सरदार पटेल और आरएसएस का झंडा विवाद – ‘भगवा ध्वज के पीछे रहस्य’

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Abhay Vivek Aggroia
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जीने और लिखने के लिए लेखक को पैसा कमाना चाहिए, लेकिन किसी भी सूरत में उसे पैसा कमाने के लिए जीना और लिखना नहीं चाहिए

सावरकर दो राष्ट्र राष्ट्र सिद्धांत को बढ़ावा देने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने इसे पहले 1 9 23 में हिंदुत्व में और 30 दिसंबर, 1 9 37 को हिंदू महासभा को अपने राष्ट्रपति के संबोधन में आगे बढ़ाया: ‘मुख्य में दो राष्ट्र हैं: भारत में हिंदू और मुस्लिम।’ एक साल बाद, 1 9 38 में, उन्होंने कहा: हिंदुस्तान में हिंदू भारत में राष्ट्र हैं, और मोसलेम अल्पसंख्यक एक समुदाय है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, आरएसएस नेताओं ने खुले तौर पर एडॉल्फ हिटलर और बेनिटो मुसोलिनी की प्रशंसा की। हेडगेवार के बाद आरएसएस के सर्वोच्च नेता बनने वाले एम एस गोलवलकर ने नस्लीय शुद्धता के एडॉल्फ हिटलर की विचारधारा से प्रेरणा ली।

बजरंग दल अपने स्वयंसेवकों को ‘आत्मरक्षा’ में लाठी, छुरा, त्रिशूल और बंदूक़ चलाने की ट्रेनिंग देता है – और इन ट्रेनिंग कैंपों में दुश्मन का रोल कर रहे स्वयंसेवकों को मुसलमानों जैसी दाढ़ी और टोपी में दिखाया जाता है.राम जन्मभूमि आंदोलन में आरएसएस सीधे शरीक नहीं हुआ. उसने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) को ये काम सौंपा.

‘सुरक्षा आदि’ के काम के लिए 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने बजरंग दल का गठन किया.

बजरंग दल अपने स्वयंसेवकों को ‘आत्मरक्षा’ में लाठी, छुरा, त्रिशूल और बंदूक़ चलाने की ट्रेनिंग देता है – और इन ट्रेनिंग कैंपों में दुश्मन का रोल कर रहे स्वयंसेवकों को मुसलमानों जैसी दाढ़ी और टोपी में दिखाया जाता है.नवरात्रि और रामनवमी के त्योहार कभी भक्ति का पुट लिए हुए होते होंगे पर अब वो नंगी तलवारों और त्रिशूलों के डरावने प्रदर्शन का बहाना बन कर रह गए हैं.

ऐसे त्योहारों में मोटरसाइकिल सवार ‘राष्ट्रभक्तों’ की टोली मुसलमानों के मोहल्ले में जाकर जय श्रीराम, पाकिस्तान मुर्दाबाद, भारत माता की जय जैसे नितांत संवैधानिक नारों के साथ साथ ‘भारत में रहना है तो वंदेमातरम कहना होगा’ जैसे नितांत असंवैधानिक नारे लगाती है.

जिन्ना : अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद से एएमयू को अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दान करने वाले जिन्ना शायद अपने समय के एकमात्र सार्वजनिक नेता थे. ऐक केस में तिलक 20 हजार की जमानत देकर छूटे थे. ये शायद पहली बार था जब बाल गंगाधर तिलक राजद्रोह के आरोप के बावजूद भी जेल नहीं गए थे. और ये कमाल जिन्ना ने ही किया था.

जिन्ना और शहीद भगत सिंह और क्रंतिकारियों के जेल में होने वाले अत्याचार के खिलाफ- सरकार ने तो इन व्यक्तियों के विरूद्ध युद्ध छेड़ रखा है। ऐसा लगता है कि सरकार यह ठान चुकी है कि ‘‘हम हर संभव प्रयास करके, कोई भी तरीका अपनाकर यह सुनिश्चित करेंगे कि तुम फाँसी के तख्ते तक पहुँच कर रहो और इस बीच हम तुम्हारे साथ इंसान जैसा बर्ताव भी नहीं करेंगे।’’
आरएसएस और शहीद भगत सिंह–‘बंच ऑफ थॉट्स’ (गोलवलकर )

