महिलाओं को पसंद है उनका पीछा किया जाना…!!!

Posted by

भारतीय पुरुषों का मानना है कि जब भी वह किसी महिला का पीछा करते हैं तो वह खुश हो जाती हैं। वह मानते हैं कि इसी वजह से वह जवाब में कभी ‘ना’ नहीं सुनना चाहते। जी हां, कामकाजी महिलाओं से उत्पीड़न के मामले जानने के बाद ऐसे ही कुछ निष्कर्ष सामने आए हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न को हाल ही में चला #मीटू कैंपेन दुनिया के सामने लाया।

इस कैंपेन में महिलाओं ने रेडियो, फेसबुक, ट्विटर आदि माध्यमों से अपनी कहानी दुनिया के सामने रखी। उन्होंने कार्यस्थलों पर होने वाले उत्पीड़न के बारे में बताया। अधिकतर महिलाओं ने ऐसे व्यवहार के बाद कहा कि जब भी उनके साथ ऐसा कुछ होता है तो उन्हें शिकायत करने से पहले सौ बार अपनी नौकरी के बारे में सोचना पड़ता है और अगर नौकरी ही खतरे में पड़ जाए तो शिकायत ना करने का फैसला ही आखिरी रास्ता बचता है।

महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर बढ़ते उत्पीड़न के बाद साल 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम लागू किया गया। जिसके बाद सभी संगठनों को अपने यहां आंतरिक सहायक समिति का गठन करना पड़ा। ताकि जो भी महिला उत्पीड़न का सामना करती है, वह समिति को इस बात की शिकायत कर सके।

इसमें आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने का प्रावधान रखा गया है। लेकिन क्या आपको लगता है कि ये कानून वाकई में महिलाओं की मदद कर रहा है? क्या वाकई में विभिन्न संगठन इसके द्वारा महिलाओं को न्याय दिला पाते हैं? एक मीडिया संगठन ने ऐसे ही कुछ सवालों का जवाब जानने के लिए शालिनी खन्ना और ज्योती सरवाल से बातचीत की। शालिनी और ज्योति कई आंतरिक सहायत समितियों की सदस्य रह चुकी हैं। इस दौरान उन्होंने इससे जुड़ी कई अनसुनी बातें बताईं।

क्या कार्यस्थलों पर महिलाओं का उत्पीड़न एक आम बात?
=============
यह सवाल शालिनी खन्ना से पूछा गया। जो इस वक्त सेंटर फॉर ब्लाइंड वुमन एंड डिसेबिलिटी स्टडीज की डायरेक्टर हैं। उनका कहना है कि आज के समय में कई महिलाएं अपने साथ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ बोलने लगी हैं। वह पहले ही तरह अब चुप नहीं रहतीं। वहीं अगर पुरुषों की बात करें तो वह आज भी अपनी पुरानी पितृसत्तात्मक मान्यताओं को साथ लेकर चल रहे हैं। साल 2011 से अभी तक करीब 500 से ज्यादा उत्पीड़न के मामले निपटा चुकी शालिनी का कहना है कि उन्होंने इसके लिए बहुत सी वर्कशॉप की हैं।

जिनसे पता चला कि पुरुष महिलाओं को घूरना गलत नहीं मानते हैं। भारतीय पुरुषों का तो यह भी मानना है कि यदि किसी महिला को देखकर उनका ध्यान भटकता है तो उन महिलाओं को अपने कपड़े पहनने का तरीका बदलना चाहिए। पुरुषों को लगता है कि यदि उनके पीछा करने से वह खुश हो जाती हैं और यदि वह ना कहती हैं तो उनके लिए वह ‘ना’ कभी ना नहीं होती। पुरुष महसूस करते हैं कि उन्हें महिलाओं का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए बहुत कोशिश करनी पड़ती है, वह उनका पीछा करते हैं, एक ही बात को उनके सामने कई बार दोहराते हैं। इसलिए वह जवाब में कभी ‘ना’ सुनना ही नहीं चाहते।

