#माँ_बाप_का_एहतराम_और_उनका_अदब

Posted by

Sikander Kaymkhani‎
============
हज़रत इब्न-ए-उमर रज़िअल्लाह अन्हु से रिवायत है कि, मेरी निकाह में एक औरत थी जिससे मैं मुहब्बत करता था, लेकिन मेरे वालिद उमर रज़िअल्लाह अन्हु उसे नापसंद करते थे, चुनांचे उन्होनें मुझसे कहा तू इसे तलाक़ दे दे, मैंने इंकार कर दिया, फिर हज़रत उमर अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास गए, और उनसे इस बात का ज़िक्र किया तो, अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

“उसे तलाक़ दे दे”

अगर वालिदैन का हुक्म तलाक़ देनी व एखलाकी बुनियादों पर हो तो उसकी इताअत ज़रूरी है जैसा कि इस हदीस में है, अगर इसके असबाब कुछ और हो तो फिर वालीदैन को अदब और एहतराम से समझाया जाए कि वो भी राज़ी हो जाएं, और खामखा औरत पर भी ज़ुल्म ना हो, औलाद अगर नाफरमानी करे तो वालीदैन हाकिम-ए-वक़्त से शिकायत कर सकते हैं, और हाकिम-ए-वक़्त की भी ज़िम्मेदारी है, के अगर वालिदैन की शिकायत, हक़ीक़त पर मबनी हो तो, हुक्मन उसपर अमल करवाये, इस रिवायत के बाज़ तर्क में है, कि सय्यदना, इब्न-ए-उमर रज़िअल्लाह अन्हु ने अल्लाह के रसूल से शिकायत की, इससे ये मालूम होता है कि अगर वालिदैन ज़ुल्म करें तो उनकी शिकायत, भी हाकिम से की जा सकती है और ये, अदब के मनाफ़ि या नाफरमानी के ज़ुमरे में नही आएगा।

हज़रत अबु दरदा रज़िअल्लाह अन्हु से रिवायत है कि उनके पास एक आदमी आया और उनसे अर्ज किया कि मेरी एक बीवी है, और मेरी मां मुझे उसको तलाक देने का हुक्म देती है, मैं क्या करूं? हज़रत अबू दरदा रज़िअल्लाह अन्हु ने फरमाया मैंने रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना है कि वालिद जन्नत के दरवाज़ों में से बेहतरीन दरवाज़ा हैं, चुनांचे अगर तू चाहे तो उस दरवाज़े को ज़ाया कर दे, या उस की हिफाज़त कर।