समलेंगिकता और ज्योतिष के योग

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पंडित विशाल दयानन्द शास्त्री
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प्रिय दर्शकों/पाठकों,आजकल समलैंगिकता को लेकर चारों तरफ जोर-शोर से चर्चा हो रही है .कुछ देशों में इसे सामाजिक और कानूनी मान्यता है तो कुछ में इसकी मान्यता को लेकर लड़ाई चल रही है.ऐसे में ज्योतिष शास्त्र में भी इसके विशेष योगों की तलाश जरुरी है | भारतीय ज्योतिष में जो योग व्यभिचार की श्रेणी में है और अलग से किसी भी तरह से पीड़ित है तो लोग समलैंगिकता की ओर आकर्षित होते हैं | पुरुष समलिंगी को अंग्रेजी में गे (Gay) कहते हैं और महिला समलिंगी को लैस्बियन (Lesbian) कहा जाता है। समलैंगिकता का अस्तित्व प्राचीनकाल से ही सभी देशों में पाया गया है। लेकिन यह कभी उस रूप में नजर नहीं आया जैसा कि आधुनिक युग में देखने में आता है। आधुनिक युग में कुछ देशों ने समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी है तो कुछ देश इसके सख्त खिलाफ है | समलैंगिकता एक रोग है। यह प्रकृति के खिलाफ है। दुनियाभर में समलैंगिकता का ग्रॉफ बढ़ता जा रहा है। जहाँ हॉलीवुड-बॉलीवुड की फिल्में इन्हें बढ़ावा दे रही है वहीं सरकारें भी इन्हें कानूनी मान्यता देने में लगी है।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रकृति ने औरत-आदमी को एक-दूसरे का पूरक बनाया है। सनातन धर्म में इसे प्रकृति-पौरुष का मेल कहा गया है। इसी तरह दूसरे धर्मो में इन्हे आदम-हव्वा या एडम-ईव के नाम से संबोधित किया जाता है। दोनों स्वतंत्र पहचान के मालिक तो हैं ही लेकिन ये दोनों कुछ इस तरह से साथ जुड़े हुए हैं कि इन्हें संपूर्णता एक-दूसरे के साथ ही मिलती है। औरत आदमी का संबंध सामाजिक व पारिवारिक पहलू से भी बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि ये परिवार को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। किसी भी व्यक्ति की यौन पसंद अर्थात एक दूसरे के प्रति काम इच्छा स्वाभाविक है परंतु जब कभी औरत की काम इच्छा दूसरी औरत के प्रति हो और आदमी की काम इच्छा दूसरे आदमी के प्रति हो तो यह स्थिति असमंजसकारी हो जाती है। ऐसे में अगर रिश्ते बन जाएं तो इसे समलैंगिकता कहा जाता है।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष के नजरिए से देखें तो समलैंगिकता की विसंगती की जड़ें भी व्यक्ति के प्रारब्ध और कर्म से निकलती हैं। ऐसा माना जाता है कि जिनके पूर्वज या वे खुद पूर्व जन्म में यौन उछृंखल्लता में लिप्त रहे या अपनी सामंती ताकतों का लाभ लेते हुए दास-दासियों और नौकरों से अप्राकृतिक यौनाचार करते रहे या बहुपत्नी रखने वाले हुए तो अगली पीढि़यों में संभवत ऐसे रुझान दिखते हैं। इस तरह इन लोगों के नाते-रिश्तेदार भावनात्मक रूप से, मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से पीड़ित होते हुए यह कर्ज उतारते हैं। समलैंगिक जातक तो खुद इससे आनंदित होते हैं जबकि उनके नाते-रिश्तेदार ही इससे दुख भोगते हैं। हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में छपे बेरी के लेख के मुताबिक कुछ ग्रहों की स्थिति भी कुंडली में इस दोष की द्योतक होती है। इसे कुंडली में शुक्र का नकारात्मक प्रभाव, सप्तम, अष्टम, द्वादश और पंचम भाव के स्वामी तथा सूर्य के अलावा बुध, शनि और केतु की स्थिति भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकती है। पंचम भाव की इसमें बड़ी भूमिका इसलिए मानी जाती है, क्योंकि आदत, प्रकृति और रिश्तों का प्रतीक यही भाव है। इसके अलावा अष्टम और द्वादश भाव यह बताता है कि जातक की यौन आदतें कैसी होंगी। वैदिक ज्योतिष में सभी नौ ग्रहों को प्रवृति के हिसाब से तीन लिंगों में बांटकर देखा जाता है। इनमें सूर्य, बृहस्पति और मंगल को पुरुष, चंद्रमा, शुक्र और राहू को स्त्री ग्रह का दर्जा दिया जाता है। इसी तरह बुध, शनि और केतु को तीसरे सेक्स यानी नपुंसक ग्रह कहा जाता है। इसके पीछे तर्क यह है कि बुध को बाल गृह कहा जाता है और बच्चे सेक्स के योग्य नहीं होते, इस तरह शनि बुजुर्ग ग्रह होने के नाते उन्हें सेक्स और प्रजनन के विपरीत माना जाता। केतु को संन्यासी ग्रह का दर्जा है। वह सेक्स करने में सक्षम तो है मगर माना जाता है कि उसकी इसमें कोई रुचि नहीं। इन ग्रहों के बलवान और विपरीत प्रभाव कुंडली में इस तरह देखे गए हैं।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वैदिक ज्योतिष के अनुसार तीसरे सेक्स लोगों की कुंडली में बुध ग्रह की बड़ी भूमिका देखी जाती हैं। साथ ही उन पर शनि और केतु का भी प्रभाव होता है। इसलिए यह देखा जाता है कि जो लोग विभिन्न कलाओं और विग्यान में निपुण होते हैं और अपने क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं, उनमें ऐसी प्रवृति पायी जाती है, इसके अलावा अकेले शनि से प्रभावित लोग दरिद्र अवस्था में रहते हैं और उनकी नपुंसकता के चलते समाज में दुत्कारे जाते हैं। अगर केतु अधिक प्रभावशाली होता है तो जातक को मानसिक रूप से सामान्य यौन जीवन से अलग कर देता है। अत्याधिक बुरे प्रभाव में जातक को पागल माना जाता है नहीं तो वह साधु या साध्वी बनकर जीवन गुजारता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब व्यक्ति की कुंडली में शुक्र ग्रह कन्या राशि का हो तथा शनि और मंगल सातवें घर में हों तो जातक में समलैंगिकता का रुझान देखने को मिल जाता है। इसके अलवा २७ नक्षत्रों में मृगशिरा, मूल और शतभिषा नक्षत्र को तीसरे सेक्स का प्रतीक माना जाता है।
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समलैंगिकता के लिए कुछ विशेष योग ……

