हिम्मत और शुजाअत का आलम यह था कि चार हज़ार मुजाहिद डेढ़ लाख रूसियों के मद्दे मुक़ाबिल आ खड़े हुए थे…

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Sikander Kaymkhani
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कैस्पियन सागर और ब्लैक सागर के बीच तुर्की जॉर्जिया रूस से सटा इलाक़ा दागिस्तान जिसे कफकाज़, इंग्लिश कॉक्सस और उर्दू नोवेल्स में कोहे काफ़ कहा जाता है,, तमाम उर्दू नोवेल्स में इस खूबसूरत दुश्वार गुज़ार पहाड़ियों और बेपनाह प्राकृतिक वाले इलाके को जिन्नों और परियों का इलाक़ा कहा जाता रहा उसकी वजह यहाँ के मर्दों की बुलन्द कामत और औरतों का बेपनाह हुस्न ओ जमाल तमाम अफसाना निगारों के नजदीक जिन्न और परियों के इलाके के रूप में दुनिया भर में मशहूर कर दिया गया ……..

कोह काफ की एक परी विश मां ने एक ऐसा मर्दे मुजहिद शेर पैदा किया कि दुनिया की तारीख और तागुत उसकी नक्लो हरकत की कहानियां सुन कर सिहर उठते हैं ….

6 फुट 5 इंच, इमाम शामिल रह. इमामते कफकाज़ के तीसरे मुजाहिद सरबराह और नक्शबंदी के तीसरे इमाम के तौर पर जाना जाता है …….

दागिस्तान या कोह कफ़ या कफकाज़ का यह इलाका कभी सल्तनते उस्मानिया या ओटोमन एम्पायर का हिस्सा था, जिसे उस वक़्त की विश्व शक्ति रूस ने फ़तेह कर लिया था,, फारस के कई हिस्सों पर जब रूस ने हमला किया तो फारस के बादशाह की हिमायत में यह दागिस्तानी शेर रूस के खिलाफ खड़े हो गए और सलीबी गुलामी को गय्यूर कौम ने गवारा न करके अपनी खुद मुख्तारी का ऐलान कर दिया ….

हिम्मत और शुजाअत का आलम यह था कि चार हज़ार मुजाहिद डेढ़ लाख रूसियों के मद्दे मुक़ाबिल आ खड़े हुए थे…
यह कोई ज्यादा पुरानी बात नही बल्कि 18वीं सदी का ज़माना है ,, रूसी फौज तादाद में तो ज़्यादा थी ही साथ मे उस वक़्त की जदीद टेक्नोलॉजी वेपेनरी टैंक्स और मस्कट बन्दूकों से लैस थी जबकि दागिस्तानी शेर सिर्फ तीर और तलवार तक महदूद थे ।।

जंगे कफकाज़ के सबसे पहले रहनुमा मुजाहिद शेख मंसूर थे, उनकी शहादत के बाद कमान मुल्ला गाज़ी के हाथ आगयी, मुल्ला गाज़ी इमाम शामिल के बचपन के दोस्त थे, जंग घुमरी 1834 ई. में मुल्ला गाज़ी ने भी जामे शहादत पी लिया ऐसे में नौजवान इमाम शामिल तलवार लेकर रूसियों पर टूट पड़े और चार रूसियों की गर्दन उड़ा दीं, एक नेजा इमाम के सीने में भी धँस गया और इसी घायल हालत में इमाम जंगल मे रु पोश हो गए, कफकाज़ में यह बात फैल गयी कि इमाम शामिल शहीद हो गए,, लेकिन इमाम वापस आये और तमाम मुजाहिदों ने उन्हें अपना सरबराह चुन लिया ।

चार हज़ार मुजाहिदों के साथ मुसलसल 25 साल तक यह दागिस्तानी शेर रूस की बे तहाशा कुव्वत से पंजा आज़माई करता रहा और दागिस्तान पांच लाख रूसियों के कब्रिस्तान के तौर पर दुनिया मे मशहूर हो गया ।।

रूसी जनरल ने यह एतराफ़ किया है कि जितने वसाइल और जानी नुकसान उस वक़्त दागिस्तान के जिहाद को खत्म करने में लगा उतने में तुर्की से जापान तक का इलाका हम फ़तेह कर लेते ।

पूरी दुनिया को सर्जिकल स्ट्राइक गोरिल्ला वार की मास्टरी सिखाने वाला यह मुजाहिद 1859 में पूरी रूसी कुव्वत का सामना कर रहा था,, उस्मानिया ख़िलाफ़त के साथ ही इस्लामी मर्कजियत तुर्की में अपनी आखरी सांसे ले रही थी, इमाम ने ख़िलाफ़त से मदद मांगी पर उस्मानिया ख़िलाफ़त की अब वह हैसियत नही बची थी कि कुमक भेज सकें,,

पूरी दुनिया गवाह है कि दागिस्तान के मुजाहिद अपनी पूरी ज़िंदगी बिना किसी बाहरी मदद और कुमक के बिना ही रूसियों को धूल चटाते रहे यह अपने आप मे हैरत अंगेज़ बात है….. इमाम शामिल की अज़मत सिर्फ उनकी बहादुरी दिलेरी के लिए नही बल्कि मैनेजमेंट और बुलन्द किरदार ने टीपू सुल्तान और अब्दुल कादिर अल जज़ायरी की तरह उनकी अज़मत को चार चांद लगा दिए …..

