••॥#वैकुंठ_की_कुंठा॥••#भाग_२

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Ashutosh Rana

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आप अद्भुत हैं प्रभु, आपने अपने प्रताप से राजा बलि के आधिपत्य से तीन लोकों में से दो लोकों को मुक्त कर बलि को पाताल में स्थापित कर दिया और स्वयं को उसके द्वारपाल के रूप में नियुक्त कर दिया ?
आपकी लीला समझ नहीं आती प्रभु ! आपसे निवेदन है आप तत्काल यहाँ से चलिए, माता लक्ष्मी आपके वियोग से व्याकुल हैं, आपके ना होने से आपके लोक वैकुंठ में, कुंठा का साम्राज्य स्थापित हो गया है।

वामन के रूप में भी नारद द्वारा स्वयं को पहचान लिए जाने से श्रीहरि प्रसन्नता से भरे हुए बोले- नारद मैं बलि को अपने ही द्वारा दिए गए वरदान से बँधा हुआ हूँ, अब मुझे सदा के लिए पाताल में ही निवास करना होगा।

नारद ने आश्चर्य से भरकर कहा- प्रभु आप तो निर्बंध हैं, आपका बँधा हुआ होना समझ नहीं आता !
श्रीहरि बोले- नारद.. मुक्ति, युक्ति और शक्ति का पर्याय होने के बाद भी मैं भक्ति से बंध जाता हूँ।

नारद ने कहा- प्रभु यदि उचित समझें तो संदर्भ साझा करें।
श्रीहरि ने कहा- नारद तुम जानते हो राजा बलि ने अपने विक्रम से तीनों लोकों को अपने अधिकार में ले लिया था। बलि जो स्नान, ध्यान और दान के महत्व को भलीभाँति समझता था उसने कल्याण की भावना से प्रेरित होकर दान का व्रत ले लिया। उसके दानव्रत की प्रतिष्ठा तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गयी।

नारद ने विस्मय से कहा- प्रभु आज आप विरोधाभासी वचनों का उद्घाटन कर रहे हैं ! स्नान से तन पवित्र होता है, ध्यान से मन पवित्र होता है और दान करने से धन पवित्र हो जाता है, तो बलि जैसा सिद्ध पुरुष जो स्नान, ध्यान और दान के व्रत का पालन कर रहा था वह देवताओं के त्राण का कारण क्यों हो गया ? यदि बलि इतना ही बड़ा तपस्वी था तब वह क्यों आधिपत्य की भावना से भर गया ? तपस्या से तो औदार्य उत्पन्न होता है, अहंकार नहीं।

श्रीहरि ने गम्भीरता से नारद को देखते हुए कहा- नारद, सिद्धि से कहीं अधिक घातक प्रसिद्धि होती है। इसलिए जो सिद्ध होते हैं वे स्वयं को संसार के समक्ष अकिंचन के रूप में प्रस्तुत करते हैं, वे स्वयं को संसार से छिपा कर रखते हैं, असाधारण शक्तियों के स्वामी होते हुए भी वे अतिसामान्य जीवन जीते हैं।
क्योंकि मनुष्य को जब प्रसिद्धि प्राप्त होती है तब उसके विवेक का हरण हो जाता है, परिणामस्वरूप व्यक्ति अहंकार से भर जाता है फिर वही अहंकार उसके नाश का कारण हो जाता है। तप से उत्पन्न हुए ताप को सम्भालना किसी भी तप से बड़ी तपस्या होती है नारद। हुआ वही, बलि के सभासदों ने त्रिलोक विजेता बलि को अश्वमेध यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया।
बलि के ताप से देवताओं को मुक्त करने का संकल्प लेकर मैं वामन के रूप में उसके यज्ञ में पहुँच गया।

