*”शाम ए करबला”* असबाबे शहादत【 पोस्ट -1】

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Firoj Khan
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असबाबे शहादत:

जब कोई चीज यकीनी होने वाली होती है तो उसके होने असबाब भी पैदा हो जाते हैं इमाम आली मकाम की शहादत के असबाब इस तरह पैदा हुए कि जब 60 हिजरी में हजरत अमीर मुआविया रजि अल्लाहु अन्हु का इंतकाल हुआ और यजीद( जिसके लिए वह अपनी जिंदगी ही में बैअत ले चुके थे) उनका जानशीन हुआ। तख्ते हुकूमत पर बैठने के बाद उसके लिए सबसे अहम मसला हजरत इमाम हुसैन हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबेर और हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम की बैअत का था। क्योंकि इन हज़रात ने यज़ीद की वली अहदी को तस्लीम नही किया था। अलावा अज़ी इन हज़रात से यज़ीद को यह
भी ख़तरा था कि कहीं उनमें से कोई ख़िलाफ़त का दावा न कर दे और ऐसा न हो कि सारा हिजाज़ मेरे खिलाफ उठ खड़ा हो और हज़रत इमाम हुसैन के दाव ए ख़िलाफ़त की सूरत में इराक में बगावत का सख्त अंदेशा था। इन वज़ह की बिना पर यज़ीद के पेशे नज़र सबसे बड़ा मसाला अपनी हुकूमत की बका और तहफ़्फ़ुज़ का था। इसलिए उसने उन हज़रात से बैअत लेना जरूरी समझा। चुनांचे उसने वलीद बिन उकबा गवर्नर मदीना को अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की वफात की खबर दी और साथ ही उन हज़रात से बैअत लेने के लिए सख्त ताकीदी हुक्म भेजा।

तर्जुमा- “पस हुसैन, अब्दुल्ला बिन उमर और इब्ने जुबैर को बैअत के लिए इस तरह पकड़ो की जब तक बैअत न कर लें मुतलक़ न छोड़ो। रेफेन्स-( इब्नुल- असीर स० 4/4)

अभी तक अहले मदीना को अमीर मुआविया की वफात की खबर ना थी वलीद यजीद के इस हुकुम से बहुत घबराया क्योंकि उसके लिए उसकी तमिल बहुत मुश्किल थी और उसके अंजाम को भी अच्छी तरह समझता था उसने अपने नाइब मरवान बिन हकम को बुलाया और उस से इस मुआमले में मशवरा तलब किया मरवान संगदिल और सख्त मिजाज था उसने कहा मेरी राय यह है कि उन तीनों को इसी वक्त बुलाएं और बैअत का हुकुम दें अगर वह बैअत कर लें तो बेहतर और अगर वह इंकार करें तो तीनों का सर कलम कर दो अगर तुमने ऐसा ना किया तो जब उनको वफाते मुआविया की खबर मिलेगी यह तीनों एक एक मकाम पर जाकर मुद्दई खिलाफत बनकर खड़े हो जाएंगे फिर उन पर काबू पाना सख्त मुश्किल हो जाएगा अलबत्ता इब्ने उमर को मैं जानता हूं उनसे तवक्को कम है वह जिदाल व किताल करना नहीं चाहते सिवाय इसके कि यह अम्र ए खिलाफत खुद-ब-खुद उनको दे दिया जाए।

