राजनैतिक सौदेबाज बनें मुसलमान

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Parvez Iqbal

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मैने हाल ही में सोश्यल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी जिसमे मेने कहा था कि”कांग्रेस ये साबित करने में लगी है कि
“कांग्रेस ‘सिर्फ’ मुसलमानों की पार्टी नहीं है”..
अब वक़्त आ गया है कि
मुसलमानों को भी साबित करना चाहिए कि
“मुसलमान ‘सिर्फ’ कांग्रेस के वोटर नहीं हैं”..
इस पोस्ट से कुछ लोग असहज हुए या यूं कहो कि मेरे मन्तव्य तक पहुंच नहीं पाए…सबसे पहले तो स्पष्ट कर दूं कि ये पोस्ट कांग्रेस के खिलाफ या भाजपा के पक्ष में नहीं है…दरअसल एक लंबे समय से देश में विध्वंसक विचारधारा वाला ‘संघ’ठन और उसके वैचारिक प्रसव से उत्पन्न हुवे राजनैतिक(?) दल के खरीदे गए मीडिया/नेता/ कार्यकर्ता ये साबित करने पर आमादा है कि कांग्रेस ‘सिर्फ’मुसलमानों की पार्टी है,हालांकि ये बहुत बड़ी विडंबना है कि आजादी के बाद से अभी तक सत्ताधारी दल कोंग्रेस की सियासी बंधुआ मजदूरी और थोकबंद वोट के बावजूद मुसलमानों की हालत ये है कि खुद कांग्रेस सरकार द्वारा बनाये गए सच्चर आयोग ने खुलासा किया कि आज मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है…कांग्रेस सरकारों के समय हुए दंगों और टाडा मकोका जैसे कानूनों का दंश आज भी हज़ारों बेकसूर मुस्लिम युवा झेल रहे हैं..और सच्चर कमेटी,श्रीकृष्ण आयोग और लिब्राहन आयोग जैसी रिपोर्ट्स धूल खा रही हैं…बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने से लेकर उसे ढहाने तक सत्ता पर कौन क़ाबिज़ था ये कौन नहीं जानता..
सिमी के नाम पर देश भर में जो हुआ है वो किसी से छुपा नहीं है..मुम्बई दंगे और बटला एनकाउंटर भी याद है..मालेगांव,अजमेर,जामा मस्जिद,समझौता ब्लास्ट जैसे मामलों में बेकसूर मुस्लिम युवा, कांग्रेस शासनकाल में ही फँसाये गए थे…ये सब घटनाएं तो सर्वज्ञात उदहारण मात्र हैं इन सबके अलावा भी ऐसे कई मामले हैं जहां कांग्रेस पार्टी ने अपने सबसे बड़े परम्परागत वोट बैंक से राजनैतिक विश्वासघात किया है फिर चाहे वो सरकारी नोकरियों में मुस्लिमों की लगभग नगण्य होती संख्या हो या सत्ता संगठन में मुस्लिमों की भागीदारी…कांग्रेस ने बड़ी सफाई से बुद्धिजीवी मुस्लिम नेतृत्व को खत्म कर अपने चाटुकारों और स्वहित साधने वालों को शो-पीस की तरह आगे कर मुस्लिम मतदाताओं को छलने का काम किया..
