ये सब आप पत्रकार लोगों के दिमाग की बातें हैं, हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते!

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मेरे एक रिश्तेदार आईएएस अधिकारी हैं। कुछ ही दिन पहले कलेक्टर बने हैं।
कल शाम को मैं उनसे मिलने गया था। मैंने उन्हें बधाई दी और कहा कि अब आप अपने जिले के मालिक हैं, उसे चाहें तो सिंगापुर बना सकते हैं।
मेरे रिश्तेदार हंसे। कहने लगे कि संजय जी, ये सब आप पत्रकार लोगों के दिमाग की बातें हैं। हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते, जैसा आप सोच रहे हैं। हम अफसरी कर सकते हैं, रुतबा झाड़ सकते हैं, गाड़ियों का काफिला लेकर चल सकते हैं, लोगों में रौब गांठ सकते हैं, चाहें तो पैसे भी बना सकते हैं। लेकिन हम कोई काम नहीं कर सकते।
मैं अपने रिश्तेदार की साफगोई पर हैरान था।
मैंने उनसे कहा कि अगर आप किसी से न डरें, किसी की परवाह न करें, तो आप विकास के जो काम चाहें कर ही सकते हैं। आपको कौन रोकता है? आप अपने काम से साबित कीजिए कि एक कलेक्टर क्या-क्या कर सकता है। उन्हें उकसाने के लिए मैंने यहां तक कहा कि भारत में तीन ही लोग पावरफुल होते हैं। पीएम, सीएम और डीएम। इस लिहाज़ से तो आप पावरफुल हुए।
कलेक्टर साहब कहने लगे कि पावरफुल तो हूं, पर सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए। पों-पों कर गाड़ियां आगे-पीछे चल सकती हैं। जहां जाता हूं, सलामी मिलती है। किसी तरह की फेवर किसी से लेना चाहूं तो वो भी मिल सकती है। पर आप अगर ऐसा सोच रहे हैं कि कोई सचमुच कुछ काम कर सकता है तो गलत सोच रहे हैं।
अपनी बात को फिलॉसिफिकल अंदाज़ में आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि आदमी इस संसार में आज़ाद आता है, पर खुद को बहुत जल्दी जंजीरों में जकड़ा हुआ पाने लगता है। हम सभी उन जंजीरों से बंधे हैं।
आप तो जानते ही हैं कि संजय सिन्हा इतनी आसानी से हार नहीं मानते। उन्होंने कलेक्टर साहब को उकसाया कि आप ईमानदार आदमी हैं, आप में जोश है। आप जिले के लिए कुछ तो ऐसा कर ही सकते हैं कि आपका नाम हो, जिले का नाम हो।
उन्होंने जवाब दिया कि बिल्कुल कर सकता हूं। कायदे से करना भी चाहिए। पर हम इतना ही कर पाते हैं कि अपनी ईमानदारी का डंका बजवा देते हैं और मान लिए जाते हैं कि डीएम साहब ने बहुत काम कर दिया। पर सोचिए संजय जी, हम विकास के नाम पर क्या कर पाते हैं?
हम जी हुजूरी करवाते हैं, जी हुजूरी करते हैं। मेरे नीचे वाले अफसर मुझे सलाम ठोकते हैं, अपने ऊपर वाले को हम सलाम ठोकते हैं।
मैंने कहा कि आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं? आदमी चाहे तो क्या नहीं कर सकता है? पचास साल पहले तक सिंगापुर भी दिल्ली की चांदनी चौक जैसा इलाका था। वहां सड़कों पर नालियां बहती थीं। पर किसी ने सोचा और सब कुछ बदल गया।
वो कह रहे थे कि आप पहले व्यक्ति नहीं हैं जो ऐसा सोच और कह रहे हैं कि हम कुछ करें। जब मैं कॉलेज में पढ़ता था तो मैं भी ऐसा ही सोचता था। पर नौकरी में आने के बाद जल्दी ही सच समझ में आ गया।
सच ये है संजय जी कि अगर आप ये मान लें कि एक जिले में किसी कलेक्टर की नौकरी तीन साल की होती है, तो आज़ादी के सत्तर सालों में भारत के हर जिले को कम से कम 20-25 कलेक्टर मिले होंगे। सोचिए, क्या कोई एक कलेक्टर ऐसा नहीं रहा होगा, जिसने सोचा होगा कि उसका जिला सिंगापुर बन जाए?
वो कह रहे थे इस देश में 640 जिले हैं। मतलब इतने कलेक्टर हैं। पर एक भी जिला सिंगापुर जैसा नहीं बन पाया। आप खुद ही सोच कर बताइए कि क्या एक भी जिला ऐसा है जो सिंगापुर बन गया हो। एक भी नहीं। सिंगापुर एक देश है जो भारत के किसी एक जिले के बराबर ही होगा या फिर उससे भी छोटा। पर वहां के विकास की गति देखिए। यहां की स्थिति देखिए। मैं मान सकता हूं कि कुछ अफसर बेईमान, चोर, भ्रष्ट, कामचोर भी होते होंगे। पर कुछ नहीं भी होंगे। कोई एक कलेक्टर बताएं, जिसने वास्तव में कुछ कर दिया हो। नहीं कर पाया। मैं भी नहीं कर पाऊंगा। हां, कुछ काम कर दूं, वही बहुत है। पर जैसा मैंने सोचा था, वैसा बिल्कुल नहीं है।
मैं चुप खड़ा था। सोच रहा था कि क्या कहूं।
कलेक्टर साहब ने कहा कि संजय जी, हमारे हाथ आपको खुले दिखते हैं, पर होते बंधे हैं। हम असल में कुछ नहीं कर सकते। भारत में सब कुछ राजनीति से संचालित होता है और सच बात कह दूं आपसे कि हमारे यहां राजनीति उन्नति की सबसे बड़ी दुश्मन है।
वो कह रहे थे कि राजनीति में जब तक पढ़े-लिखे, ईमानदार लोग नहीं आएंगे, तब तक अफसर चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते। पहले आप उन लोगों को राजनीति में लाने की सोचिए, जो सोचना जानते हैं। जिनके भीतर कुछ करने का जज्बा हो।
स्कूल-कॉलेज के फिसड्डी बच्चे जो कुछ नहीं कर सकते, वो जातिगत समीकरण, स्थानीय दांवपेंच और गुंडागर्दी के बल पर राजनीति में घुस जाते हैं और फिर वही रूल करते हैं। जिनके भीतर कोई विज़न नहीं होता, जो राष्ट्र निर्माण का मतलब नहीं समझते, वो सत्ता में होते हैं। वो हमें अपने इशारों पर नचाते हैं। नहीं नाचने पर हमारा ट्रांसफर करा देते हैं। हम उनके टूल बन कर रह जाते हैं।
जब तक आप सही लोगों को राजनीति में नहीं लाएंगे, तब तक मैं कलेक्टर बनूं या आप खुद कलेक्टर बन जाएं, कुछ नहीं कर पाएंगे।
वो कह रहे थे कि गंदगी हमेशा ऊपर से नीचे आती है, नीचे से ऊपर कोई गंदगी नहीं जाती।

#Sanjay_ji वाया Mustafa Husain