इस मशवरा के बाद वलीद ने उन तीनों हजरात को बुला भेजा इस वक्त इमाम हुसैन और अब्दुल्लाह बिन जुबेर दोनों मस्जिद-ए-नबवी में थे और वह वक्त भी ऐसा था कि उसमें वलीद किसी से मिलता मिलाता ना था। काशिद ने उन दोनों को अमीर का पैगाम दिया उन्होंने काशिद से कहा तुम चलो हम अभी आते हैं इब्ने जुबेर ने इमाम से कहा आपका क्या ख्याल है अमीर ने ऐसे वक्त में जब कि वह किसी से मिलते मिलाते नहीं हमें क्यों बुलाया है इमाम ने फरमाया मेरा यह गुमान है कि अमीर मुआविया फ़ौत हो गए हैं और हमें इसलिए बुलाया है कि उनकी वफात की खबर आम होने से पहले वह हमसे यजीद की बैअत ले लें। इब्ने जुबेर ने कहा मेरा गुमान भी यही है अब आपका क्या इरादा है फरमाया मैं अपने चंद जवानों को साथ लेकर जाता हूं क्योंकि इनकार की सूरत में हो सकता है कि मामला नाजुक सूरत इख्तियार कर जाए चुनाचे अपनी हिफाजत का सामान करके वलीद के पास पहुंचे और मकान के बाहर अपने जवानों को मुतऐयन कर दिया और उनसे कहा कि अगर मैं तुम्हें बुलाऊं या तुम सुनो कि मेरी आवाज बुलंद हो रही है तो फौरन अंदर आ जाना और जब तक मैं बाहर ना आऊं यहां से हरगिज ना सरकना आप अंदर गए और सलाम के अल्फाज कह कर बैठ गए वलीद ने आपको अमीर मुआविया की वफ़ात की खबर सुनाई और यजीद की बैअत के लिए कहा आपने ताजियत के बाद फरमाया मेरे जैसा आदमी इस तरह छुपकर बैअत नहीं कर सकता और ना मेरे लिए इस तरह खुफिया बैअत करना मुनासिब है अगर आप बाहर निकलकर आम लोगों को और उनके साथ हमें भी बैअत की दावत दे तो यह एक बात होगी। वलीद अमन और सुलह पसंद आदमी था। उसने कहा अच्छा आप तशरीफ ले जाएं आप उठ कर चले तो मरवान ने बहुत बेरहम होकर वलीद से कहा अगर तुमने इस वक्त इनको जाने दिया और बैअत न ली तो फिर उन पर काबू न पा सकोगे ता वक्त की बहुत से लोग कत्ल ना हो जाए इनको कैद कर दो अगर यह बैअत कर लें तो खैर वरना इनको कत्ल कर दो इमाम यह सुनकर खड़े हो गए और फरमाया ऐ इब्नुज्जरका क्या तू मुझे कत्ल करेगा या यह करेंगे खुदा की कसम तू झूठा है मक्कार है। यह कहकर आप तशरीफ ले आए।

मरवान ने वलीद से कहा तुमने मेरी बात न मानी। खुदा की कसम अब तुम उनपर काबू नही पा सकोगे यह बेहतरीन मौका था कि तुम उनको कत्ल कर देते वलीद ने कहा तुम पर अफसोस तुम मुझे ऐसा मशवरा दे रहे हो जिसमें मेरे दीन की तबाही है। क्या में सिर्फ इस वज़ह से “नवास ए रसूल” को कत्ल कर देता की वह यज़ीद की बैअत नही करते। अगर मुझे दुनिया भर का माल व मता मिल जाये तो भी में उनके खून से अपने हाथों को आलूदा न करूं। खुदा की कसम क़यामत के दिन जिस से ख़ूने हुसैन की बाज़ पुर्स होगी वह जरूर अल्लाह के सामने ख़फ़ीफुल-मीज़ान होगा। मरवान ने कहा तुम ठीक कहते हो उसने सिर्फ जाहिरदारी के लिहाज से कह दिया था वरना दिल में वलीद की बात को नापसंद करता था।

रेफेन्स-(इब्ने असीर, व तबरी)

