मेरे परिवार का काला साया

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वेदिका सिंह

मेरे परिवार का काला साया
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आज मम्मी और कुछ लोगों ने मुझे बेशर्म कहा तो दुखी हुयी मैं।
१६ सितंबर २००८, पंद्रह साल की दसवीं में पढ़ने वाली वेदिका सुल्तानपुर के जिला अस्पताल में एक स्ट्रैचर पर पड़ी तड़प रही थी।
कोई ख़ास डोज़ नहीं लिया था ज़हर का,एसिड पी ली थी।आत्महत्या करने की वजह थी कुछ लड़कों का अभद्र व्यवहार और आपत्तिजनक टिप्पणी!(यहाँ भी मुझे बचाने वाले एक आशिक़ कूद पड़े थे,उनकी दखलंदाज़ी की वजह से चिढ़कर वो लड़के मुझे और परेशान करने लगे थे)
जैसे तैसे एंटासिड पीकर घर वापस आयी,पर इतने में देखा कि दुनिया का नज़रिया बदल गया।कुछ ने कहा पेट में बच्चा था,कुछ ने कहा कोई प्यार का चक्कर था।मम्मी परेशान होकर मुझे छोटे मामा जी के पास इलाहाबाद(ओह्ह!सॉरी प्रयागराज) भेज दी।
अब सुनिए कंस मामा की दास्तान! इन्होंने मुझे बैठाकर सामने दो टूक कह दिया-“तुम्हारे परिवार का काला साया मैं अपने परिवार पर नहीं पड़ने देना चाहता”
मैं खरगोशन जैसी टकटकी लगाए देखती रही।ये वही मामा थे,जिन्होंने मुझे बचपन में गोद में खिलाया था।
मैं सोच रही थी कि परिवार मेरा तो भाई और मम्मी ही हैं फ़िर ये “काला साया” ज़रूर पापा ही होंगे।
दूसरे ही दिन नाना के साथ मुझे भगा दिया।मेरी डायरी में लिख भी दिया कि “तुम सुल्तानपुर गयी तो सुधर नहीं पाओगी,ये लिखावट इसलिए की गई है ताकि सच सनद रहे”
नीचे मामी और नानी से हस्ताक्षर करवाया कंस मामा ने।
मैं मन में सोचती रही मैं बिगड़ी ही कब थी जो सुधरूँगी।बस नाना को दुखी देखकर अच्छा नहीं लगा।पर नाना भी थे मेरे DNA वाले,बोले-“मुझे भरोसा है तुम कभी कोई ग़लत काम नहीं कर सकती,दुनिया बोले बोलने दो,मैं और नानी साथ हैं ना”
मैं वापस आयी अपने शहर।गालियाँ सुनी,लड़कों के भद्दे मज़ाक सुने,आंटियों के ताने सुने।
२००९ में हाई स्कूल की परीक्षा में ९०.४% अंकों के साथ सचिन तेंदुलकर स्टाइल में कंस और दुनिया को बल्ले की जगह कलम से जवाब दिया।
~वेदिका