मिस्र के नील डेल्टा पर मिला एक प्राचीन गांव, नील किनारे जीवन!

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मिस्र के पुरातत्वविदों ने नील डेल्टा पर बसे दुनिया के सबसे पुरानों गांवों में से एक का पता लगाया है. यह खोज कहती है कि गीजा के पिरामिड बनने से पहले भी इंसान इस क्षेत्र में तकरीबन 5000 ईसा पूर्व से रह रहा था.

मिस्र के पुरातन मंत्रालय के मुताबिक नील डेल्टा पर काम कर रहे पुरातत्वविदों को एक प्राचीन गांव के अवशेष मिले हैं. ऐसा गांव जहां प्राचीन युग में राजाओं का शासन हुआ करता होगा. यह क्षेत्र राजधानी काहिरा से करीब 140 किमी दूरी पर स्थित तेल अल-समारा इलाके में है. पुरातात्विक जांच टीम का नेतृत्व कर रहे फ्रेडरिक गियो के मुताबिक टीम को पशुओं की हड्डियां, वनस्पति अवशेष, मिट्टी के बर्तन और भोजन रखने वाले कई सिलोस मिले हैं. सिलोस एक प्रकार के सिलिंडरिकस टावर होते हैं जिसे सामान रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इन अवशेषों को देखकर यह अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि गीजा के पिरामिड बनने से पहले भी यहां एक स्थायी समाज यहां बसता रहा होगा.

फरवरी 2018 में जर्मनी और मिस्र के विशेषज्ञों ने देश के दक्षिणी शहर मिन्या में एक प्राचीन कब्रगाह का पता लगाया था. इसमें करीब 1000 से अधिक प्रतिमाएं और आठ मकबरे मिले थे. इसके साथ ही 4400 साल मकबरे पिरामिड के पास मिले थे. राजधानी काहिरा में पिछले साल राजा सेमटिक की भीमकाय मूर्ति भी मिली थी जो 26वें राजवंश से जुड़ी मानी जा रही थी.

साल 2011 की अरब क्रांति के बाद मिस्र में आने वाले पर्यटकों की संख्या में कमी आई है. सरकार को उम्मीद है कि इस तरह की प्राचीन खोजों से देश के पर्यटन उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा.

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नील नदी के किनारे जीवन


रशीद शहर के निवासी
ये फोटोग्राफर राजनीतिक पहलुओं पर नहीं बल्कि आम इंसानों की रोजमर्रा की जिंदगी की तस्वीरें खींचना चाहते थे. महमूद याकूत ने रशीद शहर के निवासियों को अपना विषय बनाया. यहां रहने वालों के रोजगार के लिए नील डेल्टा की उपजाऊ जमीन वरदान है.

नील पर मछली के फार्म
मिस्र के शहर रशीद से यह नदी भूमध्य सागर में जाकर गिरती है. इस इलाके में ज्यादातर लोगों का रोजगार मछली पकड़ना है. लकड़ी से बनाए गए फिश फार्म पानी पर तैरते दिखाई देते हैं, जिन पर छोटी झोपड़ियां बनी हुई हैं. झोपड़ी में एक बिस्तर और एक छोटा सा किचन है, यहां से परिवार का कोई एक व्यक्ति फार्म की निगरानी करता है.


शहर की जिंदगी
रशीद में अतीत और वर्तमान आपस में आकर मिलते हैं. प्राचीन समय से ही यह बंदरगाही इलाका व्यापार के लिए अहम माना जाता है. लोगों का जीवन बेहद सादा है. मिस्र का यह शहर अपने निवासियों के बड़े दिल और अच्छे व्यवहार के लिए मशहूर है.


महिलाओं की भूमिका
इस शहर की महिलाएं ज्यादातर घर पर रहती हैं. वे घरेलू काम करती हैं और बच्चों को पालती हैं. तंदूरों में रोटियां भी बनाती हैं और बाजार में सब्जियां और घर पर तैयार पनीर बेचती हैं. गरीबी के बावजूद यहां के निवासी आपस में मिल बांट कर रहना पसंद करते हैं.


रचनात्मकता की लैबोरेटरी
इन फोटोग्राफरों को 2013 में गर्मियों में गोएथे इंस्टीट्यूट में वर्कशॉप के लिए आने का न्यौता दिया गया था. उनकी प्रदर्शनी पहली बार जर्मनी में दिखाई जा रही है. सूडान के अलसादिक मुहम्मद को बर्तन बनाने की कला से लगाव है. नील के साथ के इलाकों में बर्तन बनाने की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है.

लाइफलाइन
नील नदी के आसपास के इलाकों में बर्तन बनाने की प्राचीन परंपरा है. असवान बांध बनने तक यह हाल था कि नदी में आने वाली बाढ़ अपने साथ उर्वर मिट्टी लाती थी. खासकर आजकल के हालात में पानी बहुत कीमती चीज है. लोग नील पर पानी के अलावा रोजगार और यातायात के लिए निर्भर हैं.


प्राचीन परंपराएं
मिट्टी से बने बर्तन काम के भी होते हैं और खूबसूरत भी. सदियों पुरानी इस कला ने समय के साथ अपने रूप बदले. आजकल नूबया के इलाकों में बनने वाले बर्तन दुनिया भर की प्रदर्शनियों में दिखाए जाते हैं. और सूडान के इस इलाके के सदियों पुराने उस इतिहास को दुनिया के सामने लाते हैं जिसपर नील की छाप है.


बाइबिल के छात्र
इथियोपिया की झलक ब्रूक जेराई सेंगिस्तू की तस्वीरों में. इथियोपिया में जन्म लेने वाली नील नदी के साथ साथ यहां बसा प्राचीन ईसाई समुदाय मिलता है. आध्यात्म की खोज में ये दुनिया से अलग थलग रहते हैं. यहां रहने वाले छात्र खुद अकेलेपन में जीना चुनते हैं और इनकी शिक्षा दीक्षा 14 साल में पूरी होती है.


विनम्रता सिखाती नदी
समय समय पर ये छात्र अपने अकेलेपन से निकलकर नील नदी का रुख करते हैं. वे गांव में जाकर खाना मांगते हैं. उनके मुताबिक भिक्षा से विनम्रता आती है और विनम्रता से आध्यात्म की प्राप्ति होती है.


निरंतरता का प्रतीक
इथियोपिया के इलाके में बहने वाला नील नदी का यह हिस्सा यहां की एकता और निरंतरता का प्रतीक है. गोएथे इंस्टीट्यूट की वर्कशॉप में हिस्सा लेने वाले कई लोग अपने अपने देश गए, जिनमें से कई इन दिनों युद्ध और हिंसा की चपेट में हैं. उनकी शानदार तस्वीरें देसाऊ में केंद्रीय पर्यावरण एजेंसी में 27 मई तक देखी जा सकती हैं.

रिपोर्ट: फ्रांजिस्का क्लूस