ये डिजिटल इंडिया नहीं, बुज़दिल इंडिया है…रवीश कुमार

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न्यूज रूम महिलाओं की स्थित के बारे में एक परिचर्चा के दौरान एनडीटीवी के सीनियर टीवी एंकर रवीश कुमार ने कहा कि जहां से मैं आता हूं यानी एनडीटीवी, और जहां से मैं एनडीटीवी में आया था, इससे पहले किसी भी लड़की को मैंने अपनी जिंदगी में किचन के बाहर मैनेजिरियल रोल में या लीडरशिप की भूमिका निभाते नहीं देखा था। लेकिन एनडीटीवी में आने के बाद मुझे लगता था कि ये कोई और दुनिया है, जो इस दुनिया का हिस्सा नहीं है क्योंकि उस वक्त जो मेरी उम्र की लड़कियां थीं वो सब लीडिंग पोजिशन में थीं, तो मेरे लिए ये हैरान करने वाली बात थी। उनमें से आज भी बहुत सारे लोग लीडिरशिप की पोजिशन पर हैं और बहुत लोगों ने तो अपना पेशा भी बदल लिया है।

उन्होंने आगे कहा कि जब मैं बाहर निकलकर और जगहों पर लोगों से मिलता-जुलता था, जैसा कि अब कम हो गया है, तो पता चलता था कि लड़कियों के लिए इस फील्ड में वो दुनिया नहीं है, जिसको देखकर मुझे एनडीटीवी में अच्छा लगता था। फ्लोर को देखने से लगता है कि एनडीटीवी में लड़कियां ज्यादा हैं और तब और ज्यादा थीं। लेकिन मेरी दोस्त जो फील्ड में रहती थीं उनसे मैंने दोस्ती इसलिए बढ़ाकर रखी थी, क्योंकि मैं उन लोगों से बहुत कुछ सीखना चाहता था, और वह भी इसलिए क्योंकि उन्हें बहुत नॉलेज थीं। मेरे लिए तब यही दोस्ती का पैमाना था, और यह सच बात है कि वे बहुत ही ज्यादा काबिल थीं, इसलिए मुझे लगता था कि मैं इनके साथ ही रहकर बहुत कुछ सीख सकता हूं।

लेकिन जब उनसे अलग होकर मैं उन साथियों से मिलता जुलता था, जो लोग फील्ड में रहते थें तब साथ वाली जो दूसरे चैनलों की लड़किया हैं उनका सेक्सुअल डिपिक्शन शुरू होता था, जो मुझे बड़ा अजीब सा लगता था।


उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि इस हालात में बहुत बदलाव आया है। जो लोग भी सक्सेस हैं, उन्हें सक्सेस मैं नहीं कहूंगा क्योंकि आज के टीवी के एंकर में मेल हो या फीमेल उनके लिए सक्सेस कहने में थोड़ा सा घबराना चाहिए, क्योंकि आजकल इंडियन मीडिया में जेंडर न्यूटरल पपेट्री शुरू हो गई है। मैंने यहां पपेट्री इसलिए कहा क्योंकि ये गोदी मीडिया का दौर है और आप पपेट नहीं है तो आपको निकाल दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अब डिजिटल इंडिया को ‘बुजदिल इंडिया’ लिख देना चाहिए, क्योंकि हम डरपोकों का एक भारत बनाते हैं। आओ सारे डरपोक एक भारत बनाते हैं और जो बोलेगा उसे उस भारत से बाहर कर देते हैं। उन्होंने कहा कि ये बात सही कि इसमें आप न भी देखें तो भी आपको दिख जाएगा, और देखना चाहें तो ज्यादा दिख जाएगा और रातों नींद उड़ जाएगी। तो इस पपेट्री को सक्सेस कहना जर्नलिस्टिक स्किल से सही नहीं है। जहां तक मैं जानता हूं कि अब इस स्किल का योगदान खासकर टीवी में है, कि अब आप कितना उनकी लाइन की तरफ हैं, एक तरह से उनके एजेंडे पर काम कर रहे हैं और यही आपके बने रहने का पैमाना है और इसे अनदेखा करेंगे तो आपको हटा दिया जाएगा, यहां पर फिर क्या मेल और क्या फीमेल, जो भी बोलेगा बाहर जाएगा।

