यतीमो का माल खाने वाला हज़ार यतीमख़ाने भी बनवा दे तो सूकून न पायेगा..!!

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Haji Suhail Ahmed
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कानपुर शहर के बीच स्थित मुस्लिम यतीमखाना का बजट एक करोड़ है। इससे 67 बच्चों की देखभाल होती है। यतीमखाना के पास करोड़ों की संपत्ति है। इसका संचालन करने वाली 90 सदस्यों की अंजुमन (पूर्ण कार्यकारिणी) में शहर के मशहूर डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, पॉलीटीशियन और समाजसेवी हैं। इसके बावजूद यहां रहने वाले बच्चों की परवरिश वैसी नहीं हो पा रही है जैसी समाज उम्मीद करता है।
वैसे एक और बात भी क़ाबिले ग़ौर है कि इन महान लोगों का कोई भी योगदान माली तौर से इन यतीम बच्चो के साथ नही है। बल्कि इनकी खिदमात में सिर्फ़ दिखावा है ।अल्लाह और उस का रसूल राज़ी हो,न हो ।कोई फ़र्क़ नही पड़ता लोग जान ले,प्रशासन जान ले की यह समाजसेवी लोग है समाज का काम कर रहे है।यह कथित समाजसेवी लोग अगर इख्लास के साथ काम कर रहे होते तो होता यूँ कि हर मैम्बर (सदस्य) एक बच्चे की कफालत(पालन पोषण) की ज़िम्मेदारी ख़ुद सम्भाल लेता।फिर भी बच्चे कम पड़ जाते सदस्यों की संख्या के आगे। क्या इस शहर में सिर्फ़ 67 बच्चे ही यतीम और ज़रूरतमंद है । यतीमो के माल से यह इज़्ज़तदार लोग ख़ुद पल रहे है।
कमेटी में शामिल होने की ऐसी होड़ कि जो कमेटी से बाहर है वो दूसरे को चोर बताता है और जब वो साथ में शामिल हो जाता है तो चोर चोर मौसेरे भाई हो जाते है।

सौ वर्षों से अधिक का इतिहास रखने वाले इस यतीमखाना के पास आय के तमाम साधन हैं। इसके बावजूद यतीमखाना अब तक ऐसा कोई कारनामा अंजाम नहीं दे सका है जो मिसाल बनता। यतीमखाना का औपचारिक बजट बताता है कि बच्चों पर सीमित खर्च हो रहा है लेकिन अन्य मदों में बेतहाशा खर्च किया जा रहा है।

(बजट में बच्चों पर खर्च)
अगर बजट की मानें तो बच्चों के खाने पर सालभर में 06 लाख, कपड़ों पर 2.5 लाख, मेडिकल में 03 लाख, साबुन आदि पर 1.60 लाख, खेल पर 20 हजार, टेलीफोन पर 10 हजार और वाहन पर एक लाख खर्च आता है। यह तब है जब यतीमखाना में अक्सर लोग तैयार भोजन उपलब्ध कराते हैं। कपड़े आदि देते हैं।

(शिक्षा पर खर्च 10 लाख)
शायद ही कोई इस बात पर विश्वास करे कि यतीमखाना शिक्षा पर 10 लाख खर्च करता होगा। पर आंकड़ों की मानें तो यह सच्चाई है। ज्यादातर स्कूल जहां यहां के बच्चे पढ़ते हैं वह सीमित शुल्क लेते हैं। कैंपस में भी एक स्कूल है जहां बाहरी बच्चे भी पढ़ते हैं।

(झगड़ों पर खर्च होते 80 हजार)
यतीमखाना में वक्फ व अन्य मामलों के झगड़े इतने हैं कि उस पर 80 हजार रुपए वार्षिक खर्च किया जाता है। यह खर्च इसलिए भी बढ़ जाता है जब अंजुमन के अध्यक्ष और महामंत्री आपस में झगड़ने लगते हैं। इस कारण अदालत में पैरवी कमजोर हो जाती है। जबकि इन्हीं कमेटी के लोगों की बदकारियो व साँठ गाँठ की वजह से यतीमख़ाने में वक़्फ़ तमाम जायदाद का भारी भरकम गोलमाल कर दिया गया है ।

(आमदनी के रास्ते बेहिसाब)
जकात से 12 लाख, फितरा से 03 लाख, इमदाद से 06 लाख, कुर्बानी की खालों से 02 लाख, किराए से 22 लाख, अन्य मदद से 20 लाख, गुलशन हॉल से 9.80 लाख और बैंक इंट्रेस्ट से 06 लाख की आमदनी होती है।

“सीखो जा कर उनसे जो इंसानियत के लिये ईमानदारी से खिदमते-ख़ल्क कर रहे है ।तुम जैसे लुटेरों की तरह संगठित लूट नही कर रहे है। तुम सब अपने मुँह से मियाँ मिठ्ठू बने फिरते रहो।
अल्लामा इक़बाल ने सही कहा था…
तुम्हारी दास्ताँ भी न होगी दास्तानों में…!!