वाले दाग़िस्तानी के नाम से मशहूर महान कवि, इतिहासकार, बुद्धिजीवी ‘अलीक़ोली ख़ान वज़ीरी’ के बारे में जानिये : पार्ट 3

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अली कुली खान उर्फ वाले दागिस्तानी सन 1124 हिजरी कमरी में सफर के महीने में इस्फहान में पैदा हुए।

उनके पिता मुहम्मद अली खान को शाह सफवी की ओर से परिवार के साथ ईरवान भेजा गया लेकिन पिता की मृत्यु के बाद, वाले, परिवार के साथ इस्फहान लौट आए और अपने चाचा, हसन अली खान की निगरानी में उस समय के इस्फहान के बड़े बड़े बुद्धिजीवियों से ज्ञान प्राप्त करना आरंभ कर दिया। उन्होंने कुरआने मजीद की शिक्षा प्राप्त करने के बाद, बहुत ही कम समय में अपनी विलक्षण बुद्धि के कारण उस काल में प्रचलित ज्ञान तथा अरबी फारसी व साहित्य व इतिहास का भरपूर ज्ञान प्राप्त कर लिया किंतु उनके चाचा को मंत्री पद से हटाए जाने की वजह से आगे शिक्षा जारी रखना उनके लिए असंभव हो गया। वाले , अपने चाचा की बेटी, खदीजा सुलतान से बेहद प्रेम करते थे लेकिन महमूद अफगान के हमले और इस्फहान पर उसके क़ब्ज़े की वजह से दोनों एक दूसरे से दूर हो गये। यही वियोग, वाले की दुख भरी गज़लों का कारण बना। वाले ने सन 1144 हिजरी कमरी में अर्थात आज से लगभग ढाई सौ साल पहले, ईरान में नादिर शाह के सत्ता में आने के बाद अपना देश छोड़ दिया और वह भारत चले गये जहां वह मुगल शासक मुहम्मद के दरबार से जुड़ गये। वह आखिरी सांस तक ईरान वापसी की इच्छा में तड़पते रहे लेकिन सन 1170 हिजरी क़मरी में मात्र 40 वर्ष की आयु में उनका दिल्ली में निधन हो गया और उन्हें वहीं दफ्न कर दिया गया लेकिन उनकी क़ब्र का किसी को पता नहीं है।

वाले दाग़िस्तानी की बच जाने वाली सब से महत्वपूर्ण रचना, कवियों की जीवनी पर लिखी गयी किताब, रियाज़ुश्शोअरा है। इस किताब को, फारसी में लिखी गयी जीवनियों में विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि ” वाले ” ने इसके लिए संपादन व संकलन की विशेष शैली अपनायी है। साहित्य व भाषा में अध्ययन करने वाले ईरानी व फारसी विशेषज्ञों ने हमेशा ही साहित्य की रचनाओं के साथ ही शायरी और कविता के विभिन्न पहलुओं का आलोचनात्मक जायज़ा भी पेश किया है। उदाहरण स्वरूप इन साहित्यकारों ने कविता के स्थान, कविता के स्वभाव, शैलियों की विविधता व अंतर तथा इस प्रकार के बहुत से विषयों का भले ही सरसरी तौर पर, मगर जायज़ा पेश किया है। जीवनी लिखने के आरंभ के साथ ही आलोचनात्मक विचार पेश करने का एक नया मंच उपलब्ध हो गया जिसे ईरान में साहित्यिक रचनाओं की समीक्षा व आलोचना के क्षेत्र में एक क्रांति के रूप में देखा जाता है। हालांकि जीवनी लिखने वाले जो आलोचना लिखते हैं वे अधिकांश उनके सौन्दर्य बोध से प्रेरित व गैर तकनीकी होती है लेकिन ईरान में उसे साहित्यिक आलोचना की परिपूर्णता की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण समझा जाता है जिसे एतिहासिक जीवनी कहा जाता है। इस नाम की वजह भी यह है कि जीवनियों में अधिकांश लेखक का ध्यान, रचनाकार , उसके जीवन, शिक्षा, रचनाओं , विचारधारा, व स्वभाव आदि पर केन्द्रित रहता है। जीवनी में मौजूद यह जानकारियां अध्ययन कर्ताओं के लिए अत्याधिक मूल्यवान होती हैं क्योंकि इस प्रकार की मालूमात से उन्हें रचनाओं को समझने में आसानी होती है।

ईरान में जीवनी लेखन कभी किसी प्रक्रिया विशेष के अंतर्गत आगे नहीं बढ़ी बल्कि उसमें काफी उतार चढ़ाव, और बदलाव देखने में आए यहां तक कि वह साहित्यिक इतिहास के चरण से निकल कर साहित्यिक आलोचना के चरण तक पहुंच गयी। जीवनियों के अध्ययन से पता चलता है कि आरंभ में रचनाकार के बारे में केवल एतिहासिक जानकारियां ही उपलब्ध करायी जाती थीं और स्वंय रचना के बारे में बहुत कम बात की जाती थी । इस काल में रचना के बारे में राय या तो प्रकट नहीं की जाती थी और यदि कोई ऐसा करता भी था तो वह आंशिक रूप से होता था लेकिन समय के साथ धीरे धीरे उसमें आलोचना का तत्व भी शामिल हो गया और कवियों की जीवनियों में उनकी रचनाओं पर भी विचार प्रकट किये जाने लगे। धीरे धीरे इस प्रक्रिया में गहनता आती गयी और जीवनी लिखने वाले, उदाहरणों के साथ सटीक आलोचना करने लगे। बारहवीं हिजरी कमरी सदी में लिखी गयी जीवनियों में इस प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

