हुक्मे ख़ुदा : जो इंसान सामने से बढ़ के किसी इंसान पे हमला करे वो मुसलमान नहीं

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Sikander Kaymkhani‎
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अल्लाह का कहना है कि जो इंसान सामने से बढ़ के किसी इंसान पे हमला करे वो मुसलमान नहीं | क्यूंकि इस्लाम अमन का पैगाम देता है युद्ध का नहीं |हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की गिनती मक्का के सबसे इमानदार और अमानतदार लोगों में हुआ करती थी | जब वो ४० साल के हो गए तो उन को अल्लाह की तरफ़ से पहली बार संदेश आया जिसे उन्होंने अपनी पत्नी हज़रत ख़दीजा को बताया जिन्होंने फ़ौरन यकीन कर लिया कि हज़रत मोहम्मद अल्लाह द्वारा नियुक्त किये हुए पैग़म्बर हैं, फिर हज़रत अली ने भी फ़ौरन यह बात स्वीकार कर ली| इसके बाद से ही हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के खिलाफ हमलों का सिलसिला शुरू हुआ और उनके साथियों पे ज़ुल्म दिन ब दिन बढ़ता गया | हर समय हजरत अबुतालिब जो हजरत अली (अ.स) के बाप और हजरत मुहम्मद(स.अ.व) के चाचा थे इन हमलो से पैगम्बर को बचाया करते थे | जब बात ना बनी तो हजरत मुहम्मद (स.अ.व) को लालच दी गयी कि “ऐ मोहम्मद! आखिर तुम चाहते क्या हो? मक्के की सल्तनत? किसी बड़े घराने में शादी? धन, दौलत का खज़ाना? यह सब तुम को मिल सकता है और बात पर भी राज़ी हैं कि सारा मक्का तुम्हे अपना शासक मान ले, बस शर्त इतनी है कि तुम इस्लाम धर्म की बात ना करो ” हजरत मुहम्मद (स.अ.व० ने जवाब में कुरान की आयात सुनायी तो वो लोग घबरा गए और आपस में कहने लगे तुम लोग मोहम्मद को उनके हाल पर छोड़ दो अगर वह कामयाब हो कर सारे अरब पर विजय हासिल करते हैं तो तुम लोगो को भी सम्मान मिलेगा| हज़रत मोहम्मद को परेशान करने वालो में अबू सुफ्यान ( मुआव्विया का बाप ), अबू जहल और अबू लहब सबसे आगे थे जो उस समय इस्लाम धर्म पे नहीं थे |

हज़रत अबू तालिब के इंतिक़ाल के बाद इन ज़ुल्मो में इज़ाफा हो गया |एक रात मक्के के लगभग सभी क़बीले के लोगो ने पैग़म्बर साहब को जान से मार देने की साज़िश रच ली लेकिन इस साज़िश की खबर मोहम्मद साहब को पहले से लग गई और वेह अपने चचेरे भाई हज़रत अली से सलाह मशविरा करने के बाद मदीने के लिए प्रस्थान करने को तैयार हो गए. लेकिन दुश्मनों ने उनके घर को चारो तरफ से घेर रखा था. इस माहोल में हज़रत अली मोहम्मद साहब के बिस्तर पर उन्ही की चादर ओढ़ कर सो गए और मोहम्मद साहब अपने एक साथी हज़रत अबू बक्र के साथ रात के अँधेरे में ख़ामोशी से मक्का छोड़ कर मदीने के लिए चले गये| इस तरह इस्लाम के लिए एक सुनहरे युग की शुरुआत हो गई. मदीने में ही पैग़म्बर साहब ने अपने साथियो के साथ मिल कर पहली मस्जिद बनाई. यह मस्जिद कच्ची मिट्टी से पत्थर जोड़ कर बनाई गई थी और इस पर सोने चांदी की मीनार और गुम्बद नहीं थे बल्की खजूर के पत्तों की छत पड़ी हुई थी|

मक्का छोड़ने के बाद भी इस्लाम के दुश्मनों ने मोहम्मद साहब के खिलाफ़ साजिशें जारी रखीं और उन पर लगातार हमले होते रहे |मोहम्मद साहब न तो किसी की सरकार छीनना चाहते थे न उन्हें देश और ज़मीन की ज़रुरत थी, वे तो सिर्फ इस धरती पर अल्लाह का सन्देश फैलाना चाहते थे. मगर उन पर लगातार हमले होते रहे जबकि खुद मोहम्मद साहब ने कभी किसी पर हमला नहीं किया और न ही इस्लामी सेना ने किसी देश पर चढाई की |इस का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पैग़म्बर साहब और उनके साथियों पर कुल मिला कर छोटे बड़े लगभग छियासी युद्ध थोपे गये और यह सारी लड़ाईयाँ मदीने के आस पास लड़ी गई |केवल जंगे-मौता के मौके पर इस्लामी फ़ौज मदीने से आगे बढ़ी क्योंकि रोम के बादशाह ने मुसलमानों के दूत को धोके से मार दिया था|मगर इस जंग में मुसलमानों की तादाद केवल तीन हज़ार थी और रोमन लश्कर(सेना) में एक लाख सैनिक् थे इसलिए इस जंग में मुसलमानों को कामयाबी नहीं मिली. इस जंग में पैग़म्बर साहब के चचेरे भाई हज़रत जाफर बिन अबू तालिब और कई वीर मुसलमान सरदार शहीद हुए| यहाँ पर यह कहना सही होगा कि मोहम्मद साहब ने न तो कभी किसी देश पर हमला किया, न ही इस्लामी शासन का विस्तार करने के लिए उन्होंने किसी मुल्क पर चढ़ाई की बल्कि उन को ही इस्लाम धर्म को नापसंद करने वालो ने हर तरह से परशान किया | जंगे-अहज़ाब के मौके पर इस्लाम धर्म को नापसंद करने वालो ने यहूदियों और दूसरी इस्लाम दुश्मन ताकतों को भी मिला कर मुसलमानों पर चढ़ाई की, लेकिन मात नहीं दे सके|

जंगे-उहद के मौके पर तो पैग़म्बर साहब को अभूतपूर्व क़ुरबानी देनी पड़ी | इस जंग में पैग़म्बर साहब के वीर चाचा हज़रत हम्ज़ा शहीद हो गए, उनकी शहादत के बाद पैग़म्बर साहब के सब से बड़े दुश्मन अबू सुफ्यान (मुआविया का बाप) की पत्नी हिंदाह ने अपने ग़ुलाम की मदद से हज़रत हम्ज़ा का सीना काट कर उनका कलेजा निकाल कर उसे चबाया और उनके कान नाक कर कर अपने गले मैं हार की तरह पहना|