वो जो मैदान में डट जाते थे और जिनके सामने शेरों के भी पैर उखड़ जाते थे, वो कौन से मुसलमान थे?

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Sikander Kaymkhani
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वो जो मैदान में डट जाते थे और जिनके सामने शेरों के भी पैर उखड़ जाते थे वो कौन से मुसलमान थे? यक़ीनन तातार, ख़ुरासानी, अफग़ान (पश्तून, हज़ारा, ताज़िक, मुग़ल), तुर्क, उज़बेक और अरब। इसकी वजह ये है कि उनके यहां न खेती की ज़मीनें थीं और न उस ज़माने में पेट्रोल इंसानी ज़रूरत बना था। दूर तक रेतीले मैदान, पथरीले पठार और नमक के सहरा। खेती करने के लिए पत्थर तोड़ने पड़ते थे और ज़मीन का सीना चीरकर पानी निकालना पड़ता था।

जो पढ़ लिख जाते थे या किसी कला में माहिर होते थे वो शहरों की तरफ कूच कर जाते थे। यानि व्यापार और लूट में शामिल होने के अलावा लोगों के पास बहुत ही सीमित विकल्प थे दुनिया में बने रहने के। इसपर भी मंगोल, रोमंस, ग्रीक और मध्य एशियाई क़बीलों का सामना। मज़बूत लोग फौज में भर्ती हो जाते थे, दिमाग़दार सरकारी नौकरी करते थे या पढ़ने पढ़ाने में मौक़ा तलाशते थे, जिनका मन कला में था वो कलाकार बन जाते थे और बाक़ी मज़दूर और खेतिहर।

यानि आर्थिक ज़रूरत और भौगोलिक परिस्थितियों ने विकल्प बेहद सीमित कर रखे थे और उनमें ही गुज़र था। ऊपर से टीवी, ट्विटर और फेसबुक भी नहीं आए थे जो समय कट जाता। ऐसे में लोगों ने अपनी रुचि और उपलब्धता के हिसाब से काम चुने। कलाकारों ने शानदार कृतियाँ बनाईं, शहर सजाए, बुख़ारा से बग़दाद तक शानदार इमारतें बनाईं। बड़े-बड़े साम्राज्य खड़े किए। और फिर इसके बाद मुसलमान भाग्य से हिंदुस्तान आ गए। पत्थरों पर सोने वाले बाबर ने पाया कि यहां तो दो गांव का राजा क़िला बनाता है और पांच गांव का राजा महल खड़े करता है।

बलबन को पता चला कि गंगा जमुना के दोआब में खेती के लिए पसीना बहाने की ज़रूरत नहीं है। अफग़ान समझ गए कि यहां ज़मीन पर लेटकर भी गद्दे वाला फील आता है। ईरानियों को महसूस हुआ कि बिना ख़ून ख़राबे के यहां राजकाज चलाया जा सकता है। समय के साथ ये सब आराम-तलब यानि हरामख़ोर हो गए। रही सही कसर भारत के नए-नए बने मुसलमानों ने पूरी कर दी। इनमें ज़्यादातर या तो बरसों से ग़ुलामी के आदी दलित थे या दरबारी चाटुकार सवर्ण।

ऐश, आराम, दरबार और चाटुकार मिले तो जो पत्थर का सीना चीरते थे वो पत्थर पर शराब की बोतलें तोड़ने लगे। पत्थरों पर सोने वाले गद्दों पर ऐसा सोए कि आज तक उनकी नींद नहीं टूटी। वो जो सौ-सौ फीट ऊंची इमारतें बनाते थे वो सौ -सौ गज़ ज़मीन के लिए लड़कर ढेर होने लगे। ये सब चल ही रहा था कि अंग्रेज़ आ गए। जो दरबारी चाटुकार थे उन्होंने पाला बदल लिया लेकिन जो हुनर की खाते थे उनमें से ज़्यादातर तब तक अपने हुनर भूल चुके थे।

ज़ैग़म मुर्तज़ा
अब न पढ़ाई से वास्ता रहा था, न कला से और न हथियारों से। सो कुछ ने चाटुकार गैंग में तो कुछ ने दासता गैंग में शामिल होकर अपनी रोज़ी रोटी की ज़रूरतें पूरी कीं। लड़ने वाले मुट्ठी भर बचे थे। इनमें कुछ 1857 में ख़त्म हो गए और जो बचे 1947 में पाकिस्तान चले गए। यहां बचे रोटी, निवाले, टुकड़े, पैसे, धेले और झूठे दिखावे पर ईमान गंवाने वाले लोग।