सन 1859 ई. गनीब के सख्त तरीन मार्के में मर्दे मुजहिद के दो बेटे शहीद हो चुके थे, तमाम मुसलमान औरतें और बच्चे रूसियों ने गन पॉइंट पर लेकर इस शेर की आज़माइश को पशोपेश में डाल दिया, और इमाम शामिल ने नागरिकों की आम सलामती की शर्त पर हथियार डाल दिये ,,

रूसी जनरल की खुशी का आलम यह था कि उसने नाचना शुरू कर दिया,, रूसी बादशाह को खत लिख भेजा कि 100 साल की कफकाज़ की जंग आज खत्म हुई ,,

रूसी बादशाह ने बड़ी इज्जत से इमाम शामिल को अपने पास बुलाया और वफादारी के एवज मालो गनीमत और बादशाहत ऑफर की लेकिन मलंग सूफी मुजाहिद की गैरत ने बातिल के हाथ पर बैत को गवारा नही किया और नज़रबन्द होने को तरजीह दी, 1970 में इमाम ने रूसी बादशाह से इमाम ने हज पर जाने की दरख्वास्त की जिसे कुबूल कर लिया गया,, एक साल बाद मदीने मुनव्वरा में इमाम शामिल पर आकाये मदनी स. ने नज़रे करम किया और यह गाज़ी अपनी दिलेरी की दास्तान अपनी नई नस्लों को बसियत में छोड़ कर वफात पा गया, और जन्नतुल वकी मदीना में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने जगह देकर उसे दुनिया मे ही सुर्ख रु कर दिया …….
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कल के खबीब के मैच से पहले वज़न करने के वक़्त आइरिश लड़ाके ने तूफ़ान ए बदतमीजी की इंतहा करदी,, मैं आइरिश कोच का वह ट्वीट भी देखा जिसमे खबीब को टैग करके आइरिश कोच ने कहा कि ” जीसस को नॉक आउट पसंद है पर मुहम्मद को समर टाइम अच्छा नही लगेगा ”
खबीब ने गैरत मंदी से उसे तुरंत टोंका कि आकाये मदनी पर एक लफ्ज़ भी कहने से पहले मैं तुम्हे औकात बता दूंगा ,,
और यह मैच अब मैच नही रह गया था बल्कि सिलिबी जंग की शक्ल ले गया था जहा दागिस्तानीँ खालिस मुजाहिदों का नस्ली खून था तो दूसरी तरफ सलीब पीठ पर गुदवाए हुए आइरिश लड़ाका था ……
और उसके बाद जो हुआ वह हम सभी ने देखा,, खबीब ने पिंजरे से निकल कर कोच के मुंह मे मुक्का मारा जिस मुँह से वह आकाये मदनी का नाम लेकर मज़ाक कर रहा था ।।
खेल तो आखिर खेल ही है पर यह कुछ और भी था,,
और मेरे नज़दीक खबीब की यह जीत इमाम शामिल जैसे मर्दे मुजाहिद के इतिहास को खोद निकालने का जरिया बनी,, अहसास ए कमतरी का शिकार उम्मते मुस्लिमा अपने असलाफ़ अपने मुजाहिदों से खुदी ले सकती थी पर जाने कितने ही शेरों की इंस्पिरेशनल दास्ताने ज़िन्दगी गुमनाम होकर रह गयी,, दुनिया भर के हिस्सों में इस्लामिक मुजाहिदों की दास्तानों क बिखरेे हुए शीराज़ा को समेटने के लिए लगता है कोई अदीब इतनी बड़ी उम्मत में पैदा ही नही हुआ यह बड़े अफसोस कि बात है,,

”और वह दागिस्तानी जिन्न और परियां महज़ अफ़सानवी बातें बन कर रह गईं
ऐसे ही गुमशुदा पुर असरार मुजाहिदों के लिए अल्लामा इक़बाल रह. ने कहा था”
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“” यह गाज़ी यह तेरे पुर असरार बन्दे
जिन्हें तूने बख्शा है जौके खुदाई
दो नीम इनकी ठोकर से सहरा ओ दरिया
सिमट कर पहाड़ इनकी हैबत से राई
सहादत है मतलूब ओ मकसूद ओ मोमिन
न माल ए गनीमत न किश्वर कुसाई

वाया : Tasneem Nazim Ghazi भाई !!