1 कुंडली में अगर मंगल और शुक्र एक साथ हो और किसी भी पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो कुंडली वाला इंसान निश्चित रुप से व्यभिचारी होता है और अगर माहौल या परिवेश पक्ष में रहता है (मसलन हॉस्टल में साथ साथ रहना) तो जातक समलैंगिकता का शिकार हो सकता है .

2 इसी तरह मंगल और शुक्र के साथ-साथ राहु भी हो तो यह योग जातक को समलैंगिक बना सकता है .

3 सप्तमेश अगर राहु के साथ हो और कोई अन्य नीच का ग्रह भी साथ में हो तो भी इंसान समलैंगिक हो सकता है.

4 सप्तमेश अगर नीच का होकर किसी पाप ग्रह के साथ अवस्थित हो तो भी इंसान समलैंगिक हो सकता है .

5 सप्तमेश अगर किसी नीच के पापी ग्रह के साथ हो तो समलैंगिकता की आशंका बनी रहती है.

6 सप्तमेश और पंचमेश का योग हो और इनमें से कोई एक नीच का हो ,साथ ही कोई पाप ग्रह युत या दृष्ट हो तो भी इंसान समलैंगिक हो सकता है.

सप्तमेश दो या दो से अधिक पापग्रह के साथ कहीं भी खास कर पंचम भावगत हो तो भी समलैंगिकता की संभावना बनती है.
8 सप्तम भाव अगर दो या दो से अधिक पापग्रह से पीड़ित हो और सप्मेश भी कहीं पापाक्रांत हो तो भी इंसान समलैंगिक हो सकता है .

9 सप्तमेश पापाक्रांत हो कर या नीच का होकर अगर पंचम भाव में अवस्थित हो और पंचमेश भी कहीं पापग्रह से युत या दृष्ट हो तो भी समलैंगिक होने के आसार बढ़ जाते हैं

10 पंचमेश पापाक्रांत होकर सप्तम भाव में अगर अवस्थित हो और सप्तमेश भी कहीं पापाक्रांत होकर अवस्थित हो तो भी समलैंगिक होने की संभावना बढ़ जाती है.

