शोकसभा से श्रध्दांजलि तक

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Sunita Pushpraj Pandey
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हमारे पड़ोस में बुजुर्ग पंडित- पंड़िताइन रहते थे उनके बच्चे नहीं थे पंडित जी बिमार पड़े चारपाई पर दिनभर पड़े रहते लोग उनका हाल चाल पुंछने आते रहते मुझे भी बुलवा कर वो देखे थे फिर एक दिन पता लगा मर गए मुहल्ले के लड़कों ने हर घर जाकर चंदा इकट्ठा किया हर घर से एक पुरुष जरूर श्मशानघाट गया था फिर दसवें दिन कुछ लोगों ने बाल भी बनवाये थे उसके बाद फिर से चंदा इकट्ठा कर तेरहवीं हुई थी पहले पंडितों ने फिर मुहल्ले भर के लोगों ने पूरी सब्जी खायी थी। मुहल्ले के जवान लड़को ने अर्थी को कंधा देने से लेकर पूरी तलने तक सब कुछ खुद किया था सन् 1980 के आसपास की है ये बात। आज का युग होता तो व्आटसप पर ही सब कुछ हो जाता शोकसभा से श्रध्दांजलि तक।

Sunita Pushpraj Pandey
फेसबुक जब ज्वॉइन किया लगभग हजार भाई बहन बहुत सारे रिश्ते जोड़ लिए थे पर एक एक रिश्तों की कलई खुलती गयी
यदि मै किसी के विषय में कुछ कहती तो लोग मुझे मुहं पर ही गलत कहते क्योंकि दोहरे चरित्र के दोगले लोग समाज में कुछ और एकांत में कुछ और पर ऊपर वाले का धन्यवाद कि वो सब आभासी थे आभासी ही रह गए भगवान् करें उनसे कभी आमना सामना भी न हो । पर हाँ कुछ लोग आज भी है उसी रुप में पर गिने चुने बस यूँ ही लिख दिया।