नारद श्रीहरि के कथनों से चकित होते हुए बोले- प्रभु आप विराट रूप वाले हैं फिर आपको बली के समक्ष स्वयं को छोटा, बौना प्रस्तुत करने की क्या सूझी ?
श्रीहरि बोले- मैं अपने महाबली स्वरूप से बलि को हरा तो देता, किंतु बलि को हराना मेरा लक्ष्य नहीं था मैं उसे जीतना चाहता था। हराने से व्यक्ति का बैर समाप्त नहीं होता, वह कुछ समय के लिए दब अवश्य जाता है किंतु तब वह कुंठा का रूप ले लेता है और समर्थ व्यक्ति की कुंठा जब क्रोध का रूप लेती है तब वह सर्वनाशी हो जाता है। स्मरण रखो नारद, किसी भी बलशाली व्यक्ति को बल से नहीं शक्ति से ही जीता जा सकता है।

नारद की जिज्ञासा मुखर हो गई वे बोल पड़े- भगवन, बल और शक्ति तो एक ही होते हैं। इनके बीच कोई भेद ही नहीं है।
श्रीहरि मुस्कुराते हुए बोले- इन दोनों को एक मानना ही हमारी सबसे बड़ी भूल है।
बल दिखाई देता है और शक्ति दिखाई नहीं देती। सामान्य शब्दों में ये कहा जा सकता है कि जब शक्ति को दिखाया जाता है तब वह बल कहलाता है, और जब बल को छुपाया जाता है तब वह शक्ति हो जाता है। दिखाना प्रदर्शन है तो छिपाना एक कला, इसलिए किसी भी बड़े, बलशाली व्यक्ति को जय करने के लिए हमें चाहिए की हम अपने अस्तित्व को छोटा बना लें।
बड़े व्यक्ति का सबसे बड़ा दुर्गुण होता है कि उसे छोटी समस्याएँ, छोटे व्यक्ति दिखाई नहीं देते वह अहंकार के वशिभूत होकर उनकी उपेक्षा करता है उन्हें नगण्य मानता है, और यही उपेक्षा बड़े, बलशाली व्यक्ति के अवसान का कारण हो जाती है।
मुझमें और बलि में मात्र इतना अंतर है कि बलि वृक्ष में छिपे हुए बीज को नही देख पता और मैं बीज में प्रच्छन्न वृक्ष को देख लेता हूँ।
बलि की रुचि प्रत्यक्ष शक्तियों में है इसलिए उसके समक्ष मैंने स्वयं को नगण्य बनाकर प्रस्तुत किया, यज्ञ समाप्ति के बाद जब वह दान देने लगा तब मैं भी एक याचक के रूप में उसके सामने खड़ा हो गया।
एक अतिलघु बौने ब्राह्मण को अपने समक्ष देख उसने कहा- हे बटुक मैं आपकी किस इच्छा को पूर्ण कर सकता हूँ ? कृपया आदेश करें।
मैंने कहा- हे महादानी महाराज बलि मुझे आपके सामर्थ्य और वचनबद्धता पर संशय है ? आप मेरी इच्छा पूर्ण नहीं कर पाएँगे।
जब कोई नगण्य सत्ता गणमान्य सत्ता के सामर्थ्य पर संशय करती है तब गणमान्य सत्ता का अहंकार प्रगल्लभित हो जाता है और वही हुआ बलि उपेक्षा से हँसते हुए बोला- हे देव आप अपने छोटे से आकार के अनुसार मेरे सामर्थ्य का आंकलन ना करें, आप तो आदेश करें कि देवराज इंद्र को परास्त करने वाला, तीनों लोकों का अधिपति बलि आपका क्या हित कर सकता है ?
नारद अहंकारी के अहंकार को नष्ट करने के लिए हमें उसके अहंकार को और अधिक पुष्ट करना चाहिए, मैंने उसके अहंकार को और अधिक पुष्ट करते हुए कहा- हे महापराक्रमी, हे महादानी, हे त्रिलोक के स्वामी मुझे आपके सामर्थ्य पर तनिक भी संशय नहीं है आप महान प्रजापालक हैं आप अपने प्राण देकर भी अपनी प्रजा की इच्छा पूरी करने का सामर्थ्य रखते हैं, आप देवराज इंद्र से सर्वथा भिन्न हैं। मुझे अपनी इच्छा पर संकोच हो रहा है कि कहीं महाराज बलि इस निर्धन वामन की आवश्यकता को इसका लोभ ना समझ लें।
विशाल जनसमुदाय के सामने अपनी स्तुति सुनकर बलि परम प्रसन्न होते हुए बोला- बटुक मैं आवश्यकता और लोभ के बीच के अंतर को भलीभाँति समझता हूँ। आप निश्चिन्त रहते हुए कहिए की आप क्या चाहते हैं ?
मैंने दीनता से कहा- महाराज मेरे पास भूमि नहीं है, मुझे रहने के लिए मात्र तीन पग भूमि की आवश्यकता है।

