लाल सागर में सैन्य अड्डे के पीछे सऊदी और इमारात का लक्ष्य क्या है?

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लाल सागर में अनेक देशों की ओर से सैन्य अड्डे बनाए जाने के बाद यह प्रश्न उठने लगा है कि इस क्षेत्र में क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों की ओर से सैन्य अड्डे बनाने में होड़ की वजह क्या है?

लाल सागर दुनिया के सबसे अहम जल मार्गों में से एक है क्योंकि यह एशिया, अफ़्रीक़ा और यूरोप जैसे तीन महाद्वीपों को जोड़ता है और जहाज़रानी व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में इसकी अत्यंत अहम भूमिका है। यही कारण है कि क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां पिछले दशकों में इस जल मार्ग में अपने प्रभाव व उपस्थिति को मज़बूत बनाने की कोशिश करती रही हैं। अलबत्ता हालिया कुछ वर्षों में रेड सी या लाल सागर में सैन्य उपस्थिति और इसमें सैन्य अड्डे बनाने के लिए इन शक्तियों के बीच होड़ सी मची हुई है जिसके अनेक कारण हैं। एक अहम वजह तो यही है कि इसमें सैन्य छावनी बनाने वाला हर देश अपने हितों और लक्ष्यों को पूरा करना चाहता है लेकिन सबसे बड़ी वजह वर्ष 2010 में अरब देशों में जनांदोलनों के कारण पैदा होने वाले परिवर्तन हैं।

वर्ष 2010 में अनेक अरब देशों में आने वाले परिवर्तनों के बाद अनेक क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों ने इस इलाक़े में अपनी उपस्थिति को मज़बूत बनाने की कोशिश शुरू कर दी। यमन की समस्याएं और इस देश पर होने वाले सैन्य हमले और सऊदी अरब और क़तर के संबंधों में आने वाले संकट ने इस क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति को बहुत अहम बना दिया। इस बीच संयुक्त अरब इमारात ने एरिट्रिया में असब की बंदरगाह पर सैन्य छावनी बनाने की कोशिश की ताकि उससे यमन के ख़िलाफ़ युद्ध में अरब गठजोड़ के सैनिकों की लाॅजेस्टिक मदद की जा सके। उसने इसी तरह सोमालिया में भी सैन्य अड्डा बनाने का समझौता किया जबकि सऊदी अरब ने जिबूती के साथ एेसा ही समझौता किया। फ़ार्स की खाड़ी के तटवर्ती इन दोनों अरब देशों ने यमन के ख़िलाफ़ युद्ध में अपनी पोज़ीशन मज़बूत बनाने और पूर्वी यूरोप में ईरान के तथाकथित प्रभाव को रोकने के लिए ये क़दम उठाए। इसके अलावा हालिया वर्षों में तुर्की ने भी अफ़्रीक़ा विशेष कर पूर्वी अफ़्रीक़ा के देशों से अपने संबंध मज़बूत बनाने की कोशिश शुरू कर दी।

लाल सागर में सैन्य ठिकानों की संख्या में वृद्धि, अरब देशों के क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर रही है क्योंकि ये देश लाल सागर में ईरान के प्रभाव को कम करने की सिर तोड़ कोशिश कर रहे हैं लेकिन वे ये भी नहीं चाहते कि तुर्की उसका स्थान ले ले विशेष कर इस लिए भी कि क़तर के साथ सऊदी गठजोड़ के संबंधों में टकराव में अन्कारा ने दोहा से गठजोड़ कर लिया है। इस बीच अगर इस बात को ध्यान में रखा जाए कि सूडान और सोमालिया जैसे कुछ अफ़्रीक़ी देश इस संकट के संबंध में निष्पक्ष रहे हैं तो इस बात की संभावना है कि क़तर, पूर्वी अफ़्रीक़ा में अपना स्थान पुनः हासिल कर ले विशेष कर इस लिए कि वह हालिया वर्षों में इस क्षेत्र के संकटों में मध्यस्थता के प्रयास में रहा है। इन सब बातों के दृष्टिगत लाल सागर का महत्व बड़ी हद तक स्पष्ट हो जाता है।

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