दिल्ली के इंडियन हैबिटेट सेंटर में आयोजित मीडिया रम्बल के दो दिवसीय परिचर्चा के दौरान शनिवार को रवीश कुमार ने कहा कि जब ये डिबेट सिस्टम आया, उसके पहले रिपोर्टिंग सिस्टम था, तब भले ही न्यूजरूम के स्ट्रक्चर में फीमेल कुलीग का कोई रोल नहीं था, अलग-अलग चैनलों में भी नहीं। लेकिन एक जर्नलिस्ट के तौर पर या यूं कहूं कि उनके भीतर एक जर्नलिस्ट बहुत अच्छा डेवलप कर रहा था। वो उसी तरह से अपने सोर्स पर, अपनी राइटिंग पर या अपनी प्रजेंटेशन पर कमांड रखती थीं। लेकिन जैसे-जैसे ये डिबेट सिस्टम आया और रिपोर्टिंग खत्म कर दी गई वैसे-वैसे मेल-फीमेल का अंतर खत्म हो गया। अब आप देखेंगे कि टेलिविजन पर जो लड़कियां या लड़के बोल रहे होते हैं वो एक ही भाषा है। प्रोपेगेंडा की, पॉवर की भाषा है, जिसमें कोई अंतर नहीं है। बहुत से चैनलों में देखिए कि हर तरह की एक टुनैलिटी सुपर है, बोलने का अंदाज है वह मेल डोमिनेटेड है और मुझे नहीं पता कि यदि फीमेल डोमिनेटेड होता तो कैसा होता या कैसा होना चाहिए था, पर निश्चित रूप से वो घटिया है। तो उसको भी डिप्लोमैटिक होने की कोई जरूरत नहीं है।

आगे बात करते हुए उन्होंने कहा कि 2 से 2.30 बजे का आप हिंदी चैनल का स्लॉट देखें, तो यहां ज्योतिष भी फेल हो जाता है। अलग-अलग चैनलों की फीमेल प्रजेंटर एक ही तरह से बोल रहीं होती हैं, मानों सभी एक ही दिन, एक ही घड़ी, एक ही समय पर पैदा हुईं हों। फिर चाहे उनके हाथ का स्टाइल हो, या फिर बोलने का। माना जाता है कि उस समय की दर्शक फीमेल होती हैं। मुझे समझ नहीं आता कि टीवी ने कहां से ये फॉर्मूला निकाला कि उसी वक्त हिन्दुस्तान की महिलाएं फ्री होती हैं, यानी 2.30 बजे। कभी भी आप देखिएगा, तीन-चार चैनलों को इसी समय पर, मैनेरिज्म से लेकर ड्रेस स्टाइल, हेयर स्टाइल, सभी चीजें एक समान हैं। आपको लगेगा कि आप किसी एक एंकर को देख रहे हैं अलग-अलग चैनलों पर।

एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ईमानदारी से उसे स्वीकार करने में हर्ज नहीं है कि हम जिस उम्मीद से ये सवाल कर रहे हैं कि न्यूज रूम वैसा होता होगा दरअसल न्यूज रूम बहुत ही लापरवाही से चला करता है। इतनी चिंताएं, दिलचस्पी और हमदर्दी मैंने न देखी है और न ही सुनी है, कि लोग इसे लेकर बात करें और अब तो ऐसा बंटवारा हो गया है कि अब आप इसके प्रति सहानुभूति रखें तो लोग कहेंगे कि आप घुसपैठियों का समर्थन कर रहे हैं और ये घुसपैठिया ऐसा है कि जब तक आप दीवार को आप पार नहीं करेंगे तो न तो आपको कोई औरत दिखेगी और न ही कोई मर्द।

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