#रसूलों_की_ज़रूरत

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Sikander Kaymkhani
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इंसान अल्लाह ताला की मख़लूक़ है और तदय्युन (ताज़ीम और इबादत करने की चाहत) इंसान के अंदर एक फितरी चीज़ है। क्योंकि यह जिबिल्लतों में से एक जिबिल्लत (मूलपर्वर्ती) है। इंसान अपनी फितरत के लिहाज से अपने ख़ालिक़ की तकदीस करता है और ये तकदीस ही इबादत है। यही इंसान और ख़ालिक़ के दरमियान ताल्लुक है और अगर इस ताल्लुक को बगैर किसी निज़ाम के छोड़ दिया जाए तो यह परेशानी (परागंदगी) और गैर-ख़ालिक़ की इबादत की तरफ ले जायेगा। चुनाँचे लाज़िम है की यह ताल्लुक एक सही निज़ाम के ज़रिये मुनज्ज़म हो और यह निज़ाम कोई इंसान नही बना सकता। क्योकिं वोह ख़ालिक़ की हक़ीक़त का इदराक ही नही कर सकता तो उसके साथ ताल्लुक के लिए निज़ाम किस तरह बनाएगा? लिहाज़ा यह निज़ाम ख़ालिक़ ही बना सकता है। फिर ख़ालिक इस निज़ाम को इंसानो तक कैसे पहुँचाएगा? पस अल्लाह के दीन (निज़ाम) को लोगों तक पहुँचाने के लिए रसूलो की ज़रूरत है।

इंसानो के लिए रसूलो की ज़रूरत की यह भी दलील है कि अपनी जिबिल्लतों और जिस्मानी हाजात (instincts and organic needs) को पूरा करना इंसान की ज़रूरत है। अगर यह जिबिल्लतों और जिस्मानी हाजात का पूरा करना बगैर किसी निज़ाम (system) के हो तो यह ग़लत और खिलाफे मामूल होने की वजह से इंसान की बदबख्ती का सबब बन सकता है। लिहाज़ा एक ऐसे निज़ाम की ज़रूरत है जो इंसान की जिबिल्लतों और जिस्मानी हाजात को मुनज्ज़म अंदाज से पूरा करे और यह निज़ाम इंसान नही बना सकता। क्योकिं इंसानी जिबिल्लतों और जिस्मानी हाजात को मुनज्ज़म करने के बारे में उसका फहम तफावुत, इखतिलाफ और तज़ाद से दो-चार होता रहता है। इसी तरह वोह उस माहोल से भी मुतास्सिर होता है जिसमें वोह रह रहा हैं। पस अगर निज़ाम का बनाना इंसान पर छोड़ दिया जाए तो इस निज़ाम मे तफावुत, इखतिलाफ और तज़ाद होगा और यह इंसान की बदबख्ती का सबब बन जाएगा। चुनँाचे निज़ाम अल्लाह ताला ही की तरफ से हो सकता है।