वाले दागिस्तानी, ने रियाज़ुश्शोअरा नामक जीवनी सन 1161 हिजरी क़मरी में लिखी। उस समय उनकी उम्र 37 साल थी। इस किताब में एक प्रस्तावना और आठ अध्याय हैं और अंत में रचनाकार के बारे में विस्तार से बताया गया है। उसकी भाषा , उस के लिहाज़ से बेहद सादा व सरल है। इस जीवनी में फार्सी के लगभग 2594 कवियों की जीवनियों का उल्लेख है। ” वाले ” ने कवियों के नाम के लिए वर्णमाला के अक्षरों के हिसाब से लिखा है और उनकी नज़र में जिन कवियों की कविताएं अच्छी नहीं थीं, उनका नाम ही नहीं लिया है। नाम लिखने में उन्हों ने शायरी के लिए प्रयोग किये जाने वाले उपनाम अर्थात तख़ल्लुस को ध्यान में रखा है और यदि उपनाम का पता न हो फिर नाम के आधार सूचि तैयार की है। ” वाले ” ने अरबी वर्णमाला के हर अक्षर के लिए एक अध्याय विशेष किया है और उसे ” रौज़ा” अर्थात ” गुलशन” का नाम दिया है इस प्रकार के उनकी किताब 28 गुलशनों या बागों पर आधारित है। अंत में ” वाले” ने स्वंय अपनी जीवनी लिखी है और एक हिस्से में ईश्वर के प्रति आभार प्रकट किया है कि उसने इस रचना में उनकी मदद की। उन्होंने अपनी रचना की कमियों और अच्छाइयों को गिनाते हुए पाठकों से अनदेखी करने की भी अपील की है।

वाले दागिस्तानी की शैली इस प्रकार से है कि वह कवि का उल्लेख करत हुए उसके कुछ उपनाम लिखते हैं और फिर उसके बारे में कुछ विस्तार से बताते हैं। यह सब कुछ वह उस काल ही नहीं बल्कि आज के युग के हिसाब से भी अत्यन्त सरल भाषा में लिखते हैं। उसके बाद , उदाहरण के लिए कवि का कोई एक शेर लिखते हैं और अगर ज़रूरी समझते हैं तो उस शेर पर भी चर्चा करते हैं । शेर के लिए भी उनका प्रयास यह होता है कि शायर ने जिन जिन शैलियों में शेर कहे हैं उन सब में से एक एक उदाहरण का उल्लेख अवश्य हो। इसके अलावा कभी कभी वह शेर का उल्लेख करने के बाद उसके शेर से संबंधित कई अन्य प्रकार की मालूमात भी लिखते हैं अलबत्ता कवियों के जनम और मरण दिन के बारे में वह कमज़ोर थे और इस संदर्भ में वह अपने समकालीन कवियों के बारे में अत्याधिक मालूमात रखते थे जिसका अंदाज़ा उनकी किताब पढ़ कर किया जा सकता है।

वाले ने इतनी बड़ी और भारी किताब लिखने के लिए कई स्रोतों से लाभ उठाया जिसका उल्लेख उन्होंने किताब में और उसकी भूमिका में भी किया है। एक जगह उन्होंने लिखा हैः यह पन्ने लिखते समय मैं दक्ष शायरों के शेरों के संकलनों और पहले और बाद के बहुत से लोगों की लिखित जीवनियों, इतिहास की किताबों जैसे नफहात व मजालिसुलउश्शाक़ से लाभ उठाया है। इन किताबों में जो विचारों का अंतर पाया गया उसे यथासंभव दूर करने का प्रयास किया गया है और नफहात आदि जैसी जो किताबें विश्वस्त थीं उन पर ध्यान दिया गया और उनमें उल्लेखित बातों के विपरीत चीज़ों की अनदेखी की गयी।

वाले ने अपना रचना के अधिकांश भागों को लिखते समय तक़ी औहदी द्वारा लिख गयी जीवनी, अरफातुल उश्शाक़ से लाभ उठाया है लेकिन इसके बावजूद बहुत से अवसरों पर इस किताब और उसके लेखक को आड़े हाथों भी लिया है। यहां तक कि कुछ अवसरों पर तो जब वह लुबाबुल अलबाब , और मजालिसुन्नफाइस जैसी किताबों का हवाला देते हैं तो उससे सिद्ध होता है कि उन्होंने अरफातुल आशेक़ीन से भी लाभ उठाया है।