इस सवाल के जवाब में अंबिका फाउंडेशन की संस्थापक ज्योति सरवाल का कहना है कि इस मामले में सबसे बड़ी बाधा है महिलाओं की खुद की सोच। अधिकतर महिलाएं मानती हैं कि यदि वह शिकायत करेंगी तो इसका प्रभाव उनके करियर पर पड़ेगा। साथ ही उन्हें इस बात का भी डर होता है कि ऐसा करने

से लोग उनके चरित्र पर लांछन लगाएंगे।
=============
उन्होंने कहा कि कई सारी आंतरिक समितियों के साथ काम करने के बाद उनका अनुभव है कि कई संस्थाएं ऐसी समितियों का गठन तो करना चाहती हैं लोकिन जब उन्हें पता चलता है कि महिलाओं के साथ उत्पीड़न होना एक आम समस्या है तो वह तब तक इंतजार करती हैं जब तक महिला उसकी शिकायत स्वयं नहीं करवातीं। उत्पीड़न की जानकारी यदि पीड़िता की तरफ से कोई और दे तो वह इसे झूठ मानकर ही चलती हैं।

कौन होते हैं कार्यस्थल पर मुख्य अपराधी?
=============
इसका जवाब देते हुए शालिनी कहती हैं कि अधिकतर मामलों में अपराधी या तो वरिष्ठ सहकर्मी होता है या फिर टीम का लीडर। यदि महिला कर्मी नई होती है तो उसके साथ बराबरी के पद पर काम करने वाले सहकर्मी भी फायदा उठाने की पूरी कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि एक मामला तो ऐसा भी था जब एक कंपनी में महिला सुपरवाइजर के साथ उसके जूनियर ने छेड़छाड़ की। वह काफी वक्त से कंपनी में काम कर रहा था और उसे पूरा भरोसा था कि संगठन उस पर विश्वास करता है। उन्होंने कहा कि उनके पास कई मामले तो ऐसे भी आए हैं जिनमें जिससे दोस्ती की जाती है वह ही ऐसी हरकतें करने लगता है। जिस कारण उसके साथ काम कर पाना काफी मुश्किल हो जाता है।

सबसे आम शिकायत क्या होती है?
=============
ज्योति बताती हैं कि सबसे आम शिकायत होती है बातचीत करते वक्त पुरुष सहकर्मी का उन्हें छूना। उन्होंने एक महिला का केस बताया जिसने शिकायत की थी कि जब वह पहली बार कंपनी के सीनियर टीम लीडर से मिली तो वह उसे देखकर अनुचित टिप्पणी करने लगा। इसके बाद उसने उस आदमी को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। इस शिकायत का खामियाजा उस महिला को अपनी नौकरी खोकर भुगतना पड़ा। जब कंपनी में काम करने वाले कुछ लोगों को निकाला जा रहा था तो उसे भी कंपनी छोड़कर जाने को कहा गया। जब मामले की जांच की गई तो पता चला कि उसी आदमी की वजह से उसे बर्खास्त किया गया।

समिति के सदस्यों की मानसिकता भी है सबसे बड़ी बाधा
=============
शालिनी का कहना है कि आज के समय में अधिकतर कंपनियां आंतरिक शिकायत समिति के लिए गंभीर हैं। साथ ही वह अपराधियों को ऐसा करने पर चेतावनी भी देती हैं। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी इस राह में समिति के सदस्यों की मानसिकता बहुत बड़ी बाधा बनती है। समिति के पुरुष सदस्यों का मानना है कि यह अधिनियम पक्षपातपूर्ण है। उनका मानना है कि इसका उपयोग अधिकतर असंतुष्ट कर्मचारी करते हैं ताकि वह बॉस और और अन्य सहकर्मियों की नजर में आ सकें। उन्होंने कहा कि महिलाओं को शिकायत करने के लिए बहुत प्रयास करने पड़ते हैं। उन्हें अपने करियर और सम्मान को भी दांव पर लगाना पड़ता है।