने से कोई वास्ता नहीं है. “मैनेजर को अच्छा या बुरा उनका व्यक्तित्व बनाता है. दुनिया में चार तरह के मैनेजर होते हैं जिन्हें DOPE यानी डव, आउल, पीकॉक और ईगल कहा जाता है. इनमें से पीकॉक सबसे ज़्यादा इमेज कॉन्शस होते हैं. कुछ मामलों में पीकॉक मैनेजर बहुत आत्ममुग्ध, ज़बरदस्ती झगड़े मोल लेने वाले, दूसरों को नीचा दिखाने वाले और काम पर कम ध्यान देने वाले हो सकते हैं. ऐसे टीम लीडर के साथ काम करना मुश्किल होता है. इसमें महिला पुरुष दोनों शामिल हैं.

प्रतिभा मिश्रा की सलाह है कि बुराई ढूंढने की बजाय अगर लोग चाहें तो ख़ुद का ख़्याल रखने वाले लोगों से कुछ सीख सकते हैं, “मुझे तो बड़ा अच्छा लगता है जब मैं किसी को बहुत अच्छे से तैयार होकर दफ़्तर आते देखती हूं. लगता है कि दफ़्तर, घर, कम्यूट के बीच भी उसने अपने लिए इतना समय निकाला, इसके लिए उसकी तारीफ़ करनी चाहिए. मैं ख़ुद जाकर उन्हें सबसे पहले कॉम्पलिमेंट देती हूं जिससे वे भी कंफ़र्टेबल महसूस करें.”

ऐसे में जब बाक़ी लोग इतनी समझदारी नहीं दिखाते तो महिलाएं क्या करती हैं?

प्रतिभा का जवाब साफ़ है, ”अगर मेरे तैयार होने के तरीक़े से किसी का ध्यान बंटता है तो ये उसकी समस्या है.”

वहीं नोएडा वाली पत्रकार कहती हैं, “कभी-कभी लगता है रोज़ सवालिया निगाहें झेलने से बेहतर है कि ख़ुद में ही थोड़ा बदलाव कर लूं, फिर लगता है कि हर चीज़ में एडजस्ट कर रही हूं, इसमें क्यों करूं?”

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प्रज्ञा मानव
बीबीसी संवाददाता