शाहजहां के ज़माने में कश्मीर के गवर्नर ”अली मरदान खां” ने ‘शिव की स्तुति’ में ये लिखी कविता थी

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अली मरदान खां साहब शाहजहां के ज़माने में कश्मीर के गवर्नर थे. उन्होंने शिव की स्तुति में यह कविता लिखी थी. फारसी में. पेश है —
हुमा असले महेश्वर बूद शब शाए कि मन दीदम (वह वास्तव में महेश्वर थे जिनको मैंने एक रात को देखा)

गज़नफर चरम बरदर (बर-तन) बूद शब शाए कि मन दीदम (उनके शरीर पर शेर की खाल थी जब मैंने उनको उस रात देखा)
उमा अज़ सोए चपबिनगर ज़ि सद ख़ुर्शीद ताबॉतर (उनके बांई ओर उमा पार्वती जी थी जो सैंकड़ों चन्द्रमाओं से भी ज़्यादा चमक रही थी)
मकानश ला-मकान तर बूद शब शाए कि मन दीदम (वह इस संसार “देश और काल” से परे रहने वाले हैं जिनको मैंने उस रात देखा)
ब दसतश आबे कौसर व यख नाकूसो नीलोफर (उनके एक हाथ में अमृत कलश था और दूसरे में शंख और कमल का फूल था)
सवारश कुलबाए नर बूद शब शाए कि मन दीदम (वह एक बैल “नन्दी जी” पर सवार थे जब मैंने उनको उस रात देखा)
से चशमश बर जबीं खुशतर ज़े मेहरो माह रोशन तर (उनके माथे पर एक सुन्दर अॉख थी जो पूनम के चॉंद से भी ज़्यादा प्रकाशित थी)
हिलालश ताज बरि सर बूद शब शाए कि मन दीदम (उनके शीश पर चन्द्रमा का मुकुट था जब मैंने उस रात उन्हें देखा)
ज़ि भसमश जामाऐ बर-तन ज़ुनारश मार बर गरदन (उनके शरीर पर कपड़ो की जगह भस्म मली हुई थी और जनेऊ के बदले सॉंप “वासुकी जी” था)
र-वानश गँग बरि सर बूद शब शाए कि मन दीदम (उनके शीश के ऊपर से गंगा जी बह रही थी जब मैंने उस रात उन्हें देखा)
हयात व मौत तक़दीरो कज़ा कदरो ख़ुदावन्दी (उनके हाथों में जीवन मृत्यु दंड और क्षमा आदि है क्योंकि वह ईश्वर हैं)
ब फरमानश कि हर शै बूद शब शाए कि मन दीदम (उन्हीं के संकल्प मात्र से संसार चलता है कि जिनको मैंने उस रात को देखा)
अजब सन्यासीए दीदम नमो नारायणो गुफतम (मैंने जब उस अजीब सन्यासी को देखा तो मैंने अकस्मात् ही उन्हें नमो नारायण कह कर सम्बोधित किया)
ब खाके पाए बोसीदम शब शाए कि मन दीदम (मैंने उनकी चरणरज को चूमा जब मैंने उन्हें उस रात देखा)
मनम मर्दे मुसलमानम अली ख़ानम हमीदानम (मैं एक मुसलमान मर्द हूँ जिसे लोग अली ख़ान नाम से जानते हैं)
ख़ुदाए बन्दा-परवर बूद शब शाए कि मन दीदम (वह समस्त सृष्टि पर दया करने वाले भगवान ही थे जिनको मैंने उस रात देखा)

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• सधन्यवाद साध्वी मीनू जैन
Rendition by Dr. K.L. Raina

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