खासबात ये है कि समलैंगिकता के लिए जरुरी है कि आवश्यक योग वाले दो पुरुष या स्त्री साथ साथ हों अन्यथा यह योग कारगर या असरकारक नहीं हो पाते हैं.
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ज्योतिष और समलैंगिकता

ज्योतिष शास्त्र एक ऐसा ज्ञान स्त्रोत है जहां मनुष्यों के पूरे जीवन को देखा जा सकता है| वहां पर भी इस विषय पर काफी जानकारी मिलती है | मैं इस विषय पर अपने अनुभव बाँटना चाहूंगी | लोगो के शारीरिक सम्बन्ध बनाने की चाह को तीन भागो में बाँटा जा सकता हैं|

विपरीत लिंग के लोगो के साथ (Heterosexual)

समान लिंग के लोगो के साथ (Homosexual)

दोनों लिंग के लोगो के साथ (Bisexual)

कुंडली में समलैंगिकता कैसे देखें ?

कुंडली का सप्तम भाव, मंगल और शुक्र व्यक्ति की सेक्स की इच्छा को दर्शाता है साथ ही द्वादश भाव यह बताता है की व्यक्ति को शारीरिक सुख कितना मिलेगा| चन्द्र की स्थिति आपकी मानसिकता को दर्शाती है | वही राहू और वक्र ग्रह यह बताते है की आप कितने असमान हो| आइये अब देखते है कुंडली पर इन्हें कैसे देखा जाता है :-

उदाहरण कुंडली

10 अगस्त 1986, 10:10am , वाराणसी

यह जातक शारीरिक रूप से स्त्री है परन्तु बौधिक रूप से स्वयं को पुरुष मानता है | स्त्रियों का संसर्ग इसे अधिक पसंद है |

लग्न कुंडली – शुक्र (प्रेम) का कारक कुंडली में नीच अवस्था में, राहू – केतु के मध्य स्थित है | मंगल वक्री अवस्था में है | सप्तम का स्वामी भी वक्री है और सप्तम भाव और चन्द्र दोनों राहू और केतु से प्रभावित है|

नवांश कुंडली – नवांश कुंडली में भी सप्तम भाव का स्वामी, मंगल और शुक्र तीनो राहू -केतु के साथ है |

ऐसी स्थिति में असमानता स्वाभाविक है |

उदाहरण कुंडली

17 सितम्बर 1981, 21:35, गुरुग्राम

यह एक विवाहिता स्त्री की कुंडली है जिसके विवाह से पूर्व एक कन्या से शारीरिक सम्बन्ध थे| अब जीवन सुचारू रूप से चल रहा है | इसकी कुंडली में भी सप्तमेश मंगल स्वयं हो कर नीच और राहू के साथ है और राहू युत मंगल की दृष्टि शुक्र पर है |

नवांश कुंडली में भी सप्तम भाव में राहू है |

परन्तु असमानता किस दर्जे की होगी यह बताना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि समलैंगिक लोगो की संख्या कम है और भारत में वह खुल कर सामने आने में भी कतराते है | समाज को LGBT (Lesbian – Gay – Bisexual- Transgender ) की उपस्थिति को नकारना नही चाहिए अपितु इन लोगो को भी समाज में उचित स्थान मिलना चाहिए|

