फ़ीफ़ा विश्व कप 2018 और ‘मुस्लिम प्रतिभा’

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Khan Riyaz
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फीफा विश्व कप 2018 के 32 प्रतिभागियों में से 7 टीम ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, मोरक्को, ट्यूनीशिया, नाइजीरिया और सेनेगल मुस्लिम बाहुल्य देश से हैं।

जबकि सीरिया क्वालिफाई करते-करते रह गया और इराक़ आख़िर तक लड़ कर बाहर हुआ। कुल 12 टीम हैं जिनमें कम से कम 1 मुस्लिम खिलाड़ी ज़रूर है।

कुल 154 मुस्लिम खिलाड़ी इस विश्व कप में शिरकत कर रहे हैं। इनमें जर्मनी के मेसुत ओज़िल, समी ख़दीरा, मिस्र के मोहम्मद सालाह, मोहम्मद अल नेनी, अहमद हिज़ागी, बेल्जियम के मेरोन फेलएनी, अदनान जानुजाज़, मूसा डेंबेल, फ्रांस के आदिल रेमी, उस्मान डेंबेल, नबील फेकिर, स्विट्ज़रलैंड के जोहान ज्योरो, ज़ेरदान शकीरी, ग्रेनित ज़का, हारिस ज़ेरेकोविच, रूस के दलेर कुज़ायेव, मोरक्को के मेहदी बनातिया, हमज़ा मेंडिल, अकराफ हकीमी, नाइजीरिया के अहमद मूसा, सेनेगल के ख़ालिदू कोलिबअली, सादियो माने, ट्यूनीशिया के वहबी ख़ज़री, योहान बेनालुआने, ऑस्ट्रेलिया के अज़ीज़ बेहिख, ईरान के मसूद शुजाई, करीम अंसारीफर्द, अलीरज़ा जहानबख़्श जैसे खिलाड़ी यूरोप के बड़े क्लबों में खेलकर नाम कमा रहे हैं।

इनमें सिर्फ सऊदी अरब की टीम के तमाम खिलाड़ी घरेलू लीग से हैं। इनमें शिया, सुन्नी, वहाबी, सलफी, एशियाई, अफ्रीकी, ऑस्ट्रेलियाई और यूरोपीयन भी हैं।

बड़ी बात ये है कि इन 154 खिलाड़ियों में से ज़्यादातर ग़रीबी, गॄह युद्ध, नस्लीय हिंसा, विदेशी आक्रमण और आतंकवाद पीड़ित देशों के नुमाइंदे हैं। इनमें आर्थिक प्रतिबंद, साम्राज्यवाद, युद्ध और पलायन की विभीषिका झेल चुके इंसान हैं। ये अपने अपने मुल्क के लिए खेल रहे हैं लेकिन मज़हब के अलावा दर्द, इंसानियत, फुटबॉल और इनका शानदार खेल इन्हें आपस में जोड़ते है।

बाक़ी मोरल ऑफ द स्टोरी ये है कि न सारे मुसलमान बम फोड़ते हैं और न सारे मुसलमान पंचर लगाते हैं… मौक़ा मिले तो ये अपने मुल्क के लिए लड़ते भी हैं और गोल भी करते हैं।