रोहिंग्या मुसलमानों पर किए जाने वाले अत्याचार और भेदभाव : रिपोर्ट

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दुनिया के संचार माध्यमों में रोहिंग्या मुसलमान पर हो रहे अत्याचारों और दरिंदगी की ख़बरें थोड़े थोड़े अंतराल से आती रहती हैं।

यह हृदय विदारक विषय जिसमें बेगुनाह लोगों, महिलाओं और बच्चों का जनसंहार, उनके घरों को आग के हवाले कर देना और उनका टूटी फूटी नौकाओं पर सवार होकर महासागर के मार्ग से भाग निकलने का प्रयास सब शामिल हैं। इन नौकाओं को तैरते ताबूत की संज्ञा दी है जिसमें रोहिंग्या मुसलमान अपनी जान बचाने की आस में सवार हो जाते हैं और रास्ते में तूफ़ानी लहरों सहित अनेक ख़तरों का सामना करते हैं और यदि उनकी किसमत अच्छी होती है तो तट तक पहुंच जाते हैं। लेकिन तट पर पहुंच जाने के बाद भी एसा नहीं है कि उनकी पीड़ा का अंत हो जाता हो और जिन तटों तक वह पहुंचे हैं वहां उनके साथ नर्मी का बर्ताव किया जाता हो। वहां पहुंचने के बाद वह भुखमरी से जूझते हैं और इन हालात में मानव तस्करों और घात में बैठे दुष्ट लोगों की चांदी हो जाती है। वह रोहिंग्या महिलाओं और बच्चों के शोषण और व्यवार जैसे घिनौने काम करते हैं जिससे इन बच्चों और महिलाओं का भविष्य अंधकार में डूब जाता है।

रोहिंग्या मुसलमानों पर म्यांमार में जारी अत्याचारों पर बहुत दिनों तक तो ख़ामौशी रही लेकिन जब इन पीड़ितों पर म्यांमार की सेना के बर्बर हमलों की तसवीरें और वीडियो क्लिप्स आने लगीं तो विश्व संचार माध्यमों और संस्थाओं का ध्यान इस विडंबना की ओर केन्द्रित हुआ। वर्ष 2012 में रोहिंग्या मुसलमानों पर बेरहमाना हमलों में बहुत अधिक तेज़ी आ गई और हज़ारों की संख्या में लोग अन्य देशों में भाग कर शरण लेने पर मजबूर हो गए। इससे चार महीने पहले एक घटना यह हुई कि म्यांमार के सैनिक रोहिंग्या मुसलमानों की एक बस्ती में घुसे और उन्होंने कम से कम डेढ़ हज़ार घरों को ध्वस्त कर दिया और महिलाओं, बच्चों और पुरुषों सब पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की।

इन घटनाओं को विश्व मीडिया में जिस तरह कवर किया गया उसकी समीक्षा से यह साबित होता है कि सबका ध्यान इस विडंबना के धार्मिक और जातीय आयाम पर ही केन्द्रित है और इसे सांप्रदायिक उन्माद का एक उदाहरण माना जा रहा है। ह्युमन राइट्स वाच ने भी कहा कि रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा जातीया सफ़ाया और मानवता के विरुद्ध अपराध है। संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थियों के मामलों की संस्था के अधिकारियों ने भी कहा कि म्यांमार की सरकार रोहिंग्या मुसलमानों का जातीय सफ़ाया कर रही है।

प्रोफ़ेसर सास्किया सासेन न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री हैं। उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों का गहराई से अध्ययन किया है। उन्होंने अपनी एक पुस्तक तथा एक रिसर्च पेपर में जिसकी रिपोर्ट गार्डियन समाचार पत्र में प्रकाशित हुई इस विडंबना का नया आयाम पेश किया हैं