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पुरुष समलिंगी को “गे” व महिला समलिंगी को “लैस्बियन” कहते हैं। इस लेख के माध्यम से हम अपने पाठकों को ज्योतिष के माध्यम से बताते हैंं होमो सेक्सुअलिटी का एस्ट्रो कनैक्शन। होमो सेक्सुअलिटी अर्थात समलैंगिकता एक मनोविकार है। वैज्ञानिक दृष्टि से समलैंगिकता के कारण आनुवंशिकी व जन्म से पूर्व गर्भ में हार्मोन की गड़बड़ी माने जाते हैं। समलैंगिकता केवल मनुष्यों में ही नहीं बल्कि कई जानवरों में भी पाई जाती है। साइकोलॉजीकली अगर स्त्री या पुरुषों को सही दिशा में प्रेम नहीं मिलता है तो वे प्रेम के गलत रास्ते खोज लेते हैं। एक मनोवैज्ञानिक सत्य यह है कि पुरुष या स्त्रियों को एक-दूसरे से प्रेम नहीं मिलता है तो वे संभोग को ही प्रेम समझ लेते हैं।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार होमो सेक्सुअलिटी प्रारब्ध व संचित कर्मो का फल ही है अर्थात समलैंगिकता पूर्व जन्म में किए गए कर्मों का फल हैं। जिनके पूर्वज या वे खुद पूर्व जन्म में यौन मतवालेपन में लिप्त रहे या ताकत का लाभ लेते हुए दास-दासियों से अप्राकृतिक यौनाचार करते रहे या कई पार्टनर रखने वाले हुए तो अगली पीढि़यों में ऐसे रुझान दिखते हैं। इस तरह इन लोगों के रिश्तेदार भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक रूप से पीड़ित होते हुए यह कर्ज उतारते हैं।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार होमो सेक्सुअलिटी का कारण कुंडली में शुक्र का नकारात्मक प्रभाव, सप्तम, अष्टम, द्वादश और पंचम भाव के स्वामी तथा सूर्य के अलावा बुध, शनि और केतु की स्थिति भी है। कुंडली का पंचवा भाव आदत, प्रकृति व रिश्तों का प्रतीक है अतः समलैंगिकता की शुरुआत इसी भाव से होती है। अष्टम और द्वादश भाव यह बताता है कि जातक की यौन आदतें कैसी होंगी। वैदिक ज्योतिष में सभी नौ ग्रहों को प्रवृति के हिसाब से तीन लिंगों में बांटकर देखा जाता है। इनमें सूर्य, बृहस्पति व मंगल को पुरुष माना जाता है। चंद्र, शुक्र व राहू को स्त्री ग्रह माना जाता है और बुध, शनि और केतु को तीसरा लिंग यानी नपुंसक माना जाता है। इसके पीछे तर्क यह है कि बुध को बाल गृह कहा जाता है और बच्चे संभोग के योग्य नहीं होते, इस तरह शनि प्रौड़ होने के नाते उन्हें संभोग व प्रजनन के विपरीत माना जाता है। केतु को संन्यासी ग्रह का दर्जा दिया जाता है अतः वह भोग से दूर मोक्ष प्रदान करते हैं। इन ग्रहों के बलवान और विपरीत प्रभाव कुंडली में इस तरह देखे गए हैं।

वैदिक ज्योतिष अनुसार समलैंगिक लोगों की कुंडली में बुध ग्रह की बड़ी भूमिका देखी जाती है। साथ ही उन पर शनि और केतु का भी प्रभाव होता है इसलिए यह देखा जाता है कि जो लोग विभिन्न कलाओं और विज्ञान में निपुण होते हैं और अपने क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं, उनमें ऐसी प्रवृति पाई जाती है, इसके अलावा अकेले शनि से प्रभावित लोग दरिद्र अवस्था में रहते हैं और उनकी नपुंसकता के चलते समाज में दुत्कारे जाते हैं। अगर केतु अधिक प्रभावशाली होता है तो जातक को मानसिक रूप से सामान्य यौन जीवन से अलग कर देता है। अत्याधिक बुरे प्रभाव में जातक को पागल माना जाता है नहीं तो वह साधु या साध्वी बनकर जीवन गुजारता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब व्यक्ति की कुंडली में शुक्र ग्रह कन्या राशि का हो तथा शनि और मंगल सातवें घर में हों तो जातक में समलैंगिकता का रुझान देखने को मिल जाता है। इसके अलवा 27 नक्षत्रों में मृगशिरा, मूल व शतभिषा को समलैंगिकता से जोड़ कर देखा जाता है।

जैमिनी ज्योतिष सिद्धांतानुसार इन सभी ग्रहों की अवस्था में व्यक्ति समलैंगिक संबंधों में पड़ता है। कुंडली में शनि-शुक्र एक दूसरे से 2-12 हों। षष्ठेश बुध राहू संग युत होकर लग्न से संबंध बनाए या चंद्र सम राशि में व बुध विषम राशि में हो व दोनों पर मंगल की दृष्टि पड़े। लग्न सम राशि का हो व चंद्र विषम राशि के नवांश में हो व उस पर मंगल की दृष्टि पड़े। अगर लग्न व चंद्र दोनों विषम राशि में हो व सूर्य से दृष्ट हो। शुक्र व शनि दसवें या आठवें भाव में हों, एक साथ युत हों या नीच राशि में हों, या नीच राशि शनि छठे भाव में स्थित हो। कुंडली में शुक्र वक्री ग्रह की राशि में हो व लग्नेश स्वराशि में हो व सप्तम भाव में शुक्र होने पर। या चंद्र शनि की युति हो व मंगल चौथे या दसवें भाव में होने पर ऐसे योग बनते हैं। ज्योतिष की दृष्टि से समलैंगिकता का निवारण लग्नेश, पंचमेश सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश को ठीक करके या उपाय करके किया जा सकता है। इसमें लाल किताब के उपाय, रुद्राक्ष व जेमस्टोन व मंत्र अनुष्ठान की साहयता ली जाती है।

नोट: यह लेख परिकल्पित स्थिति को देखकर लिखा गया है। होमो सेक्सुअलिटी एक मनोविकार तथा साइकिक रोग है तथा इसका उपचार साइकेट्री, मानसशास्र व ज्योतिषशास्त्र के माध्यम से संभव है।
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समलैंगिकों का विवाह क्यों,इनका इलाज क्यों नहीं ?

