राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष पद पर अनूसूचित जाति के विनोद जाखड़ की जीत का जश्न सबको मनाना चाहिये

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अशफाक कायमखानी।जयपुर।हालांकि दो अप्रैल को दलित संगठनों की तरफ से भारत बंद कराने को लेकर अनेक तरह से उन्हें कुचलने की नीती एवं गुजरात के निर्दलीय विधायक जिगनेश मेवाणी के लगातार राजस्थान मे जगह जगह दौरे होते रहने से खासतोर पर राजस्थान की अनूसूचित जाति के युवावो व छात्रो मे एक नई राजनीतिक चेतना का संचार होने लगा है। जिसके पहले करिस्मे के तौर पर राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों मे निर्दलीय तौर पर चुनाव लड़ रहे आनूसूचित जाति से तालूक रखने वाले छात्र विनोद जाखड़ की इतिहास मे पहली दफा भारी मतो के अंतर से आज विजय होने के रुप मे देखा जा सकता है।

राजस्थान के इतिहास मे वैसे तो अक्सर देखा जाता रहा है कि प्रदेश मे कुम्हेर व डांगावास सहित अनेक जगहों पर रुक रुक कर जब जब हत्याचार आनूसूचित जाति पर हुये है। तब तब उस हत्याचारो से उभरने मे इस तबके ने कोई समय नही गवाया है। बल्कि जितना जल्द हो सका उतनी जल्दी के साथ इस तबके के यूवावो ने नये दिन की शूरुआत नये रुप से करके आगे कदम बढाने की भरपूर कोशिशे करते हुये कांग्रेस के सम्बंध वाले NSUI संगठन ने जब विनोद जाखड़ को राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावो मे अपना उम्मीदवार नही बनाया तो। विनोद इससे निराश होकर घर बैठने की बजाय छात्र हितो व अपने मजबूत दावे को नकारने के खिलाफ इंसाफ पाने के लिये चुनावी रण मे उतरकर निर्दलीय रुप से चुनाव लड़कर तमाम राजनीतिक दलो की छात्र इकाई के उम्मीदवारो को पछाड़ते हुये विजय प्राप्त करके एक नया इतिहास रचते हुये मुस्लिम समुदाय सहित अन्य वंचित वर्गो के यूवा व छात्रो को राजनीतिक दलो की टिकट को लेकर जारी दादागिरी के खिलाफ अपना हक पाने के लिये संघर्ष करने का नया संदेश भी दे दिया है।

कुल मिलाकर यह है कि सभी राजनीतिक दलो मे ऊपरी स्तर पर विशेष वर्ग व दबंग बीरादरियो के लोगो का अघोषित कब्जा बना हुया है।जिस कब्जे को तोड़ने के लिये विनोद जाखड़ सहित हजारों युवा व छात्रो को आगे आकर बडी होसीयारी से संघर्ष करके अपना हक पाने पर आगे भी विचार करते रहना होगा। दूसरी तरफ नजर घूमाकर हम देखते है तो पाते है कि आनूसूचित जाति के छात्र विनोद की इस जीत का असर तीन महिने बाद प्रदेश मे होने वाले आम विधानसभा चुनावों मे भी नजर आयेगा। आरक्षित क्षेत्र से हटकर जब जनरल क्षेत्र से आनूसूचित जनजाति के रामनारायण मीणा के विधायक बनने की तरह अब आनूसूचित जाति के उम्मीदवार भी जैसलमेर से मुलताना राम की तरह फिर विधायक बनने लगेगे।

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राजस्थान यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव: पहली बार एससी प्रत्याशी ने दर्ज की अध्यक्ष पद पर जीत


जयपुर: राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ इतिहास में पहली बार अनुसूचित जाति के प्रत्याशी ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल कर विश्वविद्यालय में छाए हुए जातिगत समीकरणों को भी ठेंगा दिखाया है. निर्दलीय उम्मीदवार विनोद जाखड़ के कैंपस का किंग बनने के साथ ही एक बात पर मुहर लग गई कि यूनिवर्सिटी के छात्र अब जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर मतदान करने का फैसला कर चुके हैं. इतना ही नहीं जाति कार्ड खेलने वाले छात्र संगठनों का वर्चस्व भी अब कैंपस में कमजोर होने लगा है. इस बार के चुनाव नतीजों को जातिगत चश्मे से देखें तो हैरान करने वाले तथ्य सामने आते हैं.

प्रदेश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी में शुमार राजस्थान विश्वविद्यालय में लगातार तीसरे साल अध्यक्ष पद पर निर्दलीय ने जीत हासिल करके इतिहास रच दिया है. विधानसभा चुनाव से पहले छात्रसंघ चुनावों को लिटमस टेस्ट के रूप में देखा जा रहा था. इस टेस्ट में बीजेपी और कांग्रेस के दोनों ही छात्र संगठनों को करारी हार का सामना करना पड़ा है. पिछले दो सालों से जहां एबीवीपी के निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल कर अपने संगठन को धूल चटाई थी तो वहीं इस साल एनएसयूआई के बागी विनोद जाखड़ ने जीत हासिल कर अपने ही संगठन को पटखनी दी.

ये चार उम्मीदवार हुए विजयी:
अध्यक्ष पद पर विनोद जाखड़ ने तो उपाध्यक्ष पद पर रेणू चौधरी ने बाजी मारी. महासचिव पद के चुनाव में जीत आदित्य प्रताप सिंह को मिली तो संयुक्त
सचिव के पद पर मीनल शर्मा विजयी हुए.

कैंपस के चुनाव में युवाओं ने जातिगत समीकरणों को सिरे से खारिज कर अपना मेंडेट दिया है. एबीवीपी की ओर से इस साल अध्यक्ष और महासचिव दोनों ही पदों पर जाट प्रत्याशी का कार्ड खेला गया था. ये कार्ड पूरी तरह से गलत साबित हुआ. यही जाति कार्ड एनएसयूआई ने भी खेला था इसलिए अध्यक्ष पद पर जाट उम्मीदवार को मैदान में उतारा गया था. ये फैसला पूरी तरह से फेल साबित हुआ. अध्यक्ष पद पर कुल 6 उम्मीदवार ताल ठोक रहे थे. वोटों के आधार पर उनकी स्थिति कैसी रही ये बताते हैं.

किसको कितने वोट मिले
राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में विनोद जाखड़ को 4321 वोट मिले. वहीं, राजपाल चौधरी को 2467 वोट, रणवीर सिंघानिया को 1789 वोट, दुष्यंत राज को 1351 वोट, महेश सामोता को 1214 वोट मिले जबकि विनोद कुमावत को 66 वोट से संतोष करना पड़ा. इन वोटों के अलावा 176 छात्रों ने नोटा का भी इस्तेमाल किया जबकि 96 छात्रों के वोट को अवैध करार दिया गया. बहरहाल, साल 2016 में एबीवीपी के बागी अंकित घायल, 2017 में एबीवीपी के बागी पवन यादव और 2018 में एनएसयूआई के बागी विनोद जाखड़ ने जीत हासिल करके ये साबित कर दिया है कि छात्रसंघ चुनावों से अब ना सिर्फ जातिगत राजनीति को नकारा जा चुका है बल्कि जाति आधारित राजनीति करने वाले छात्र संगठनों का वर्चस्व भी कैंपस से अब खत्म होने के कगार पर है.