वह मुसलमानों को अपने पांव पर खड़ा देखना चाहता था : काश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उसकी : अल्लामा की बहुत ख़ास तस्वीरें

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Naeem Akhtar
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वह एक फल सफी था
यूरोप में तालीम हासिल करता था मगरीबी उलूम का एक समंदर अपने हलक में उतार चुका था
अंग्रेजों के दरमियान रहता था
पैंट कोट पहनता था
लेकिन
उसका दिल मुसलमानों के साथ धड़कता था वह सिर्फ पांच वक्त का नमाज़ी ही नहीं तहज्जुद गुज़ार भी था
वह इतनी दिलचस्पी और एक सुई से कुरान पाक की तिलावत करता कि आंसुओं की लड़ी जारी हो जाती मुकद्दस औराक़ भीग जाते
उसे उम्मत ए मुस्लिमा की तारीख और उसके उरोज व ज़वाल से शदीद दिलचस्पी थी
वह मुसलमानों की निशाह सानिया चाहता था
वह मुसलमानों को अपने पांव पर खड़ा देखना चाहता था
वह मुसलमान नौजवानों को शाहीन का किरदार देना चाहता था
उसने अपना पैगाम दुनिया तक पहुंचाने के लिए शायरी का सहारा लिया
लेकिन उस का पैगाम कुरान और हदीस का पैगाम ही था

उसकी शायरी के अक्सर मिसरों में कुरानी आयात या उन का तर्जुमा वाजह तौर पर नजर आता है जो बात रबता आला कुरान मजीद में समझाना चाहता है वही बात उसने अशआर की शक्ल में बयान कर दी मगरीबी ऊलूम में माहिर होने के बावजूद उसका अक्सर कलाम फारसी में और कुछ कलाम उर्दू में है सिर्फ शायरी ही नहीं उसने उम्मत ए मुस्लिमा को मुत्तहिद करने के लिए पाकिस्तान का ख्वाब दिया और जब मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों के मुस्तकबिल से मायूस होकर इंग्लैंड वापस लौट गए थे तब वही था जो उनकी मिन्नतें करके उन्हें दोबारा वापस ले आया था वह जब भी कुरान पढ़ता चश्म तसव्वुर से यजदां मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम, जिब्रील अलैहिस्सलाम, आदम अलैहिस्सलाम व हजरत हौव्वा, इब्राहिम अलैहिस्सलाम व इस्माइल अला नबीयना, खिजर मूसा कलीमुल्लाह सुलेमान अलैहिस्सलाम व यूसुफ अलैहिस्सलाम जैसे किरदार देखता उसी चश्मा तसव्वुर के बल पर वह अपने अशआर और मिसरों से कुरानी आयात को मोज़य्यन करता और कुरानी आयात के मफ़हूम को बयान करता

वह जब भी तारीख पढ़ता बदर व हुनैन, क़ादसिया व यरमुक़ मिस्र वो शाम चीन वह अरब मराकश व अंदलुस उस कुरतबा व बगदाद के तमाम जंगी वाक्यात व फतुहात अपने सामने महसूस पाता वह फतूहात पर मुसर्रत भरे शेर लिखता और किसी साँहा पर अपनी कलम से आंसू बहाता और उन्हें अशआर की शक्ल में सफहात पर तरतीब देता माजी की यादों से लौट कर जब वह दोबारा हाल में आता अपनी कौम के हाल और उस कौम के मुस्तकबिल के बारे में सोचता तो कुछ मजीद कर गुजरने का जज्बा उसके दिल में पैदा होता और वह अपने अशआर के जरिया दोबारा नई शिद्दत के साथ झीनझोड़ झीनझोड़ कर अहले इस्लाम को बेदार करने की कोशिश करता उसने अपनी दिली कैफियत खुद अपने अशआर में बयान की उसने अपने आप को एक उजड़े हुए गुलिस्तान का बुलबुल कहा की जिसके सीने में हवादसात ए से दौरां के बावजूद नगमा का तला तुम मौजूद है और जिस की तबीयत कैद मौसम से आजाद हैं

हुये गुल ले गयी बैरून ए चमन, राज़ ए चमन
क्या क़यामत है कि खुद फूल हैं गमाज़ ए चमन

अहद ए गुल खत्म हुआ टूट गया साज़ ए चमन
उड़ गये डालियों से ज़मज़मा परवाज़ ए चमन

एक बुलबुल है कि बे महू ए तरन्नुम अब तक
उसके सीने में है बे नग़मों ख्वां तलातुम अब तक

क़मर यां शाख़ ए सनोबर से गुरेज़ा भी हुईं
पत्तियां फूल झड़ झड़ के परेशां भी हुईं

वह पुरानी रविशें बाग़ की वीरां भी हुईं
डालियां पैरहन ए बर्ग से अरियाँ भी हुईं

क़ैद मौसम से तबियत रही आज़ाद उसकी
काश गुलशन में समझता कोई फरियाद उसकी

(उर्दू से हिंदी किया गया)
(तहरीर सलीमुल्लाह सफ़दर )

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