#र्इमान का अर्थ : र्इमान के बिना कोर्इ मनुष्य मुस्लिम नही हो सकता!

#र्इमान का अर्थ : र्इमान के बिना कोर्इ मनुष्य मुस्लिम नही हो सकता!

Posted by

Sikander Khanjada Khan
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र्इमान का अर्थ जानना और मानना हैं। जो व्यक्ति र्इश्वर के एक होने को और उसके वास्तविक गुुणों और उसके नियम और उसके दण्ड और पुरस्कार को जानता हो और दिल से उसपर विश्वास रखता हो उसको मोमिन (र्इमान रखनेवाला) कहते हैं। र्इमान का परिणाम यह हैं कि मनुष्य मुस्लिम अर्थात् अल्लाह का आज्ञाकारी और अनुवर्ती हो जाता हैं।

इंसान की इस परिभाषा से आप स्वयं समझ सकते हैं कि र्इमान के बिना कोर्इ मनुष्य मुस्लिम नही हो सकता। इस्लाम और र्इमान में वही सम्बन्ध हैं जो वृक्ष और बीज में होता हैं। बीज के बिना तो वृक्ष उग ही नही सकता। हॉं, यह अवश्य हो सकता हैं कि भूमि में बोया जाए, परन्तु भूमि ख़राब होने के कारण या जलवायु अच्छी प्राप्त न होने के कारण वृक्ष दोषयुक्त उगे। ठीक इसी प्रकार यदि कोर्इ व्यक्ति सिरे से र्इमान ही न रखता हो तो यह किसी तरह संभव नही कि वह ‘‘मुस्लिम’’ हो। हॉ,, यह अवश्य संभव हैं कि किसी के दिल में र्इमान हो परन्तु अपने संकल्प की कमज़ोरी या अपूर्ण शिक्षा-दीक्षा और बुरे लोगों के साथ प्रभाव से वह पूरा और पक्का मुस्लिम न हों।

र्इमान और इस्लाम की दृष्टि से समस्त मनुष्यों की चार श्रेणियॉ हैं:
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1-जो र्इमान रखते हैं और उनका र्इमान उन्हे र्इश्वर के आदेशों का पूर्ण रूप से अनुवर्ती बना देता हैं। जो बात र्इश्वर का नापसन्द है वे उससे इस तरह बचते हैं जैसे कोर्इ व्यक्ति आग को हाथ लगाने से बचता हैं और जो बात र्इश्वर को पसन्द हैं उसे वे ऐसे शौंक़ से करते हैं जैसे कोर्इ व्यक्ति दौलत कमाने के लिए शौंक़ से काम करता हैं। ये वास्तविक मुस्लिम हैं।

2-जो र्इमान तो रखते है परन्तु उनके र्इमान में इतना बल नही कि उन्हें पूर्ण रूप् से अल्लाह का आज्ञाकारी बना दें। ये यद्यपि निम्न श्रेणी के लोग हैं, परन्तु फिर भी मुस्लिम ही हैं। ये यदि र्इश्वरीय आदेशों की अवहेलना करते हैं तो अपने अपराध की दृष्टि से दंड के भागी हैं, परन्तु उनकी हैसियत अपराधी की है विद्रोह की नही हैं। इस लिए कि ये सम्राट को सम्राट मानतें हैं और उसके का़नून का कानू़न होना स्वीकार करते हैं।

3-वे जो र्इमान नही रखते परन्तु देखने में वे ऐसे कर्म करते हैं जो र्इश्वरीय का़नून के अनुकूल दिखार्इ देते हैं। ये वास्तव में विद्रोही हैं। इनका वाहय सत्कर्म वास्तव में र्इश्वर का आज्ञापालन और अनुवर्तन नही हैं। अत: इसका कुछ भी मूल्य नही। इनकी मिसाल ऐसे व्यक्ति जैसी हैं जो सम्राट करे सम्राट नही मानता और उसके का़नून को का़नून ही नही स्वीकार करता। यह व्यक्ति यदि देखने में कोर्इ ऐसा काम कर रहा हो जो क़ानून के विरूद्धन हो, तो आप यह नही कह सकते कि वह सम्राट के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करनेवाला और का़नून का अनुवर्ती हैं।उसकी गणना तो प्रत्येक अवस्था में विद्रोहियों में ही होगी।
4-वे जो र्इमान भी नही रखते और कर्म की दृष्टि से भी दुष्ट और दुराचारी हैं, ये निकृष्टतम श्रेणी के लोग हैं, क्योकि ये विद्रोही भी हैं और बिगाढ़ पैदा करने वाले भी।

मानवीय श्रेणी के इस वर्गीकरण से यह बात स्पष्ट हो जाती हैं कि र्इमान वास्तव में मानवीय सफलता का आधार हैं। इस्लाम, चाहे वह पूर्ण हो या अपूर्ण, केवल र्इमान रूपी बीज से पैदा होता हैं। जहॉ र्इमान न होगा, वही र्इमान की जगह कुफ्र होगा जिनका दूसरा अर्थ र्इश्वर के प्रति विद्रोह हैं, चाहे निकृष्टतम कोटि का विद्रोह हो या न्यूनतम स्तर का।