राख हो चुके मंदिर मुद्दे में चिंगारी की तलाश

Posted by

Saleem Akhter Siddiqui
===========

राम मंदिर पर एक बार फिर तलवारें म्यान से बाहर निकल आई हैं। इसी महीने होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले राम मंदिर का जिन बोतल से बाहर आना ही था। जब बात विकास की हो और राम मंदिर जैसा विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दे को हवा दी जाने लगे तो समझा जा सकता है कि ‘सरकार’ पर संकट है। आखिर क्या कारण है कि पूरे पांच साल की चुप्पी के बाद राम मंदिर याद आ जाता है? क्या राख हो चुके राम मंदिर में कोई चिंगारी बाकी है, जिसे सुलगाकर संघ परिवार उसे आग में बदलना चाहता है? ऐसी ही आग, जैसी 1986 में भड़की और 1992 में बाबरी मसजिद की शहादत के साथ कुछ ठंडी पड़ी और 2002 में हजारों की जान लेकर राख में तब्दील हुई?

इस वक्त देश में उत्तर प्रदेश समेत 25 राज्यों में भाजपा की सरकार है। केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। अब तक क्या कर रहे थे? सो क्यों रहे थे? अगर राम मंदिर बनाना भाजपा की प्राथमिकता में शामिल है, तो किस बात का इंतजार किया जा रहा था? अगर अध्यादेश लाकर या संसद में कानून बनाकर ही मंदिर का निर्माण किया जाना है तो क्यों अब तक इंतजार किया? चुनाव के ठीक पहले इस मुद्दे को हवा देने का मतलब यह है कि सरकार की नीयत में खोट है, वह बेईमान है। सरकार कई मुद्दों पर घिरी है। राफेल, बेरोजगारी, महंगाई और रुपये की गिरती कीमत, सीबीआई में घमासान, आरबीआई में बेचैनी जैसे मामलों में सरकार को जवाब देते नहीं बन रहा है। ऐसे में यही एक रास्ता था कि मंदिर मुद्दे को हवा दे दी जाए। लेकिन क्या राम मंदिर में वह जान बची है, जो भाजपा की चुनावी वैतरणी पार लगा दे? समझती भाजपा भी है कि राम मंदिर जैसा मुद्दा, जिसकी पोल खुद उसके वोटरों के बीच खुल चुकी है, उसका मददगार नहीं होने वाला है? आखिर कितनी बार झूठ बोलकर मतदाताओं को छला जा सकता है?

एक बार लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था, ‘राम मंदिर का चेक एक बार कैश किया जा चुका है। इसे बार बार कैश नहीं किया जा सकता है।’ लेकिन संघ परिवार को यह बात समझ में नहीं आती है। वह समझती है कि ये एक ऐसा चेक है, जिसे कई बार कैश किया जा सकता है।

कानून, सुप्रीम कोर्ट और संविधान की गरिमा की बात करने वाला संघ परिवार ही सबसे ज्यादा इनको ठेंगा दिखाता आया है। बाबरी मसजिद जिस जमीन पर बनी थी, उस पर मालिकाना हक किसका है, इसका केस सुप्रीम कोर्ट में है तो फिर संघ परिवार क्यों सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार नहीं करना चाहता? क्या इसलिए कि उसे पता है कि उस जमीन पर मालिकाना हक सुन्नी वक्फ बोर्ड का है? वही जीतेगा। ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि वह इस मामले में ‘आस्था’ पर कोई विचार नहीं करेगा। मुसलिम पक्ष कह चुका है कि वह सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानेगा। लेकिन संघ परिवार के लोग बार-बार यह कहकर कानून और संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर केपक्ष में नहीं आया तो वह इसे नहीं मानेंगे। ऐसे ही जैसे
सबरीमाला मंदिर पर हठधर्मी की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा है।

संघ परिवार अपनी हठधर्मी करके एक बार फिर देश को सांप्रदायिकता की आग में इसलिए झोंकना चाहता है, ताकि आने वाले चुनाव में भाजपा को फायदा मिल सके। हर चुनाव से पहले संघ परिवार जोरशोर से राम मंदिर का मुद्दा हवा में उछालता है, चुनाव के बाद खामोश होकर बैठ जाता है। केंद्र में भाजपा की सरकार है। अगर मंदिर नहीं बन रहा है गलती मोदी सरकार की है। लेकिन हंसी तब आती है, जब मंदिर न बनने का इल्जाम विपक्षी दलों पर थोप दिया जाता है। अगर देश के विपक्षी दल इतने ताकतवर हैं कि वे पूर्ण बहुमत वाली सरकार को काम नहीं करने दे रहे हैं, तो यह इसका सबूत है कि मोदी सरकार निकम्मी और कमजोर है।

दरअसल, भाजपा और संघ परिवार राम मंदिर मुद्दे को जिंदा रखना चाहता है। हालांकि ये मुद्दा तो तभी राख में तब्दील हो गया था, जब कारसेवकों ने एक प्राचीन और ऐतिहासिक मसजिद को जमींदोज कर दिया था। तभी तो लालकृष्ण आडवाणी उस वक्त रो पड़े थे, जब बाबरी मसजिद को तोड़ा जा रहा था। वे समझते थे कि जब तक बाबरी मसजिद खड़ी है, तब तक यह ऐसा चेक है, जिसे कैश किया जाता रहेगा। लेकिन अराजक भीड़ ने मसजिद को तोड़कर सब गुड़गोबर कर दिया था। कहा जाता है कि संघ परिवारके एजेंडे में यह था ही नहीं कि मसजिद तोड़ दी जाए। वो तो बस इतना चाहता था कि 30 अक्टूबर 1990 की तरह मसजिद पर कारसेवक चढ़ाई करें, पुलिस उन्हें रोकने के लिए गोलियां चलाए, जिससे 100-50 कारसेवक मारे जाएं। बाबरी मसजिद अपनी जगह खड़ी रहे। अगर अब संघ परिवार यह सोच रखता है कि वह देश में 1992 जैसा माहौल पैदा किया जा सकता है, तो वह गलत सोचता है। 6 दिसंबर 1992 के बाद से अब तक सरयू नदी में बहुत पानी बह चुका है। न तो उस तरह के कार सेवक हैं, न लालकृष्ण आडवाणी, प्रवीण भाई तोगड़िया, मुरली मनोहर जोशी और अशोक सिंघल जैसे नेता सक्रिय हैं, जो कुछ कर सकें। देश में इस वक्त ऐसे लोगों का कब्जा है, जिनका उद्देश्य किसी भी तरह सत्ता पर काबिज रहना है, जिससे ज्यादा से ज्यादा माल बनाया जा सके, अपने उन पूंजीपति दोस्तों को फायदा पहुंचाया जा सके, जिन्होंने भाजपा को सत्ता में लाने के लिए हर तरह से सहयोग किया।
संघ परिवार को न कभी राम मंदिर बनाने की नीयत थी, न आज भी है। वह सिर्फ धौंसपट्टी से चुनाव में भाजपा का फायदा होना देखना चाहता है, जो इस बार मुमकिन नहीं लगता।