सासेन के अनुसार हालिया कुछ वर्षों में रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार की सेना, चरमपंथी बौद्धों तथा म्यांमार के राष्ट्रवादियों ने भयानक रूप से हिंसा और उत्पीड़ना का निशाना बनाया है लेकिन सासेन के अनुसार शोध से यह भी पता चला है कि बलपूर्वक निर्वासन की इस विडम्बना में सांप्रदायिक और जातीय पहलू तो सीमित मुद्दा है इससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि वर्ष 1990 के दशक से ही म्यांमार की सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों की कृषि भूमियों को हड़पना शुरू कर दिया और यह सिलसिला अब तक जारी है। हालिया वर्षों में इस प्रक्रिया में बहुत अधिक कठोरता आ गई है। वर्ष 2012 में एक क़ानून बनाकर ज़मीनें बड़ी कंपनियों को सौंपने का अमानवीय रास्ता खोल दिया गया जिसकी भेंट रोहिंग्या मुसलमान बने।

इस तरह देखा जाए तो रोहिंग्या मुसलमानों को आतंकित करके उनके घरबार से इस लिए निकाला गया है ताकि उनकी ज़मीनों पर उद्योग लगाए जाएं और आर्थिक लाभ प्राप्त किया जाए। म्यांमार की सरकार ने हाल ही में लगभग 12 लाख 68 हज़ार हेक्टेयर भूमि निजी कंपनियों को औद्योगिक कृषि के विकास के नाम पर दे दी और यह सारी ज़मीनें रोहिंग्या मुसलमानों से हड़पी गई हैं। हालांकि वर्ष 2012 में जो क़ानून बना था उसके अनुसार केवल 7 हज़ार हेक्टेयर भूमि इन कंपनियों को दी जाने वाली थी। जब रोहिंग्या मुसलमानों की विडंबना को जातीय व सांप्रदायिक संकट के रूप में प्रचारित किया जाता है तो उनकी ज़मीनें हड़पने का मुद्दा उपेक्षित रह जाता है।


यदि हम म्यांमार की ग्रामीण बस्तियों पर गहरा प्रभाव डालने वाली प्रक्रियाओं पर ध्यान दें तो दो तथ्य सामने आते हैं। एक तो यह कि रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध होने वाली भयानक हिंसा के दौरान बहुत से बौद्धों को भी उनके घरों और भूमियों से बाहर खदेड़ दिया गया है तथा लकड़ी और खनिज पदार्थों की बड़ी परियोजनाओं के लिए बड़े बड़े इलाक़ों को ख़ाली करवा लिया गया है।

मगर मीडिया जब इन घटनाओं का कवरेज देता है तो वह केवल सांप्रदायिक और जातीया आयामों पर ही ध्यान केन्द्रित रखता है। आंग सान सूकी भी जिनकी पार्टी को वर्ष 2015 के चुनावों में विजय मिली और जो नोबल पुरस्कार जीत चुकी हैं, इस मामले में पुरी तरह ख़ामोश हैं बल्कि उन्होंने तो अमरीका की सरकार से यह मांग भी कर डाली कि रोहिंग्या का शब्द प्रयोग न करे क्योंकि एसा करना म्यांमार की राष्ट्रीय संधि की प्रक्रिया के लिए नुक़सानदेह होगा।

आंग सान सूकी ने बीबीसी के साथ एक बातचीत में आंख में धूल झोंकने की कोशिश की और रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों और भयानक दरिंदगी की घटनाओं से साफ़ इंकार कर दिया। रोहिंग्या मुसलमानों के जातीय व सांप्रदायिक सफ़ाए के बारे में सूकी ने कहा कि मैं एक राजनेता हूं और मार्ग्रेट थैचर के समान नहीं हूं लेकिन दूसरी ओर मैं मदर टेरेसा भी नहीं हूं।

बड़ी हैरत की बात यह है कि सूकी को यह लगता है कि बहुत अधिक हिंसा वहां है जहां मुसलमान हैं। मुसलमान ही मुसलमानों को मार रहे हैं हालांकि वह यह समझतों हैं कि वह अधिकारियों से सहयोग कर रहे हैं। जबकि इससे पहले संयुक्त राष्ट्र संघ भी कह चुका है कि म्यांमार के सरकारी सुरक्षा बलों के हाथों एक हज़ार से अधिक रोहिंग्या मुसलमान मारे गए हैं और एक साल के भीतर 70 हज़ार से अधिक रोहिंग्या मुसलमान अपनी जान बचाने के लिए अपना देश छोड़कर बांग्लादेश तथा अन्य पड़ोसी देशों की ओर भाग निकलने पर मजबूर हुए हैं। सूकी ने इस साक्षात्कार में म्यांमार में किसी भी प्रकार के जातीय सफ़ाए की बात मानने से इंकार कर दिया और कहा कि इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग म्यांमार के साथ अन्याय है।