मेरी आवश्यकता और मेरे आकार को देख बलि ठठाकर हंसते हुए बोला- हे बटुक इन तीनों लोकों में जहाँ भी तुम्हारी इच्छा हो तीन पग भूमि नाप लो और सुख से रहो, अभी से ही तुम अपनी नापी हुए भूमि के स्वामी हुए यह तीनों लोकों के स्वामी महाराजा बलि की घोषणा है।
उसकी स्वीकृति पाते ही मैंने अपने रूप का विस्तार करना आरम्भ कर दिया और देखते ही देखते मैं अपने विराट स्वरूप में आ गया, मैंने तीनों लोकों को अपने दो पगों में ही नाप लिया तब मैंने बलि से कहा- हे महादानी तुम्हारा साम्राज्य तो मेरे दो पगों में ही समाप्त हो गया। तुमने मुझे रहने के लिए तीन पग धरती देने का वचन दिया था अब बताओ मैं अपने तीसरे पग को कहाँ रखूँ ? जिससे मैं अपनी आवश्यकता और तुम अपने दिए गए वचन को पूरा कर सको।


मेरे विराट रूप के दर्शन मात्र से बलि का अहंकार भस्मीभूत हो गया।
नारद, अहंकार के समाप्त होते ही ज्ञान का उदय होता है, और ज्ञान के उदित होते ही व्यक्ति अपनी अहमन्यता भूलकर विनम्र हो जाता है बलि जो अभी तक अर्पण के भाव से भरा हुआ था वो समर्पण की अवस्था को प्राप्त हुआ और उसने अपने दोनों हाथों को जोड़ते हुए अपने सिर को मेरे उठे हुए चरण के नीचे रख दिया, तथा अत्यंत भक्ति भाव से बोला- हे जगदीश्वर अपने श्रीचरणों को बलि के मस्तक पर रखिए जिससे बलि की सम्पूर्ण मनोभूमि भी आपके अधिकार क्षेत्र में रहे और आप सुखपूर्वक वहाँ पर निवास कर सकें।

नारद, मैं बल से नहीं विनम्रता से वश में आता हूँ, मैंने अत्यंत आह्लादित होते हुए बलि से कहा- राजन मैं तुम्हारी विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न हूँ माँगो क्या माँगते हो ?
बलि ने अत्यंत भावुकता से कहा- प्रभु मैं चाहता हूँ कि अब से आप इसी लघु रूप सदैव मेरे सम्मुख रहते हुए मेरे द्वारपाल के कर्तव्यों का निर्वाह करें, जिससे बलि को सदैव लघुता में प्रभुता के दर्शन होते रहें।

नारद मैंने बलि को एवमस्तु कह दिया। अब मैं चाहकर भी यहाँ से मुक्त नहीं हो सकता। यदि देवी महालक्ष्मी चाहतीं हैं की मैं पुनः वैकुंठ में वास करूँ तो उन्हें ही कुछ युक्ति लगानी होगी।
अब तुम जाओ नारद और देवी को प्रेरित करो की वे स्वयं की कुंठा का त्याग करते हुए मुझे पुनः प्राप्त करने के लिए उद्यम करें।~#आशुतोष_राणा

#क्रमशः•••