वलीद के पास से वापस आने के बाद इमाम आलि मकाम सख्त कशमकश में मुब्तिला थे यज़ीद की बैअत आपको कलबी तौर पर सख्त नापसंद थी क्योंकि वह न’अहल था और उसका तकरूरर भी खुल्फा ए राशिदीन के इस्लामी तरीके ए इंतिख़ाब के बिल्कुल खिलाफ और गैर-शरई तौर पर हुआ था बल्कि आपके नजदीक यह कैसर व किसरा के तर्ज की पहली सख्सी हुकूमत थी। इस लिए आप एहतिजाज़न उसके खिलाफ थे और दूसरी तरफ हालात इज़ाज़त नही देते थे कि आप अल्ल-एलान उसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करें। उधर अब्दुल्ला बिन ज़ुबैर तरह तरह के हिलों से वलीद के कासीदों को टालते रहे और वलीद के पास न आए और दूसरे दिन मदिना मुनव्वरा से मक्का मुकर्रमा को निकल गए। वलीद का अमला सारा दिन उनकी तलाश में सरगरदां रहा मगर वह न मिल सके।
उधर शाम के वक़्त फिर वलीद ने इमाम के पास आदमी भेजा। आपने फरमाया इस वक़्त तो मैं नही आ सकता और सुबह होने दो फिर देखेंगे क्या होता है। वलीद ने यह बात मान ली और आपने उसी रात अपने अहल व अयाल और अज़ीज़ व अकारिब को साथ लेकर मदीना मुनव्वरा से मक्का मुकर्रमा की तरफ हिजरत का इरादा कर लिया। घर वालो को फरमाया की तुम तैयारी करो और आप खुद मस्जिद ए नबवी शरीफ में रोज़ा ए रसूल(सल्लल्लाहु व अलैही वसल्लम) पर हाज़िर हुए। नवाफिल अदा करके जू ही चेहर-ए-रसूल के सामने पहुंच कर दस्त बस्ता सलाम के अल्फ़ाज़ अदा किए बेसाख्ता आंखों से अश्क रवां हो गए।

जवारे रसूल से दूरी और शहरे रसूल से जुदाई के गम अंगेज़ ख्याल ने आप पर रिक्कत तारी कर दी। यही वह शहर था जिसमें आपने उम्र ए अजीज का अब तक बेश्तर हिस्सा गुजारा था बचपन से अब तक उसी शहर की पुर नूर फिज़ाओ और मुअत्तर हवाओ में रोज़ व शब का सिलसिला रहा था। यह शहर आपके नाना जान का शहर था। आप इस गुलशन ए रसूल के महकते फूल थे मगर अब इस शहर में आपका रहना मुश्किल हो गया था इसी शहर में आपकी वालिदा माजिदा का मदफ़्न था। आपके भाई इसी शहर में आराम फरमा थे उस वक्त इमाम पाक की क्या कैफियत होगी रोजा ए रसूल पर अपने जज्बात व अहसासात का इजहार कर रहे थे, नाना जान के रु-ब-रु अपना अहवाल ब्यान कर रहे थे।

[मज़ारे मुस्तफ़ा पर शाम होते ही इमाम आए
इज़ाज़त की गरज से आखिरी करने सलाम आए
कहा रो कर सलाम ऐ ताजदार आलमे इमकां
सलाम ए सैय्यद आलम सलाम ऐ सरवरे जी शान
ज़रा देखो तो चेहरा से उठा कर ग़ोश ए दामाँ
हुसैन इब्न अली पर तंग हैं तैबा की अब गलियां
ज़रा हुजरा से निकलो ऐ मकीने गुम्बदे खिज़रा
ज़रा देखो तो अहले बैत पर हैं सख्तियां क्या क्या
यजीदी दौर है, इस्लाम है सरकार खतरे में
नवासा आपका इस वक़्त है दुश्मन के नरगे में
में क़ुर्बान ऐ मुझे नाज़ व नेअमत से पालने वाले
मसाइब आने वाले दम जदन में टालने वाले
हमारी बेकसी दरमांदगी की लाज रख लेना
हमे नज़रों में अपनी साहिबे मेअराज़ रख लेना
बस अब ए किब्ला दीं मुझको जाने की इज़ाज़त हो
लबे अतहर से फरमा दो हुसैन अब जाओ रुखसत हो
मदीने से शहे कौनैन का नूरे नज़र निकला
वतन से बे’वतन होकर वतन का ताजवर निकला]

इमाम पाक अपने अहल व अयाल को साथ लेकर मदीना मुनव्वरा से मक्का मुकर्रमा हिजरत कर गए!!!

रेफेन्स-(इब्ने असीर स० 6/4, व तबरी स०190/6)