इस बड़े पैमाने पर प्रतिक्रियाओं के बावजूद कुछ संस्थाओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने बड़ी ख़ामोशी से रोहिंग्या मुसलमानों की ज़मीनें हड़पे जाने का मुद्दा बिल्कुल अनदेखा कर दिया। म्यांमार की सेना ने 1990 से ज़मीनें हड़पने का सिलसिला शुरू किया। वर्ष 2012 में म्यांमार में क़ानून में बदलाव किया गया जिसके बाद विदेशी निवेशकों के लिए म्यांमार के दरवाज़े खुल गए। 30 मार्च 2012 को संसद ने कृषि व बंजर ज़मीनों के क़ानून में संशोधन को स्वीकृति दे दी इसके बाद विदेशी निवेश के क़ानून में भी बदलाव किया गया और नए क़ानून के आधार पर विदेशी कंपनियों को सत्तर साल के लिए म्यांमार में भूमियों के संपूर्ण मालेकाना अधिकार मिल सकते हैं। इसी साल किसानों के संबंध में वर्ष 1963 में बनाया गया क़ानून भी निरस्त कर दिया गया जो छोटी छोटी ज़मीनों के मालिक छोटे किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया था।

इसके बाद म्यामांर में बड़े पैमाने पर लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भगाया गया। इसकी चपेट में कुछ बौद्ध भी आए लेकिन मुख्य रूप से रोहिंग्या मुसलमानों को इसका दंश झेलना पडा और वह उन भूमियों से भी वंचित कर दिए गए जिन पर वह कई नस्लों से खेती करते आए थे। हालिया वर्षों में म्यांमार में खदानों और खनिज जल के उद्योग में विदेशी निवेश बहुत अधिक बढ़ा है जबकि सरकार ने पैदावारी क्षेत्र में निवेश पर अधिक ध्यान नहीं दिया है जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा हो सकते थे। जैसे कि यादना पाइपलाइन परियोजना पर एक अरब डालर से अधिक का ख़र्च आ रहा है लेकिन इससे केवल 800 लोगों को काम मिलने की संभावना है। कृषि भूमियों के अनेक सौदों की अपनी विशेष शर्ते हैं। स्थानीय सैनिक कमांडरों तथा ग़ैर सरकारी हथियार बंद गुटों की निगरानी में ज़मीनों के सौदे हो रहे हैं।

इन हालात में देखने में आ रहा है कि म्यांमार में जब से विदेशी निवेशकों का आगमन हुआ है कृषकों की भूमि हड़पने की प्रक्रिया शुरू हो गई है और इस मुद्दे को लेकर विवाद भी फूट पड़ा है। यह प्रक्रिया इस तरह से अंजाम पायी कि विदेशी निवेशक म्यांमार पहुंचे, उन्होंने अधिक से अधिक ज़मीनें अपने क़ब्ज़े में लेने के प्रयास शुरू किए। इस तरह देखा जा रहा है कि रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध म्यांमार की सरकार ने जो साज़िश रची है उसका लक्ष्य उनकी ज़मीनें हड़पना है लेकिन इसे सांप्रदायिक और जातीय रंग देकर लोगों का ध्यान अपनी असली मंशा से हटाना है ताकि स्थानीय लोगों की ओर से सरकार की परियोजनाओं के रास्ते में कोई रुकावट न डाली जाए। सरकार चाहती है कि उन क्षेत्रों को पूरी तरह ख़ाली करवा ले जहां खनिज जल के बड़े भंडार हैं। घरों को आग लगा देने के पीछे यह प्रयास है कि स्थानीय निवासी कभी वापस आने का प्रयास न करें और लौटने की उम्मीद मर जाए।