बावजूद इसके कांग्रेस को मुस्लिमो की हितेषी पार्टी बताना हास्यास्पद ही है..एक सियासी जमात हमे मिठाई में जहर देती रही और एक कुनेन में…ज़हर तो दोनों ने ही दिया है…और अब भाजपा के आरोपों से घबरा कर कांग्रेस मुस्लिम प्रेम की अपने ‘केंचुली’ बदल कर असली स्वरूप में आना चाहती है तो बेशक आये…मेरा स्पष्ट कहना है कि आज कांग्रेस ये साबित करने पर आमादा है कि “कांग्रेस ‘सिर्फ’मुस्लिमो की ‘ही’ पार्टी नहीं है तो मेरा भी मुस्लिम समाज से कहना है कि हम भी सिर्फ कांग्रेस को ही अपना राजनैतिक ठौर कियूं समझें…? तो सवाल ये उठता है कि फिर क्या किया जाए ? कांग्रेस का राजनैतिक विकल्प क्या हो ? देश मे वर्तमान सत्ताधारी दल भाजपा और उसके मातृ ‘संघ’ठन की राजनैतिक/सामाजिक विचारधारा और कट्टर हिंदुत्व का एजेंडा किसीसे छिपा नहीं है,कई प्रदेशों में स्थानीय दल अस्तित्व में है ऐसे में मुस्लिम समाज क्या करे ? इस मामले में मेरा मानना ये है कि सारे देश का मुस्लिम समाज एक ही राजनैतिक विचारधारा का पालन करे ये कोई ज़रूरी है क्या ? सिख पंजाब में अकाली या कांग्रेस को वोट देते हैं तो क्या अन्य प्रदेशों में वो अकाली प्रत्याशी तलाशते हैं ? दक्षिण भारत मे स्थानीय दक्षिण भारतीय राजनैतिक दलों को थोकबंद वोट देते हैं तो क्या अन्य प्रदेशों में दक्षिण भारतीय दल का प्रत्याशी होने पर वोट नहीं देते ? मेरा अपना मानना तो यह है कि
मुस्लिम समाज के लिए वोटर की हैसियत से सियासी एकजुटता से उनका विभिन्न राजनैतिक दलों में बंट जाना ज़्यादा बेहतर साबित हो सकता है…मुसलमानों को भी अन्य तबको की तरह अपनी वोटों की हैसियत के मुताबिक राजनैतिक दलों से सत्ता या संघठन में भागीदारी के लिए राजनैतिक सौदेबाज़ी करना चाहिये और जो दल उनकी समस्याओं के निराकरण में ईमानदारी से कोशिश करे या उनकी क़ोम के हितों की रक्षा करे उसे ही वोट करना चाहिए..फिर चाहे वो कांग्रेस हो या अन्य कोई भी दल..क्या कभी सिख समाज,सिंधी समाज,बोहरा समाज या अन्य किसी धर्म सम्प्रदाय की राजनैतिक आस्था पर यूँ सवाल उठाए जाते हैं जैसे मुस्लिम समुदाय की राजनैतिक विचारधारा पर उठाए जाते रहे हैं ? ऐसा शायद इसलिए है कि विभिन्न वर्गों ने अपनी सियासी हैसियत को समझ कर हमेशा राजनैतिक सौदेबाज़ी कर अपने हितों के आधार पर अपनी राजनैतिक आस्था को मुद्दे/मोके/हितों के अनुसार बदलने में विश्वास रखा है जबकि मुस्लिम समुदाय ने खुद को (कांग्रेस शासनकाल में हुए लाखों दंगे,बाबरी मस्जिद ताले खुलवाने से ढहाने और सच्चर कमेटी,श्रीकृष्ण आयोग,लिब्राहन आयोग जैसी रिपोर्ट्स के बावजूद) केवल कांग्रेस की अंधभक्ति तक ही सीमित रखा है..और उस पर भी विडम्बना ये है कि खुद कांग्रेस में आज मुस्लिम नेतृत्व हाशिये पर है और मात्र रबर स्टेम्प बन कर आलाकमान की हां में हां मिला रहा है..आज कुछ राजनैतिक दल साम्प्रदायिक ताकतों का डर दिखा कर मुस्लिम को अपने पक्ष में थोक वोट देने की बात करती हैं..दरअसल इसी भावनात्मक हथियार से आज तक मुस्लिमों का राजनैतिक शोषण होता आया है..मेरा तथाकथित धर्मनिरपेक्ष (?) दलों से एक सवाल है कि “क्या देश मे साम्प्रदायिक ताकतों को रोकना सिर्फ मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है”? देश मे साम्प्रदायिक ताक़तों के क्रियाकलापों से सिर्फ मुस्लिमों को ही नुकसान होता है ? क्या समाज के अन्य तबके या खुद धर्मनिरपेक्ष बहुसंख्यक वर्ग की ये ज़िम्मेदारी नहीं है कि वो विश्वभर में “धरनिर्पेक्ष भारत”की छबि को तार-तार करने वाले धर्मांध हुड़दंगियों को रोके ? हम अकेले ही हर बात के ठेकेदार कियूं बने ?
इसलिए बेहतर यही है कि मुस्लिम अपनी सियासी अंधभक्ति और सियासी एकजुटता को खत्म कर विभिन्न राजनैतिक दलों को वक़्त ओर हालात के हिसाब समर्थन दें या विरोध करे..यही उनके हक में बेहतर है..वेसे भी लगभग आधी सदी तक अंधभक्ति का राजनैतिक प्रयोग अगर असफल होता दिख रहा है तो यकीनन नया प्रयोग करने से परहेज़ नही करना चाहिए कियूंकि आधी सदी की राजनैतिक गुलामी से वेसे भी उन्होंने ऐसा क्या हासिल कर लिया है जो तथाकथित कट्टरपंथी ताक़तें उनसे छीन लेंगी।
(परवेज़ इक़बाल)
सम्पादक-
राष्ट्रीय मासिक ‘जनमत’
साप्ताहिक”इंडिया-Now”