‘इस बात में तो कोई संदेह नहीं है कि ऐसे व्यक्ति जो शहादत को गले लगाते हैं, महान नायक हैं पर उनकी विचारधारा कुछ ज्यादा ही दिलेर है. वे औसतव्यक्तियों, जो खुद को किस्मत के भरोसे छोड़ देते हैं और डर कर बैठे रहते हैं, कुछ नहीं करते, से कहीं ऊपर हैं. पर फिर भी ऐसे लोगों को समाज के आदर्शों के रूप में नहीं रखा जा सकता. हम उनकी शहादत को महानता के उस चरम बिंदु के रूप में नहीं देख सकते, जिससे लोगों को प्रेरित होना चाहिए. क्योंकि वे अपने आदर्शों को पाने में विफल रहे और इस विफलता में उनका बड़ा दोष है.’ –

सरदार पटेल और आरएसएस–“पटेल ने अगस्त 1948 में संघ के प्रमुख माधवराव सदाशिव गोलवरकर को पत्र लिखकर कहा, ‘संघ के सभी नेताओं के भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे हुए थे। इनसे ऐसा माहौल बना कि इतना बड़ा हादसा (गांधीजी की हत्या) हो गई। गांधीजी की मृत्यु पर आरएसएस के लोगों ने खुशी जाहिर की और मिठाइयां बांटीं।’

सरदार पटेल और आरएसएस का झंडा पर विवाद –14 अगस्त अंक में ‘भगवा ध्वज के पीछे रहस्य’, नाम का लेख भी था, जिसमे दिल्ली के लाल किले के प्राचीर पर एक भगवा ध्वज के उत्थापन की मांग करते हुए खुले तौर पर राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे के चुनाव की निम्न शब्दों में अपमान किया गया :
“जो लोग किस्मत के दांव से सत्ता में आ गए हैं हमारे हाथ में तिरंगा दे सकते हैं, लेकिन इसको हिंदुओं द्वारा कभी अपनाया नहीं जाएगा और न ही इसका कभी हिंदुओं द्वारा सम्मान होगा । शब्द तीन अपने आप में एक बुराई है, और तीन रंगों वाले एक झंडे का निश्चित रूप से एक बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव होगा और यह देश के लिए हानिकारक है। “

पटेल ने जयपुर में आर एस एस पर हमला किया था: “हम आर एस एस या किसी अन्य सांप्रदायिक संगठन को देश को गुलामी या विघटन के रास्ते पर वापस करने की इजाजत नहीं देंगे … मैं एक सैनिक हूं, और मेरे समय में मैंने दुर्लभ बलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है … … अगर मुझे लगता है कि देश की भलाई के लिए ऐसी लड़ाई जरूरी है, तो मैं भी अपने ही लड़के से लड़ने में संकोच नहीं करूंगा। “

पटेल ने कहा कि उन्होंने अपना दृष्टिकोण आरएसएस के प्रतिबंधित आधिकारिक नेता एम.एस.गोळवलकर, जब उनके साथ मुलाकात हुई,साफ कहा “… राष्ट्रीय ध्वज को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए, और यदि कोई भी राष्ट्रीय ध्वज के विकल्प के बारे में सोचता है, तो इसके खिलाफ एक लड़ाई होनी चाहिए।”

सावरकर और भगत सिंह:
भगत सिंह: “हम आप से केवल यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है. इस स्थिति में हम युद्धबंदी हैं, अत: इस आधार पर हम आपसे मांग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबन्दियों-जैसा ही व्यवहार किया जाए और हमें फांसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाए.

अब यह सिद्ध करना आप का काम है कि आपको उस निर्णय में विश्वास है जो आपकी सरकार के न्यायालय ने किया है. आप अपने कार्य द्वारा इस बात का प्रमाण दीजिए. हम विनयपूर्वक आप से प्रार्थना करते हैं कि आप अपने सेना-विभाग को आदेश दे दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए एक सैनिक टोली भेज दी जाए.”

आपका भगत सिंह
सावरकर : “इसलिए अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है.जो ताक़तवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है. आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे.”-वीडी सावरकर
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आएं शहीदों की शहादतों को जिन्दा रखने की जिम्मेदारी लें
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पहल करें ——पहिये का रुख बदलने का
मुश्किल है ————-नामुमकिन तो नही
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