समलैंगिकता एक रोग है जो जन्म से संतान में होता है । फैलता कैसे है जानिए जो इलाज से ठीक हो सकती है

विवाह पीढ़ी परिवर्तन की पवित्र प्रक्रिया एवं युग निर्माण का आधार है जो समलैंगिकता में संभव नहीं है ।

होता कैसे और किसको है की बीमारी होने के कारण ती

आयुर्वेद में पाँच प्रकार के नपुंसकों का वर्णन है ईर्ष्यक, आसेक्य, कुम्भीक, सुगंधि, षंड !इन पाँचों नपुंसकों में से ‘कुम्भीक’ नामक ही समलैंगिक होता है !

लिखा गया है –

स्वे गुदे ब्रह्मचर्याद् यः स्त्रीषु पुंवत प्रवर्तते !स कुम्भीक इति ज्ञेयो गुद्योनिश्च स स्मृतः ||

लिखा गया है कि जो माता पिता संसर्ग(सेक्स ) करते समय यदि पिता का वीर्य पहले स्खलित हो जाए और माता का बाद में हो इससे माता में जो सम्भोग इच्छा अधूरी रह जाती है ऐसे गर्भों से जन्म लेने वाली संताने कुम्भीक नामक नपुंसक होती हैं ये हमेंशा अल्पवीर्य रहने के कारण जब किसी पुरुष से गुदा मैथुन अर्थात समलैंगिक संबंध स्थापित करती हैं तब इनमें पुंसत्व या स्त्रीत्व का भाव जगता है इसी लिए इन्हें समलैंगिक संबंधों की आवश्यकता होती है । ऐसे लोगों में वीर्य की अल्पता का यदि इलाज हो जाए तो इस बीमारी को ठीक भी किया जा सकता है । हें अपने पुंसत्व का ज्ञान होता है

सेक्स तो पशुओं से भी हो सकता है वहाँ तो संतान भी संभव है किंतु सहज संतान का जन्म संभव न होने से पशुओं और मनुष्यों के विवाह संभव नहीं हैं !तो क्या उनके साथ भी विवाह किया जाएगा !विवाह केवल सेक्स समझौता ही नहीं अपितु विवाह युग निर्माण का आधार है जहाँ सहज संतान संभव वही विवाह अन्यथा

भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है ‘धन्यो गृहस्थाश्रमः’। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है। युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं। हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है – विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है। क्यों इनका इलाज क्यों नहीं !

हिंदू मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों (ब्रम्हचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम) में विभक्त किया गया है और गृहस्थ आश्रम के लिये पाणिग्रहण संस्कार अर्थात् विवाह नितांत आवश्यक है। हिंदू विवाह में शारीरिक संम्बंध केवल वंश वृद्धि के उद्देश्य से ही होता है।
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विवाह के प्रकार—विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।

विवाह का स्वरूप्—
विवाह का स्वरूप आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

1. ब्रह्म विवाह

दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना ‘ब्रह्म विवाह’ कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का “Arranged Marriage” ‘ब्रह्म विवाह’ का ही रूप है।

2. दैव विवाह

किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना ‘दैव विवाह’ कहलाता है।

3. आर्श विवाह

कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना ‘अर्श विवाह’ कहलाता है।

4. प्रजापत्य विवाह

कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना ‘प्रजापत्य विवाह’ कहलाता है।

5. गंधर्व विवाह

परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना ‘गंधर्व विवाह’ कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से ‘गंधर्व विवाह’ किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम “भारतवर्ष” बना।

6. असुर विवाह

कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना ‘असुर विवाह’ कहलाता है।

7. राक्षस विवाह

कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना ‘राक्षस विवाह’ कहलाता है।

8. पैशाच विवाह

कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना ‘पैशाच विवाह’ कहलाता है।

हिन्दू धर्म में; सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है।

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पंडित दयानन्द शास्त्री,
(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)

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